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जून, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेम

प्रेम तुम्हें मैं खोजती हूँ कँटीले पर्वत पर नहीं मिलते तुम मखमली गलियारों पर  तुम्हारे पैरों के छाले अक्सर बताते हैं पहाडों बियाबानों का पता नहीं मिलते हो तुम तालाबों झरनों के पास तुम अक्सर दौडते हो रणभूमि के पास कराह रहे हैं जहाँ कहीं कहीं सांसें चाँद कि गोलायियों को नहीं नापते तुम मेरे चेहरे की खूबसूरती से ढूँढते हो तुम उसमें रोटी की विवशता को और फिर पाती हूँ तुम्हें मंदिर मस्जिद गिरजाघरों की सीढ़ियों पर जहाँ दंतुरी मुस्कान भूख सह रही है पीढ़ियों से जाकर खडी होती हूँ मै प्रथम मुलाकात के मोड पे पर वहाँ नही पाती हूँ मैं तुझे तुम होते हो किसी बुढी माँ के ओसारे पर जहाँ सूरज कि प्रथम किरण से चाँद की शितलता तक इन्तजार में रिस रही है बुढी आँखे इन्हीं सबसे तुम्हें प्रेम है और तुम्हारे सब से मुझे प्रेम है ....

मृत्यु

जिस क्षण गर्भ नाल को  किया गया था अलग मेरी नाभि से उसी क्षण से  स्थित है मृत्यु  मेरी नाभि‌ में  चूल्हे की आग  भले ही शांत करती है मेरी जठराग्नि  मगर मैं खुद को  नहीं रखती हूं अपरिचित  श्मशान की लपटों से कई बार छलनी से  छान डालती हूं मैं धरती के गर्भ में स्थित रेत पर हासिल नहीं होती  मृत्यु की घड़ी मेरी निद्रित अवस्था में भी  वो जागती है मेरी सांसों की  गोपनीय पहरेदार बनकर रात के सन्नाटे में जब मैं चढा़ती हूं दरवाजे पर सांकल मृत्यु मेरी पीठ से चिपक  धिमे से मुस्कुराती है मेरी नश्वरता के ज्ञान पर  सोचती होगी मौत शायद  नाल के अंतिम अवशेष  गलने के पहले इस देह को  जोड़ देगी वो वापस उसी गर्भ नाल से

क्षणिकाएं

क्षणिकाएं धूप सूखाने डाली थी मैंने पर  मेरा गीला मन आसमान पे जा बैठा =================== कभी कभी लगता है ये आसमान मेरी कोई पुरानी किताब है और ये  जब भी बरसात हैं मेरा कोई नया गम दर्ज़ करता है =================== रोज देखती है वो खिडकी के पार का बाजार रंग बिरंगी फुल उसके अलग अलग खरिदार कुछ फुल आयेगे उसके हिस्से भी कुछ जायेगे ईश्वर के हिस्से कुछ में होगी प्रार्थनायें  कुछ में होगी वासनायें पर हर स्थिती मे रौंदी जायेगी ईश्वरीय भावनायें =================== जितनी जरूरत थी  उतनी ही एहिमियत थी  उसके उपरांत आप को अलगनी पर टंगा जायेगा  किसी पूराने कपड़े की तरह ======================= हर तरह से हो रहे हैं वार बीज से लेकर खरपतवार वर्तमान की सतह से लेकर भविष्य के गर्भ तक बना दी गई है औरत देह बिछी है चौसर की बिसात

उस साल की बारिश

उस साल की बारिश उस साल की बारिश भी अजीब सी थी मानों बूंद बूंद रो रही थी न फूलों पर न पत्तियों पर गिरती पानी की धार सुखद अहसास  दे रही थी महामारी के चपेट में सारी दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही थी  आंगन में जमा बारीश का पानी बंद दरवाज़े को ताकता किसी बच्चे के कागज़ की नाव को तरसता खिड़की के उस पार बैठी उदास प्रेमिका को देख बारीश उसे प्रियतम से मिलवाने आतुर हो जाती कितनी ही लाशें उठ जाती  अपनों से भी अधिक उसे बारीश की बुंदे छूती कफ़न से लिपटे रोती उस साल की बारिश वीरान सड़कों से गुजरते समय मन ही मन सोचती ठेलेवाले सब्ज़ी वाले की भूख़ की थैली ढूंढती उस साल की बारीश गुजर गयी थी नई बारीश के इंतजार में एक बूढ़ी औरत आंगन के पार आसमान को नये सृजन के लिए निहार रही थी

बौना नजर आता है इन्सान

बौंना नज़र आता हैं समाज का बांशिदा जिम्मेदारी को रख़ नेताओं के कधें केवल शब्दों का छोड़ देता है बाण लो  *प्रतिज्ञा* आज उठाओं जिम्मेदारी का कफ़न जो गिरा विकास पर मुरदों का चादर बन धरा के आत्मा से उर्जा़ का निकालों रस उड़ेल दो आसमान पे धमा दो बाशिदे के पिठ पर एक पंख भेदकर अंधकार को तबदिल हो उजाले में

जब तुम मुझसे मिलने आवोगे

जब तुम मुझसे मिलने आवोगे सुनो ऋतुराज! तुम जब मुझे मिलने आवोगे ना न लाना कोई भी फूल नही चाहती हूं मैं हमारे मिलने से कोई भी हो आहत हो भर देना तुम मेरी माँग में चमकिली किरण सूरज की शाम जब उतर आये लेकर थाल चाँदी की  सितारे  रख देना उस वादे के साथ मेरे आँचल में होगा हर वो तारा गवाह हमारे आनेवाले हर मिलन का गर तुम जन्म लोगे  विशाल पर्वत के रुप मे तो मै हो जाऊंगी अंकुरित बेल के रुप मे पसर जाउंगी तुम्हारी अंडिग छाती पर गर तुम विशाल संमदर बन गंर्जन करोगे तो मै जलपरी बन तुम्हारे तनमन में लहराउंगी

धरती का एक टुकड़ा

धरती का एक टुकड़ा धरती के उस टुकड़े पर मैं लिखना चाहती हूं एक कविता बर्बर अंधियारा जहां है व्याप्त आये दिन युद्धों की घोषणाएं सुनाई देती है साफ साफ और खेल में तल्लीन किसी बच्चे के आंखों में उतर आता है एक खौफ़ फूल तितलियां वहन कर रही है जहां अपने देह पर उन लड़कियों की राख़ जिन्हें महज एक भूख़ का साधन समझकर जलाया जा रहा है और वीरान पड़े हैं वहां स्थित बगीचे नेताओं के हाथ के चाबूक से छिल गई है धरती की पीठ शोषित जनता के आंखों की नमी सोख रही है ज़मीं पर पड़ी बिवाईयां गिध्द आसामान में दे रहे हैं पहरा जब मैं लिखने लगी धरती के इन तमाम टुकड़ों पर एक कविता तब समस्त सृष्टि मेरी कविता का हिस्सा बनती गई  और कुछ इस तरह मेरी लेखनी ने विरोध का जयघोष किया बच्ची की आंखों में अब तैरते फूल तितलियां लड़कियां लहराती पंरचम निडरता का चुनाव में अंगूठे पर लगने वाली स्याही शोषितों ने भर दी है अब कलम में  अब मेरे कविता के शब्द शब्द बने हैं अंधियारे में *विश्वास* जगाता हथियार

लौट आओ

लौट आओ  गाँव की खेती देती है  आभास सूनी मांग का  लहराया था कभी यौवन का भार हर साल पकी थी  उर में रोटी हवा मे गूँज रहा है अभी  मजदूरन का चैत का गीत जब से गाँव झाक रहा है  शहर की तंग गलियों से पगडंडियों पर खडी खेती  देखती है राह फट रहा है धरती का सीना कभी कलरव करती मैना सीना भेदते बैलो को भी झेल कष्ट के बाद  पढा रही थी सुख का पाठ  तंग गलीयों से निकलकर आ जाओ  बुला रही है धरती  खेतों की मेढ  और पगडंडियां  फिर से आ जाओ भर जाओ सूनी माँग

धूप की यात्रा

धूप की यात्रा धूप  नंगे पाव आती है  उजाले का झाडू थामे  अँधयारे को बुहारती  सख्त दीवारों पर  पैर पसारती धूल सनी किताबों पर बैठ कदमों में लगे तिमिर की फाके झाडती धूप नही भूलती  चूल्हे पर चढ  तश्तरी में गिरना पिछली रात का भीगा तकिया बैठकर सुखाती  वहाँ से उठकर बाबूजी की कुर्सी पर बैठ धूप बतियाती है   नए कैलेंडर के नीचे से झांकते  पुराने कैलेण्डर से  निहारती है  समय का काँटा जो कभी नहीं रुकता  छाव तले आया देख धूप  सपकपाती राह ताकती  दरवाजे के आँख मे लगा कर काजल  वादा कर धूप मंदिर की घंटी सहलाती मटमैले परदों से झाँकते अँधयारे के बीच से  खिडकी से दबे पाव  चूम लेती ईश्वर का माथा  खेत से लौटती स्त्री को  पहुचा कर देहरी  धूप लौट जाती है  फिर आने के लिए .

वैश्या

वेश्याओं का जन्म! माँ के गर्भ से नहीं होता है वो तो खाली तश्तरी से उठकर स्वार्थ की घने अन्धकार में हवस की दीवार पर  बिना जड़ की बेल सी पनपती है उसका मन  हमेशा देहलीज़ पर बैठ हर दिन गिनता रहता है उसके ही तन की आवाजाही को जब वो बाजार के पैने दांतों पर बैठकर हवस के पुजारियों की आँखो में ढूंढती है रोटी  मन उसे वहीं पर छोड़ चला आता  और दहलीज़ पर बैठकर  करता खुद से  अपने अस्तित्व को लेकर अनगिनत   सवाल आखिर क्यों  अंतड़ियों की भूख भिनभिनाती है हमेशा मक्खियों की तरह क्यों नहीं सो पाया बेचैन मन  एक अरसे से  घना अंधेरा क्यों जम जाता है घर की दहलीज़ पर   मन को लगता है आंगन के उस पार एक घना सा बीहड़ है शायद और उस घने बिहड़ में से एक खूंखार जानवर  उसके घर के अंदर दाखिल हो गया है