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जिस रात एक औरत रोती है

रात के सीने पर जब जब बहता है  किसी औरत का काज़ल तब तब धरती के गर्भ में स्थित बीज डरता है पल्लवित होने से किसी डाल पर सुस्ताती चिड़िया के  कान में आंगन से उड़ी कपास रख़ देती है एक चीख़ जो अभी अभी दरवाजे को चीरती सन्नाटे में विलीन हो गयी है और उस रात वृक्ष की जड़  सीचीं जाती है खारे पानी की धार से देवी के मंदिर में लगी घंटियां  लौटा देती है उस रात  कुछ एक प्रार्थनाओं  को जिस रात औरत बुदबुदाती है अनगिनत नाकाम मन्नतों को कानून के घरों में बैठे इंसाफ के दस्तावेज़  हिलने लगते हैं  आधी आबादी के आंसुओं के ज्वार से   जब औरत रोती हैं तो  आसमान में चांद को भी  बेमानी सी लगती है  अपनी चांदनी  और ढक लेता है वो अपने तन को  बादलों की आड़ में  जब जब एक औरत रोती हैं  असभ्यता  सिंहासन  की तरफ एक कदम बढ़ाती हैं  और सभ्यता बैसाखी़ की ओर मुड़ जाती है

नदी

नदी तू सींचती है  सदा ही सभी को अपने मीठे जल से जबकि तुम्हारे हिस्से में आता रहा है हमेशा से बड़े बड़े पत्थरों ने दिये नुकीले असहनीय दर्द तू बड़ी माहिर है छुपाने में  रक्तरंजित बदन को जिन्हे तुम छिपा लेती हो बड़ी ही खूबसूरती से   भूलकर रक्तरंजित बदन की पीड़ा सौंप देती हो खुद को संमदर के मजबूत बाहुपाश में और खो जाती हो  चुपचाप संमदर के खारे सीने में और युगों के बाद समंदर का नमक  जब कुरेदता है  बार -बार तुम्हारे जख्मों को और उसमें भर देता है तुम्हारी  मरणसन्न पीड़ा को फिर भी शान्त रह सहती हो बगैर कुछ कहे हुए परन्तु हे नदी तुझसे पूंछ्ती हूँ नदी सी आखिर तुम्हारे अवदान का  तुम्हे आज तक क्या प्रतिफल मिल सका है जो आज भी तुम हृदय की गहनता में छुपाये हुए बिना रूके बहती चली जा रही हो निर्लिप्त भाव से