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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजनीति

१) स्वार्थ की राजनीति को पूरा करने के लिए इन सब नेताओं ने हमसे वसूली हैं  एक अंगूठे की कीमत  और कर दिया है  इतिहास,वर्तमान और भविष्य  अपाहिज  २) राजनीति में विरोधी  वह मदारी हैं  जो कांच के दरवाजे  के अंदर बैठकर  उस पार का दृश्य देखता है  और जब जनता  सूखे पत्तों की तरह  धूप में कड़क(तिलमिला) हो जाती हैं  तब उनकी हड्डियों को  चुल्हे में सरकाकर  उस पर बिना बर्तन रखे  तमाशा देखता है ३) हे मनुज तूने सभ्यता की देह पर असभ्यता का  तांडव रचा दिया है  तेरी कालाबाजारी से तेरी भ्रष्ट राजनीति से धू, धू करके जलती चिताओं ने आसमान तक की  आंखें भींगो दी  इन लाशों से जन्मी कालिख़ तेरे आने वाली अनगिनत पीढियों के मस्तिष्क पर स्थापित गहरा कलंक है और मेरा अपाहिज मौन है ४) जनता ने नेताओं को  रेशम का कीड़ा समझा है  जो सिहासन के  हरियाली पर बैठकर  उनके लिए उम्मीदों का  वस्त्र बुनेगा  पर राजनीति में  जनता तो केवल  वह मखमली धागा है  जिसे पकड़ कर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा जाता है

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल