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संदेश

माँ

घर के दालान को खाली कर पांव फटते अंधयारे में पहली रेलगाड़ी से गाँव से लेकर आया था तुम्हे माँ तुम्हारी कमजोर आँखों ने कितना भर देखा होगा उस सुबह अंतिम बार अपने घर को माँ तुम्हारे जाने से कुछ नहीं बदलेगा केवल इतना भर होगा अब कभी मैं इस भीड़ से भरे शहर में स्टेशन से उतरकर मेरे पिछे चलने वाली माँ को अपने घर की तरफ लेकर नही जा पावुगा कभी मोबाइल में सुरक्षित रखी तुम्हारी दवाईयों की पर्ची गेलरी में मौजूद रहेगी माँ तुम्हारे कारण ही बहुत से रिश्ते अब तक टुटने से बचे थे अब बिना किसी अनबन के सदा के लिए खामोश हो जायेगे माँ तुम जबतक थी माँ मेरे महानगर के घर में भी एक गाँव किस्से कहानियों के साथ आबाद था माँ अब घर के दालान का इंतजार और वापसी में मेरे खाली हाथ
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तुम नहीं समझ सकते

नदी को समझने के लिए पानी होना पड़ता है  होती है भाषा फूलों की भी पर उसे समझने के लिए  तुम्हारा कपास सम मन होना जरुरी है  अकेलेपन की परिभाषा  तुम सीखना उससे  जो लाखों बुंदों के साथ  सफर तय कर आया तो था  पर कहीं  खाली टीन के डब्बे में  पडा़ रहा अंतिम क्षणों तक  तुम नहीं जान सकते  उस बीज का दुख़  जो धरती के गर्भ में  बड़े श्रम के साथ बना तो रहा  पर बंजरता के उपमा से नवाजा गया  तुम नहीं समझ सकते हो कभी  उस कवि की  व्यथा  जिससे  छीन लिया   कागज और कलम  जिम्मेदारी के चक्र ने और वो  रात- रात बिलखता रहा  आपने दुख को बयां न करने की स्थिति में तुम नहीं समझ सकते प्रेम में धोखा खाये उस औरत के दर्द को जो छिपाती है अपने ह्रदय के घाव  और संभालकर रखती है दुनिया के समक्ष अपने बेवफा प्रेमी का रुतबा.... 

थकान

अब नहीं थकती हूँ मैं क्योंकि थकान को मै  इसलिए अब महसूस नहीं कर सकती हूँ क्यूँ की थकान के अलावा और किसी भी भाव से अब मैं परिचित नहीं होती हूँ

अलविदा

१. हम दोनों के बीच हमेशा से एक मौन रात चलती रही  और उस रात को दिन में  तबदील करने के लिए  मैं कहीं जख्म सहती रही  और एक दिन सवेरा भी हो गया  पर सूरज की पीठ पर  मेरे नाम की जगह पर किसी और का नाम दर्ज करते  वो नजर आए उनकी दहलीज पर अलविदा के लिफाफे में दुवाओं का पैगाम लिखकर वहाँ से हम लौट आये २. स्विकार और अस्वीकार  के मध्य चलती रही हूं मैं  मेरे पैरों से छाले नहीं  अब तो रक्त बहने लगा है पर न तुम देख सके  न तुम मेरे ह्रदय में उठती  पीड़ा की ध्वनि सुन सके कभी अलविदा लिख दिया  मैंने रक्तरंजित नदी की देह पर

नदी

एक नदी दूर से  पत्थरों को तोड़ती रही  और अपने देह से  रेत को बहाती रही  पर रेत को थमाते हुए  सागर की बाहों में  उसने सदा से  अपने जख्मों को  छुपाकर रखा  और सागर बड़े गर्व से  किनारे पर रचता आया रेत का अम्बार और दुनिया भर के  अनगिनत प्रेमियों ने  रेत पर लिख डाले  अपने प्रेमी के नाम  और शुक्रिया करते रहे  समंदर के संसार का  और नदी तलहटी में  खामोशी से समाती रही  पर्दे के पीछे का दृश्य  जितना पीड़ादायक होता है  उतना ही ओझल  संसार की नज़रों से

क्षणिकाएँ

1. टूट कर बिखरना  और फिर फिर जुड़ना  इस सिलसिले में  प्रेम के निशान से अधिक  टूटे ह्रदय में जख्मों के निशान  बढ़ रहे थे और  बढ़ते ही जा रहे हैं 2. जो मन के  एहसासों को  नहीं समझता है उसे शब्दों की  भाषा में समझाना  व्यर्थ हैं  3. जिन्हें आदत होती हैं  जख्मों पर नए  जख्म रखने की  उन्हें पुराने जख्मों की  गाथा सुनाना व्यर्थ हैं

गुँजाइश न हो जहाँ

 समंदर में जिन्ह मछलियों के हिस्से  मछुआरे का जाल आया  उसका क्रंदन कभी नहीं सुना  समंदर ने क्योंकि वहांँ पुनः  आगमन की गुंजाइश नहीं होती हैं वृक्ष पर से पत्ते का विदा होने की ध्वनि नहीं गुंजती है कभी चहुँ दिशा में क्युं की वहाँ पुनः मिलन की गुँजाइश नही रहती है ढलती शाम में हाथ छुडाकर गये प्रेमी को नहीं रोकती वो प्रेमिका क्युं की प्रेम देह से नहीं मन से होता है मन को बांधा नहीं जाता है रोकने से केवल देह रुकती है मन नहीं इसलिए जाने वाले को अपना क्रुदन भी नहीं सुनाया जाता है