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मेरा गाँव

मेरा गाँव अब गाँव कम, खंडहर अधिक नज़र आने लगा है; हर दूसरे घर ने नींव को नंगा कर दिया है। ​खिड़कियाँ अंदर से बंद हैं, पर समय ने उन्हें बाहर से खोल दिया है; दरवाज़े पर ताला किसी बूढ़े के हाथ में लाठी की तरह पड़ा है। ​बचपन में जो घर मुझे विशालकाय लगते थे, अब मानो मरणासन्न हालत में किसी अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज की तरह सिमट गए हैं। ​जिस कुएँ में एक साथ कई गगरियाँ नृत्य करती थीं, वह कुआँ आज मकड़ियों के जाल और कँटीली झाड़ियों के बीच, किसी की टोह के लिए प्यासा है। ​छोटी-छोटी पगडंडियों को न जाने कौन निगल गया, बिना कोई निशान छोड़े । ​नाग देवता का कच्चा पत्थर अब पक्का बन गया है, पर पक्का बनने पर भी वह वीरान और उजड़ा क्यों नज़र आ रहा है ? ​जो घर गिरकर मिट्टी हो चुके हैं, उन घरों की बुनियाद पर पड़े सिलबट्टे और टूटी तुलसी ने उनके 'घर' होने के संकेत आज भी बरकरार रखे हैं। ​एक गाँव को खंडहर बनाकर हम, फिर से एक और खंडहर बनाने की यात्रा पर निरंतर चल रहे हैं।
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मछलियों का संसार

1 मछलियां समंदर की गहराई से डरकर सतह पर आती हैं और जाल की उतराई में फंस जाती हैं 2 समंदर के देश में मछलियां मरती नहीं है उनकी सामूहिक हत्या की जाती हैं मेरे देश की तरह उन्हें मुआवजा नहीं मिलता है हां मेरे देश की तरह वहां हत्यारे पुनः पुनः आ जाते हैं बेखौफ 3 मछलियों को जाल ने कभी फसाया नहीं उन्हें तो फसाया गया हमेशा से एक और मरी हुई मछली ने 

वो लड़की

दुबली पतली-सी  वो कमसिन काया उसकी  देखा मैंने उसे मेले में सजायी थी उसकी माँ ने  चाकू छुरियों की दुकान हर मेला घूमता  एक कुनबा था उनका....  ग्राहक आते और चले   जाते  अपरिपक्व बदन उसका कितनी ही भेडिया नजरों को झेलता  सोचा निढाल पड़े थे सामने  चाकू और छुरियां शायद, रेंग रही थी भूख उन पर बिना मालिक बेकार थे वो गोया अंतडियां सहलाने का जरिया थे  सहसा आया हवा का एक झोंका  मेरी नज़र उसके उड़ते बालों पे टिकी बंजर भूमि सा माथा उसका कब की रूठ गयी थी वर्ष उसकी धरा से छोड दिया हो साथ मिट्टी ने जड़ों का जैसे  कुछ इस तरह से उभरी थीं नसें   लड़की की देह में आँखों में यौवन की चपलता पर किनारों पर  मंडरा रही थी  भूख की चिलचिलाती धूप हँसती थी बेफिक्र सी हँसी नहीं, उमड़ते गड्डे उसकी गालों में पेट छिप जाता पीठ के अंदर तन पर  रंग बिरंगे मजहब का परिधान पर रोटी के मजहब का रंग  कुछ स्याह फीका सा है  उसके चेहरे पर कुनबा तय करेगा उनका अनगिनत पड़ाव बाँध कर पैरों में भूख प्यास और संघर्ष की पोटली  क्या होगा भविष्य...

चार बहनें

चार बहनें ब्याही गई चार दिशाओं में मिलने के लिए आना चाहती थी मायके की छत के नीचे ताकि बांट सके अपने संताप को और सुख के संदूक को  पर आ न सकी कभी इकट्ठी हर बार चूकती रही तारीखें  मिलने की त्योहारों में भी बंधे  रहे उनके हाथ ससुराल की खुटीं से जब वे उत्तरदायित्वों से बरी कर दी गई तब तक मायके के चूल्हे की आग शमशान की लपटों में तबदील हो गई थी  अब चार बहनों को नहीं बांटने होते हैं कोई सुख -दुख सुदूर से स्मरण करती है एक दूसरे की भूली बिसरी स्मृतियों को   सारे पुल टूटकर धाराशाही हो गए अब तो चार दिशाओं की दूरी मानो चार देशों में तब्दील हो गई है ।

औरतें

अच्छी औरतें छली गई और जिन औरतों ने विरोध किया बदला लिया वे औरतें गाली की तरह इस्तेमाल की गई इसलिए औरतों को थोड़ा कम अच्छा होना चाहिए ताकि  विरोध का थोड़ा रसायन घो लकर इस दुनिया को पिला सके समय-समय पर

प्रेम

महीने के अंतिम तारीख को वो अपनी प्रेमिका से अपना खाली बंटवा  भरने की जिम्मेदारी देता है प्रेमिका उसे प्रेम समझते हैं महीने के अंतिम तारीख को वो कुछ इस तरह से घर में राशन का जुगाड़ कर पता है और पत्नी उसे प्रेम समझती है

शिव

हर पार्वती के हिस्से नहीं होते हैं शिव फिर भी वो अर्धनारीश्वरी के  रूप में  विचरती है इस धरा पर