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संदेश

अलविदा

१. हम दोनों के बीच हमेशा से एक मौन रात चलती रही  और उस रात को दिन में  तबदील करने के लिए  मैं कहीं जख्म सहती रही  और एक दिन सवेरा भी हो गया  पर सूरज की पीठ पर  मेरे नाम की जगह पर किसी और का नाम दर्ज करते  वो नजर आए उनकी दहलीज पर अलविदा के लिफाफे में दुवाओं का पैगाम लिखकर वहाँ से हम लौट आये २. स्विकार और अस्वीकार  के मध्य चलती रही हूं मैं  मेरे पैरों से छाले नहीं  अब तो रक्त बहने लगा है पर न तुम देख सके  न तुम मेरे ह्रदय में उठती  पीड़ा की ध्वनि सुन सके कभी अलविदा लिख दिया  मैंने रक्तरंजित नदी की देह पर
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नदी

एक नदी दूर से  पत्थरों को तोड़ती रही  और अपने देह से  रेत को बहाती रही  पर रेत को थमाते हुए  सागर की बाहों में  उसने सदा से  अपने जख्मों को  छुपाकर रखा  और सागर बड़े गर्व से  किनारे पर रचता आया रेत का अम्बार और दुनिया भर के  अनगिनत प्रेमियों ने  रेत पर लिख डाले  अपने प्रेमी के नाम  और शुक्रिया करते रहे  समंदर के संसार का  और नदी तलहटी में  खामोशी से समाती रही  पर्दे के पीछे का दृश्य  जितना पीड़ादायक होता है  उतना ही ओझल  संसार की नज़रों से

क्षणिकाएँ

1. टूट कर बिखरना  और फिर फिर जुड़ना  इस सिलसिले में  प्रेम के निशान से अधिक  टूटे ह्रदय में जख्मों के निशान  बढ़ रहे थे और  बढ़ते ही जा रहे हैं 2. जो मन के  एहसासों को  नहीं समझता है उसे शब्दों की  भाषा में समझाना  व्यर्थ हैं  3. जिन्हें आदत होती हैं  जख्मों पर नए  जख्म रखने की  उन्हें पुराने जख्मों की  गाथा सुनाना व्यर्थ हैं

गुँजाइश न हो जहाँ

 समंदर में जिन्ह मछलियों के हिस्से  मछुआरे का जाल आया  उसका क्रंदन कभी नहीं सुना  समंदर ने क्योंकि वहांँ पुनः  आगमन की गुंजाइश नहीं होती हैं वृक्ष पर से पत्ते का विदा होने की ध्वनि नहीं गुंजती है कभी चहुँ दिशा में क्युं की वहाँ पुनः मिलन की गुँजाइश नही रहती है ढलती शाम में हाथ छुडाकर गये प्रेमी को नहीं रोकती वो प्रेमिका क्युं की प्रेम देह से नहीं मन से होता है मन को बांधा नहीं जाता है रोकने से केवल देह रुकती है मन नहीं इसलिए जाने वाले को अपना क्रुदन भी नहीं सुनाया जाता है

दुख जो बहा नहीं धरा पर

औरतों  के हिस्से जितना भी दु:ख आया  बहुत कम आँखों ने धरा को सौंपा और बहुत सा दुख आँखों के किनारें पर शहर बन बसा बदलते काल और परिवेश में पगडंडियों और जंगलों में खपती इन औरतों ने अपना दुःख रखा साथी औरतों के कानों में  पर सांत्वना के शब्दों के एवज़ में  सम दुख की भागीदारिनी ही मिली  वे रात में मिला दुःख  सुबह बुहारते हुए रख आयी  आंँगन के कोने में  और अधिक मात्रा में इकट्ठा होने पर  टोकरीं में भरकर  राख़ में तबदील कर आयी  नजदीक के किसी खेत में  हर परिवेश और हर स्थिति में  इन दुखों का मापन और रंग एक सा रहा  रेल में महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बें में  हजारों उतरती चढ़ती आँखों में  बसा रहा दुख का साम्राज्य  पर कभी काजल तो कभी काले चश्मे ने  यहाँ पहरेदारी अपने बजाई  एंकात की तलाश करते भीड़ में नजर आए कितने ही दुपट्टे के छोर कुछ औरतों ने अपना दुःख  अलमारी की उन साड़ियों की तह में सुरक्षित रखा जिसे मायके का पानी लगा था औरतों के हिस्से जितना भी दुःख आया  उजाले ने कम और अंँधियारे ने अधिक जिया।

एक ऐसा भी शहर

हर महानगरों के बीचो -बीच  ओवरपुल के नीचे  बसता है, एक शहर  रात में महंगे रोशनी में सोता है  सिर के नीचे तह करके  अंँधियारे का तंकिया  यहाँ चुल्हें पर पकती है आधी रोटी और आधी  इस शहर की धूल लोकतंत्र के चश्मे से नहीं दिखता यह शहर क्यों कि इनकी झोली में  होते हैं  इनके उम्र से भी अधिक  शहर बदलने के पते यह शहर कभी किसी जुलूस में  नहीं भाग लेता है ना ही रोटी कपड़े आवास की मांँग करता है  पर महानगरों के बीचो-बीच उगते ये अधनंगे  शहर हमारे जनगणना के खाते में दर्ज नही होते हैं पर न्याय के चौखट के बाहर नर या आदम का खेल खेलते अक्सर हमारे आँखों में खटकते है

प्रहर

मेरा एकांत  मेरे कमरे में छाये सन्नाटे का हिसाब  जब लगाता हैं  तब एक इतिहास  अपने पन्ने खोलकर  मेरे समक्ष आ जाता हैं  पर मेरी जिद होती हैं  वर्तमान के लोहे सम  कवच से मैं ढ़क दूँ उसके पन्ने और घास पर बैठी ओस की बूँदे भर लाऊँ अपनी अँजुरी में , और सींच दूँ फिर से  एक और नींव भविष्य की  तभी उस कमरे के  सन्नाटे को चीर जाती हैं  दीवार पर लगी घड़ी   संकेत देती हैं  प्रहर के गुजर जाने का।