दुबली पतली-सी वो कमसिन काया उसकी देखा मैंने उसे मेले में सजायी थी उसकी माँ ने चाकू छुरियों की दुकान हर मेला घूमता एक कुनबा था उनका.... ग्राहक आते और चले जाते अपरिपक्व बदन उसका कितनी ही भेडिया नजरों को झेलता सोचा निढाल पड़े थे सामने चाकू और छुरियां शायद, रेंग रही थी भूख उन पर बिना मालिक बेकार थे वो गोया अंतडियां सहलाने का जरिया थे सहसा आया हवा का एक झोंका मेरी नज़र उसके उड़ते बालों पे टिकी बंजर भूमि सा माथा उसका कब की रूठ गयी थी वर्ष उसकी धरा से छोड दिया हो साथ मिट्टी ने जड़ों का जैसे कुछ इस तरह से उभरी थीं नसें लड़की की देह में आँखों में यौवन की चपलता पर किनारों पर मंडरा रही थी भूख की चिलचिलाती धूप हँसती थी बेफिक्र सी हँसी नहीं, उमड़ते गड्डे उसकी गालों में पेट छिप जाता पीठ के अंदर तन पर रंग बिरंगे मजहब का परिधान पर रोटी के मजहब का रंग कुछ स्याह फीका सा है उसके चेहरे पर कुनबा तय करेगा उनका अनगिनत पड़ाव बाँध कर पैरों में भूख प्यास और संघर्ष की पोटली क्या होगा भविष्य...
चार बहनें ब्याही गई चार दिशाओं में मिलने के लिए आना चाहती थी मायके की छत के नीचे ताकि बांट सके अपने संताप को और सुख के संदूक को पर आ न सकी कभी इकट्ठी हर बार चूकती रही तारीखें मिलने की त्योहारों में भी बंधे रहे उनके हाथ ससुराल की खुटीं से जब वे उत्तरदायित्वों से बरी कर दी गई तब तक मायके के चूल्हे की आग शमशान की लपटों में तबदील हो गई थी अब चार बहनों को नहीं बांटने होते हैं कोई सुख -दुख सुदूर से स्मरण करती है एक दूसरे की भूली बिसरी स्मृतियों को सारे पुल टूटकर धाराशाही हो गए अब तो चार दिशाओं की दूरी मानो चार देशों में तब्दील हो गई है ।