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संदेश

यह समय

बेमतलब के किताबों की भरमार  उगते नन्हे पौधे को बहुत डराती  है जैसे दरबार में बैठकर किसी कवि का लिखना प्रजा को डराता है जैसे किसी सलाखों के पिछे कलम का दम तोडना डराता है आजादी को जैसे चाटुकारिता से कमाये पुरस्कार डराते हैं योग्यता के परिभाषित व्यक्ति को हा यह समय बहुत डरावना है सच की कमीज़ पर झूठ की जेब सिलाई का डराता हुआ समय है ये
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स्त्रियाँ

स्त्रियाँ चखी  जाती हैं  किसी व्यंजन की तरह  उन्हें उछाला जाता है  हवा में किसी सिक्के की तरह  उन्हें परखा जाता है  किसी वस्तु की तरह  उन्हें आजमाया जाता है  किसी जडीबुटी की तरह उन्हें बसाया जाता है  किसी शहर की तरह  और खाली हाथ लौटया जाता है  किसी भिक्षूणी की तरह  पर आने वाली संभावनाओं की  बारिश में उगेंगे कुछ ऐसी स्रियाँ   जो हवा में उछाले सिक्के को  अपने हथेलियों पर धरकर मन के अनुसार उस सिक्के का  हिसाब तय करेगी 

पिता

ना के बराबर आए  पिता मेरे हिस्से  मेरे उच्चारण के दौरान भी  बहुत कम सुख भोगा  मेरी भाषा ने इस शब्द का  मेरे लड़खड़ाते कदमों के दौरान भी कभी नहीं मिला मेरे नाजुक हथेलियों को  पिता की उंगलियों का भी धैर्य  मेरे इंतजार में या फिर  मेरी वापसी में मैंने कभी नहीं  देखा पिता की आंखों में  तैरता कोई भाव  आज उम्र के इस पड़ाव पर  आकर जब मैं ढूंढती हूं  अलमारियों में या फिर किसी कोने में एक भी चीज़  नहीं मिलते हैं यादों में भी  जो मेरे लिए पिता लेकर आए थे  किसी यात्रा से लौटते समय अब मेरे जिव्हा भी अभ्यस्त नहीं है  इस नाम के उच्चारण से

जिस रात एक औरत रोती है

रात के सीने पर जब जब बहता है  किसी औरत का काज़ल तब तब धरती के गर्भ में स्थित बीज डऱता है पल्लवित होने से किसी डाल पर सुस्ताती चिड़िया के  कान में आंगन से उड़ी कपास रख़ देती है एक चीख़ जो अभी अभी दरवाजे को चीरती सन्नांटे में विलीन हो गयी है और उस रात वृक्ष की जड़  सीचीं जाती है खारे पानी की धार से देवी के मंदिर में लगी घंटियां  लौटा देती है  कुछ एक प्रार्थनाओं  को जिस रात औरत बुदबुदाती है अनगिनत नाकाम इच्छाओं को कानून के घरों में बैठे इंसाफ के दस्तावेज़  हिलने लगते हैं  आधी आबादी के आंसुओं के ज्वार से   जब औरत रोती हैं तो  आसमान में चांद को भी  बेमानी सी लगती है  अपनी चांदनी  और ढक लेता है वो अपने तन को  बादलों की आड़ में  जब जब एक औरत रोती हैं  असभ्यता  सिंहासन  की तरफ एक कदम बढ़ाती हैं  और सभ्यता बैसाखी़ की ओर मुड़ जाती है

नाक

मालिक ने छीन लिया था उस दिन भरी बरसात में  पहरेदार का छाता  और कहा हट जाकर  खड़ा हो जा बाजू में निकल न सकी कोई भी आवाज  उसके मुख से आंखों से उसने अपना विरोध जताया  मालिक के अंहकार ने फन फैलाया आंख दिखाता है तू मुझको नाक भी लंबी हो गई है तेरी  उस गीली बरसात में  पहरेदार का दर्द उसकी आँखों से आँसू बन  छलक पड़ा अंतस का रोष थंडी बरसात पर भारी पड गया  उस दिन उसने मालिक को श्रेष्ठंता के सिहांसन से  उतारते हुए  कहा साहेब और कितना  हटूँ मैं बाजू में मेरे बाप दादा रहा करते थे पैरों तले आपके और बरसों से मैं भी रहा हूँ आपके बाजू में  आपके अलीशान केबिन का  खुलते ही दरवाजा मैं ही होता हूं हमेशा से बाजू मे हां पर! एक वादा है साहेब मेरा आपसे  मेरे जैसे खड़ी नहीं होगी  मेरी अगली पीढ़ी आपके बाजू में बल्कि वह खड़ी होगी आपकी आने वाली पीढियो के  बिल्कुल समक्ष नाक तो है ही नहीं  फिर वह लंबी होगी कहां से साहेब बचपन में ही मां ने ही रख दी थी  काटकर जेब में जो आज भी वहीं पर है सुरक्षित रईसों के फेंके हुए  कपड़ों में बने खीसों में बाकी मेरे जैसे  साथियों की नाक  कटती गई है धीरे धीरे पर मैंने पहले से ही अपनी ना

पाषाण पर उगती औरत

बार बार  उसे  फेंका गया है और ये सिलसिला गर्भ से शूरू  हुआ है पर वो औरत है कि हलक से तेजाब उतारकर पाषाण पर भी उग आती हैं धरकर सूरज को अपनी पीठ पर करती है वो नमक पैदा और भर देती  है स्वाद लेकिन किसी अपरिचित अनजान की भी कराह उसे कर जाती है विचलित।

क्षणिकाएँ

१. प्रतिक्षाएं रेत की तरह बह गयी गुनाह कुछ नहीं था बस खामोशी आडे़ आ गयी २. जिम्मेदारीयों ने हमेशा मुझे भीड़ से अलग रखा और आत्मविश्वास ने मुझे कभी खोने नहीं दिया ३. मेरी वफा़ की कोई किमत नही थी तुम्हारी नजरों में पर तुम्हारी बेवफाई की किमत मेरी आंखें चूका रही है निरतंर ४. भीड़ में भी अकेले है हम पर अकेले ही कारवां बना लेते हैं हम