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संदेश

कागजी फूल

तुम नहीं थक सकती  ना ही तुम हो सकती हो उदास  तुम्हारे थकने से  कंधों पर मौजूद दायित्व का भार  लुढ़ककर आ जाएगा नीचे  टूट सकती है तुम्हारी रीढ़ और  समय के पहले तुम्हारे रीढ़ का टूटना  तुम्हारे श्रम के नीवं पर  जो टिका है घर उसका ढ़हना होगा  तुम नहीं हो सकती हो उदास और  हो भी जाती हो उदास  तो उगा देना अपने चेहरे पर  वो कागजी फूल  जिसका कोई मौसम नहीं होता हैं थकी हुई देह लेकर भी चलना तुम  उस जगह तक जहां जरूरत है  तुम्हारी प्रार्थनाओं की और  उदास मन को छोड़ देना  थोड़ी देर के लिए  कागजी फूलों के बगीचे में  जिन्होंने अपने होने को कभी  दर्ज नहीं किया तुम्हारे अपाहिज दिनों में भी  पर तुम निभाना उन सब की इच्छाओं के  को क्योंकि निस्वार्थ को आते-आते अभी समय है
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नदी

सूरज के अस्त होने से  छा जाता है नदी के देह पर एक सन्नाटा मन में भर जाती एक उदासीनता  उसका अल्हडपन ढूंढती रहती है एक तलहटी जिसकी गहराई मे जा बैठती है वह  मौन हो ।

प्रिय

प्रिय तुम कभी नहीं बन सके एक अच्छे प्रेमी पर एक बेहतरीन मार्गदर्शक जरूर बने तुम्हारी जटिल से जटिल राजनीति और अर्थशास्त्र का ज्ञान देख मैं हमेशा अचंभित रही पर मेरे ह्रदय में बसा सबसे सरल प्यार तुम कभी समझ नहीं सके मजदूर के उदासी का रंग   अपनी क़लम में भरकर तुमने क्रांति लिखी पर मेरी आंखो में तैरता विरह का रंग तुम कभी पढ़ नहीं सके प्रिय

सवाल ?

ठीक उसी समय रहा अंधेरा मेरी दहलीज पर जब आसमान पूर्ण चंद्र से सुशोभित रहा ठीक उसी समय रंग रहे फीके मेरे चेहरे पर के जब इर्द गिर्द उड़ता रहा रंग त्योहारों का ठीक उसी समय मैं उपवास पर निकल गई जब अनेक मिष्ठानों से भरी रही मेरी या फिर तेरी रसोई ठीक उसी समय मैं तपती रही जब पूरी सृष्टि मेघ में नहाती रही मेरा इतना भर सवाल है तुमसे आज ठीक उसी समय तुमने मुझे उदास क्यों किया जब इर्द गिर्द हर्ष पसरा था ? ठीक उसी समय तुमने मुझे अनछुवा क्यों रखा जब मेरी देह आखिरी बंसत की आहट से विचलित हो रही थी? ठीक उसी समय तुमने क्यों मेरे शब्दों के जगह पर रख दिये आंसुओं के जलाशय जब मैं चाहती थी एक खुबसूरत भाषा में कर दूं अपना प्रेम निवेदन जैसे अभी अभी एक खिलखिलाते प्रेमी जोड़ने चुम लिया है एक दुसरे का माथा और अंबर झुक गया लाल रंग की काया ओढे

यही होता आ रहा है

मुझे पता  था  घूम फिर कर मुझ पर ही आएगा  रिश्तें के टूटने का दोष  और यह भी पता है मुझे दोषी करार करने के लिए  उसने नहीं चली होगी कोही चाल  न हीं छपा होगा  विज्ञापन  मेरे दोषों के केटलॉग का  क्यों कि उसे यकीन है  समाज के ठेंकेदारों के  पहरेदारी पर

कर दिया है तुम्हें मुक्त

मैं तुम्हे मुक्त कर रही हूँ इस रिश्ते की डोर से कही बार मैंने महसूस किया है  तुम्हारी पीठ पर  मेरा अदृ्श्य बोझ इन दिनों अधिक बढ़ रहा है हम दोंनो के बीच  कदमों का फासला भी कोशिश करती हूँ  कह दूँ  तुम्हारे कानों में  वही प्रेम के मंत्र जो प्रथम मुलाकात में तुमने अनायास ही घोले थे मेरे कानों  में और समा गये थे तुम मेरे रोम -रोम में मैं स्वार्थी तो थी ही पर थोड़ी बेफ़िक्र भी हो गई थी तुम्हारी चाहत में दिन-रात तुम्हारे ही इर्द -गिर्द चाहती थी मौजुदगी  जब तुम तल्लीन हो जाते थे अपने कर्मो में मैं रहती थी प्रयासरत अपनी मौजूदगी का एहसास  कराने में जब कभी पड़ता था  तुम्हारे माथे पर बल और सिमट जाती थी  ललाट की सीधी सपाट रेखाएँ मैं रख देती थी धीरे से  तुम्हारे गम्भीर होंठो पर अपनी उँगलियों को मेरा रूठना तो सिर्फ इसलिए होता था कि मैं तैरती रहूँ तुम्हारे मनाने तक  तुम्हारी ही श्वास एवं प्रच्छवास की उन्नत होती तरंगों पर जिम्मेदारियों के चक्र में जब जम जाती थी थकावट की उमस भरी धूप और शिथिल पड़ जाती थी मैं तुम मुझे उभारते बिना हाथों का स्पर्श किये और रख़ देते थे मेरे कदमों के नीचे एक तह हौसले की पर इस