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संदेश

चार बहनें

चार बहनें ब्याही गई चार दिशाओं में मिलने के लिए आना चाहती थी मायके की छत के नीचे ताकि बांट सके अपने संताप को और सुख के संदूक को  पर आ न सकी कभी इकट्ठी हर बार चूकती रही तारीखें  मिलने की त्योहारों में भी बंधे  रहे उनके हाथ ससुराल की खुटीं से जब वे उत्तरदायित्वों से बरी कर दी गई तब तक मायके के चूल्हे की आग शमशान की लपटों में तबदील हो गई थी  अब चार बहनों को नहीं बांटने होते हैं कोई सुख -दुख सुदूर से स्मरण करती है एक दूसरे की भूली बिसरी स्मृतियों को   सारे पुल टूटकर धाराशाही हो गए अब तो चार दिशाओं की दूरी मानो चार देशों में तब्दील हो गई है ।
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औरतें

अच्छी औरतें छली गई और जिन औरतों ने विरोध किया बदला लिया वे औरतें गाली की तरह इस्तेमाल की गई इसलिए औरतों को थोड़ा कम अच्छा होना चाहिए ताकि  विरोध का थोड़ा रसायन घो लकर इस दुनिया को पिला सके समय-समय पर

प्रेम

महीने के अंतिम तारीख को वो अपनी प्रेमिका से अपना खाली बंटवा  भरने की जिम्मेदारी देता है प्रेमिका उसे प्रेम समझते हैं महीने के अंतिम तारीख को वो कुछ इस तरह से घर में राशन का जुगाड़ कर पता है और पत्नी उसे प्रेम समझती है

शिव

हर पार्वती के हिस्से नहीं होते हैं शिव फिर भी वो अर्धनारीश्वरी के  रूप में  विचरती है इस धरा पर 

विकट समय पर तुम्हारा जाना

समय बहुत विकट था लेकिन उतना भी कठिन नहीं था कि तुम भाग गए सबसे पहले जो रिश्तों के कतार में सबसे आगे होने का दावा करता रहा | मैं  बुरे समय के कारण नहीं मारी गई बल्कि इसलिए मारी गई थी मेरे हृदय  के गर्भ में जहां तुम्हारे लिए अनुराग का जन्म हुआ था उस हृदय के गर्भस्थली में भारी रक्तपात हुआ था उस दिन और मेरी देह क्षीणतर होती गई थी | समय बहुत कठिन था पर उतना भी बुरा नहीं था कि मैं बच नहीं सकती थी मुझे तो मेरे  ह्रदय के गर्भ में जन्मे प्रेम ने मार डाला जो तुम्हारे लिए था  |

झूठ और सच का प्रपंच

झूठ और सच्च के बिच का प्रपंच पढ़ने लायक तो  साक्षर हूं मैं  तुमने खामखां मुझे  अनपढ़ों की श्रेणी में  रखने की भुल कर डाली 

पितृसत्ता

समंदर ने पानी उधार लिया है  नदियों से  नदियां जब सूख रही होती हैं  समंदर नहीं लौटता है नदियों के हिस्से का जल !  समंदर न्याय नहीं करता  नदियों के साथ जैसे पिता नहीं करते न्याय अपनी  बेटियों से !