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भाग 1        सुबह-सुबह सातण बाड़े से बैलों को खोलकर खारेगाँव के खेतों में हल चलाने लगा। ठंडी हवा के साथ ओस की बूँदें टपक रही थीं। पहाड़ और खेत पूरी तरह धुंध में डूबे हुए थे। जंगल के काफी भीतर तक खेत फैले थे , ऐसा लगता था, जैसे दोनों ओर से घना जंगल खेतों के ऊपर झुक आया हो। बैलों को हाँकते हुए सातण को जंगल से बंदरों की किच-किच और पेड़ों पर उनके छलाँग लगाने की आवाजें सुनाई दीं। जंगल में यह कैसी हलचल मची है ? वह कुछ समझ पाता, उससे पहले ही एक मोर अपने पंख समेटकर पेड़ पर आ बैठा। वह कुछ देर तक आवाज करता रहा, फिर उड़कर चला गया। कुछ संदेह और भय से सातण नायक सहम उठा और जोर-जोर से बैलों को हाँकने लगा। दोनों बैल हट्टे-कट्टे थे, मानो हल चलाते समय धरती को ही चीर डालेंगे।  इतने में वह जंगल से निकलकर खेत की सीमा पर आ खड़ा हुआ। पहले उसके शरीर से आती हुई तीव्र गंध नाक से टकराई, फिर प्रातःकाल के उस ताँबई-धूसर उजास में उसका आकार दिखाई दिया। सबसे पहले उसका पूरा मुख ही आँखों के सम्मुख उभरा। वह कोई साधारण बाघ न था, बल्कि एक विशाल बाघ था। उसे देखते ही सातण नायक के अंग-अं...
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