दो गज जमीन कोंकणी कहानी महाबलेश्वर सैल भूंयसुवात हरिराम का दादा जी बकरियाँ चराने का काम करता था। कभी मैदानों में तो कभी जंगलों में, अपनी बकरियों के झुंड के साथ भटकता रहता। उसके पास लगभग सौ बकरियाँ थीं। रात होने पर वह किसी न किसी किसान के खेत में बकरियों को बाँध देता। अक्सर शहर से दलाल उसे बकरियाँ खरीदने के लिए ढूँढ़ते हुए आते और एक साथ तीस-चालीस बकरियाँ खरीदकर ले जाते। लेकिन अगले साल तक बकरियों की संख्या फिर उतनी ही हो जाती। न हरिराम के दादा जी की पिछली किसी पीढ़ी के पास अपनी मालिकी की जमीन का एक टुकड़ा था, न हरिराम के दादा जी को कभी इस बात की लालसा हुई कि उसकी अपनी जमीन हो। उसे लगता ही नहीं था कि किसी एक जगह झोपड़ी खड़ी करके जीवन बिताया जाए। सुबह आँख खुलते ही वह अंतहीन आकाश को देखता और प्रसन्न हो उठता। उसे लगता, जैसे अनंत आकाश के नीचे फैली इस धरती का वही इकलौता राजा है। बकरियों को हाँकते हुए वह एक मैदान से दूसरे मैदान और एक जंगल से ...