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शिव

हर पार्वती के हिस्से नहीं होते हैं शिव फिर भी वो अर्धनारीश्वरी के  रूप में  विचारती है इस धरा पर 
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विकट समय पर तुम्हारा जाना

समय बहुत विकट था लेकिन उतना भी कठिन नहीं था कि तुम भाग गए सबसे पहले जो रिश्तों के कतार में सबसे आगे होने का दावा करता रहा | मैं  बुरे समय के कारण नहीं मारी गई बल्कि इसलिए मारी गई थी मेरे हृदय  के गर्भ में जहां तुम्हारे लिए अनुराग का जन्म हुआ था उस हृदय के गर्भस्थली में भारी रक्तपात हुआ था उस दिन और मेरी देह क्षीणतर होती गई थी | समय बहुत कठिन था पर उतना भी बुरा नहीं था कि मैं बच नहीं सकती थी मुझे तो मेरे  ह्रदय के गर्भ में जन्मे प्रेम ने मार डाला जो तुम्हारे लिए था  |

झूठ और सच का प्रपंच

झूठ और सच्च के बिच का प्रपंच पढ़ने लायक तो  साक्षर हूं मैं  तुमने खामखां मुझे  अनपढ़ों की श्रेणी में  रखने की भुल कर डाली 

पितृसत्ता

समंदर ने पानी उधार लिया है  नदियों से  नदियां जब सूख रही होती हैं  समंदर नहीं लौटता है नदियों के हिस्से का जल !  समंदर न्याय नहीं करता  नदियों के साथ जैसे पिता नहीं करते न्याय अपनी  बेटियों से !

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

आश्वस्त हूँ

..... जब जब मारी गई नदियां  तब तब नदी की देह पर उगी   पपड़ियों के इतिहास को देख  कई रातों तक सोई नहीं यह धरती  देखे उसने कितने ही अंतिम संस्कार  नदी की देह पर उगे विश्वासों के सदियाँ बीत गईं और औरतों के गर्भ से  मनुजों ने इस भूमि पर  स्थापित किया अपना साम्राज्य  पर वे जरा भी विचलित न हुए   उसी भूमि के नित्य होते गर्भपातों से रोज एक नए युद्ध की नीव पड़ रही  बारूदी सुरंगें धरती की कोख तक पहुँच रही तुम क्षमा मत करना धरती माँ  कि हम भर रहे हैं तेरा आंचल बारुद से  कि हम भर रहे हैं तेरी कोख तेजाब से  अंधाधुंध फैलते विकास के कारखाने  गला रहे तेरी काया रोज-ब-रोज मेरी कविताएँ उदास और अकेली हैं  कि एक दृश्य उभरकर आता है  कि उसे शब्दों का पोशाक पहनाकर  मैं चीखती हूं - अब बस करो मैं नहीं जानती मेरी चीखें किन पातालों और खोहों से गुजरती हैं नहीं जानती कहाँ तक पहुँच रही है मेरी आवाज लेकिन आश्वस्त हूँ शब्द बचे हैं जब तक हमारे सीने में  बची रहेगी यह धरती भी।

हिसाब नमक का

दिसंबर के जाने से  या फिर जनवरी के आने से  फरवरी के ठहरने से  भी क्या होगा  ? भाग्य में लिखा है  तुम्हारा न मिलना  और मेरा न लौटना कैलेंडर केवल कुछ पन्नों का महज एक दस्तावेज है मेरे लिए जिसकी हर तारिख पे नमक का हिसाब आज भी बाकी है