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संदेश

क्षणिकाएं

१) हम दोनों के संवादों में मेरा ह यह अक्षर इस बात का प्रमाण रहा हमेशा से आप कहते थे और हम सुनते थे । २) प्रथम मुलाकात में  बिच्छडते समय तुम्हारा यूं पलटकर देखना  काश अगली मुलाकात के  वादों पर आंखों से किया हस्ताक्षर होता । ३) उस दिन सरिता के आंखों का पानी सुख गया जिस दिन तुमने नदी किनारे बैठकर उसे मिटाने की योजनाओं को जन्म दिया । ४) बचाये रखना खुद को प्रेम में सर्वस्य अर्पण करने के पूर्व जैसे मृत्यु की दहलीज पर खड़ी सांसें निरंतर संचीत करती हैं भविष्य के लिए निधी । ५) तुम्हारे आवाज के स्पर्श की  एक अरसे से हो गई है  आदत सी जो छुती है  मेरी आत्मा को अब देह के स्पर्श का कोई मतलब नहीं रहा है । ६) आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे ।
हाल की पोस्ट

बालिका दिवस पर

अनचाहा  जन्म मेरा बड़ी माँ  खेती में पनपे अनचाहे धान को उखा़ड़कर फेंकती कुछ इसी तरह अनचाहा हुआ जन्म मेरा छत पर किसी  पौधे के उग आने से चितां में पड़ जाती थी दादी छत के टुटने के कुछ ऐसा ही रहा जन्म मेरा सुनाती है अक्सर पड़ोस की चाची दिये थे पिता ने भारी मन से दो रूपये दाई माँ को और ढेर सारी गालियाँ उस ईश्वर को याद आता है सचित्र वह दृश्य आज भी जब मैं बैठती थी मोड़कर पैर पीछे दद्दा देते खूब गालियाँ उनका मानना था तुम्हारे बाद लड़के का जन्म होगा और पीछे पैर डालने से उसका अपमान जैसे-जैसे बड़ी होती गई घर के हर कोने में मैने जगह बनाई और एक दिन बिना किसी के, मन के तालों को खोले हमेशा के लिए मै वहाँ से निकल गयी

सवाल करने पर

देहातों में औरतें गूंगी  रखी जाती हैं  होती नहीं  सवाल पूछने की  हिम्मत नहीं करती है  और पूछने पर  रक्त  बहती नदी  पीठ में उगाकर  कोने में पड़ी रहती हैं  उनकी हुंकार सुनकर  रात ओंस के बहाने  आंसू बहाती हैं  शहरों में आते-आते  यह स्थिति बदल जाती हैं  यहां सवाल पूछने पर  पीठ पर निशान नहीं  उग आते हैं  पर आत्मा को  छलनी छलनी कर  छोड़ा जाता है  रात के अंधेरे में  यह कोई हुंकार  नहीं निकलती हैं  बस शहर की औरतें  सारी रात अपने अंदर  सोक लेती हैं और बेजुबान बना  दी जाती है रोज थोड़ा थोड़ा  जहर पीकर  मृत्यु की ओर  प्रस्थान करती हैं  देहात में पीठ पर  जख्म छोड़े जाते हैं  तो शहर में आत्मा  पर घाव दिए जाते हैं

चुनाव का उत्सव

मैंने देखे हैं अपने गाँव में चुनाव के कई उत्सव कभी लोकसभा के तो कभी विधान सभा के तो कभी पंचायत के कहाँ होता था कोई फर्क जनता के लिये याद है मुझे मनभाता था गाड़ियों का  गाँव की कच्ची सड़कों पर धूल उड़ाना, बच्चो का गाड़ियों के पीछे भागना गाड़ी के पहियों के निशान का पीछा करना । और आज याद आ रहा है उन गाड़ियों का मुड़कर नहीं लौटना स्रियां खोलती थी अपनी संदूक  निकालती थी मँहगी साड़ियां  जो नहीं पहनी वे कई सालों से पांच-साल उत्सव पर पहनती थी वे सालों से तह रखी साड़ियां संविधान के पन्नों की गंध आती थी इन साड़ियाें से अब भी ताजी है संदूक के पल्लों की चे-चे और सीलन की गंध खेत खलिहान में रुक जाते थे हाथ  बैलों के गले की घंटियां  लौट आती थी सुबह सवेरे ही सैकड़ो कदम उठ पड़ते थे मतदान केंद्र की तरफ कंधे पर डाले नई धुली कमीज अधिकार के प्रदर्शन के लिये । किन्तु कोरे रह गये चुनाव में किये गए वादे किसान के कंधे पर रख कमीज की भांति  जिसे उसने कभी इस्तेमाल ही नहीं किया समय बदला  अधिकार के मायने बदले जाति-धर्म ने लिया संविधान का स्थान भोली जनता फिर गाड़ियों में भर-भरकर लिवा जाने लगी उन्हीं बड़ी -बड़ी गाड़ि

राजनीति

तुमने समस्याओं को फाइलों में  उलझाकर रखा था चुनावी मौसमों में  मंचन से रुझाया था हाथों के इशारे कर-करके जनता और नेताओं के बिच की दूरीयों को बताया था तुम्हारे बाप दादाओं ने अगर दलों में पसीना बहाया था तो क्या हुआ हमारे भी पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में खून बहाया था बस आज फर्क केवल इतना सा है तुम्हारे पूर्वजों के नाम से इतिहास बना है और  हमारे पूर्वजों के नाम से मिट्टी का रंग गहरा है ।

मुक्कमल कविता

भूख पर कविता लिखना  मुझे बेईमानी सा लगा हमेशा  नहीं देखा भूखे को कलम पकड़े  मेरे भोजन की फेहरिस्त मस्तिष्क में सदा रही मौजूद इसलिए मेरी अंतड़ियां  परिभाषित नहीं कर सकी भूख या फिर भूख ने कभी  बचपन में  नहीं फैलाया  मेरी आंखों में अपना साम्राज्य  न ही उसके हिस्से आया मेरा एक भी आंसू  ना ही मेरी जवानी पर कभी कुपोषण का रोग मंडराया  और आज जब मैं  भूख पर कविता लिखने बैठा  लगातार मेरे हाथ से कागजों की हत्या हो रही थी  अगले दिन सुबह की सैर पर  मैंने पाया सड़क किनारे  अधमरा सा एक आदमी  शून्य नजरों से ताक रहा था चाय नाश्ते का ढाबा उसके सामने कुछ निवाले रखे वापसी में मेरे साथ चल रही थी एक मुकम्मल कविता उसको रखा मैंने हमेशा से कागज़ और मंचन से खूब दूर उस कविता की अलग एक भाषा बना दी जिसमें केवल एक ही शब्द था रोटी  और उसके पाठक वही थे जो सड़क किनारे अधमरे बैठे थे

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।