सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

पर्वत जड़ नही होते हैं

पर्वत जड़ नहीं होते हैं  उसने सिखाई है आसमान को पानी की भाषा   वे नदी का माथा चूमकर  भेजते हैं उसे समंदर के पास  एक पिता की माफत पर्वत जड़ नहीं होते हैं  उसने सिखाई है मनुष्य के  आंखों की पुतलियों को  उंचाईयों की परिभाषा पर्वत जड़ नहीं होते हैं  उसने टहनियों पर बजाई है  हवा के साथ मिलकर धून और सुनाई हैं जंगलों को लोरियां  पर्वत जड़ नहीं होते हैं इस सृष्टि में सबसे जड़ है तो मनुष्य का ह्रदय
हाल की पोस्ट

एक कविता पर सच

तुम नहीं भूलते हो जरूरी और कीमतीं चीजों को ना ही तुम रखते हो उन्हें इधर-उधर पर अक्सर तुम गैरजरूरी चीजों को या फिर जिसमें न हो कोई लाभ उन्हें फेंक देते हो इधर उधर या फिर सालों पड़ी रहती हैं वो चीजें धूल के परतों के भीतर चाहे  सामान हो या कोई इंसान पर तमाम भूली हुई चीजें, रिश्ते तुम्हारी तरफ देखते रहती हैं तुम्हारी हर हरकत पर उनकी होती है नजर इस जहांन में सबसे ज्यादा वही चीजें या रिश्ते तुम्हें याद करती हैं जिन्हें तुमने बहुत कम कीमती या फिर गैरजरूरी समझा हो और एक दिन समय के पहले ही कुछ रिश्ते, चीजें अलविदा कह जाते हैं

एक अंश

उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त  जो तुम्हारे ह्रदय के गर्भ गृह में हो जाता है प्रेम से दाखिल  और तुम बसा लेती हो एकनिष्ठ एक ईश्वर की प्रतिमा  जिस दिन  तुम हठ करती हो एक कतरा उजाले की वो छीन लेता है  तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ। (एक अंश)

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो कुछ डायरियों के पन्नों पर नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढो़ते- ढ़ोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आँखे समय के पहले ही मुद ली थी ।

प्रतिक्षाएँ

प्रतिक्षाएँ  रेत की तरह  फिसलती हैं  आँखों में घड़ी की  सुई की तरह चुंभती हैं  घने बर्फबारी के बीच  प्रतिक्षाओं के क्षण  दावाग्नी के कण बन तपिश पैदा करते हैं  प्रतिक्षाएँ हथेलियों पर  नमक की खेतीं करकें  यादों की फसल कांटती हैं प्रतिक्षाएँ अनादि काल से  ओसरे पर बैठे बूढ़ी माई जैसी बनने पर  उस जगह से उठने का  संकेत देती हैं  प्रतिक्षाएँ सफल रही तो  अर्थ है नहीं व्यर्थ हैं

क्षणिकाएँ

तुफानों में रुकने से अधिक रास्ता साफ करना हमने मुनासिफ समझा नीव का साथ  छोडने पर  केवल मकान   खड़ा रहता है  घर नहीं भीगी हथेलियां  जब साथ के लिए  या फिर आशिर्वाद के लिए  उठती है तो  वो सबसे विश्वसनीय होती है उन्होंने सफर में खोये होते हैं  अनेक भरोसे के जहाज़

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादों को जब भी जीती हूं मेरी आंखों में एक गांव जीवित हो जाता है तुम्हारी यादों को जभी जीती हूं मुझे मेरी होने का एहसास हो जाता है तुम्हारी यादों को जब भी जीती हूं मेरे मेज़ पर पड़ी कलम कागज़ से लिपटकर खूब रोती है तुम्हारी याद मेरे साथ हर क्षण चलती हैं कभी मेरे पीछे आकर खड़ी होती हैं तो कभी धूप में छांव बन कर मेरे साथ चलती हैं तुम्हारी यादें सुबह की पहली किरण से रात के अंधियारे में तकिए पर खूब सीसकती है तुम्हारी यादें