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संदेश

श्रधांजलि

एक दिन हम गुम हो जायेंगे धरा से आप के कॉन्टैक्ट लिस्ट  में पडा़ नबर हमारा बिना मोल के सिक्के जैसा पडा़ रहेगा गुलाबी साड़ी में तुम्हारे आंगन में चढ़े मधुमालती के बेल पर प्रवासी चिड़िया की तरह कभी न लौटने के लिए आकर आंखें मुदे  बेठ जावुगी और एक दिन जब पक जायेंगे तुम्हारे बाल धिरे धिरे चिड़िया भी त्याग देगी अपने पंख एक दिन इमोजी वाला गुस्सा हमेशा टपक  पड़ता था आप के इनबॉक्स में वो धिरे धिरे निस्तेज पडा़ फूल की तरह मुरझा जायेगा और मेरे साथ मिट्टी हो जायेगा नारयल के पेड़ों ने भी सुनी है मेरी सिसकियां रात रात भर जगा है वो मेरे साथ मेरे मरने के उपरांत तुम एक दिन जाना उसके पास और सुनना मैंने जीया विरह मेरे प्रदेश के समंदर में तैरती मछलियों के पुतलियों ने धरा है मेरी आंखों का काजल और काली नदी ने पिये है मेरे आंसू तुम आना और बैठना नदी के पास और उतार लेना अपने मन में इस कावेरी कि विफल प्रेम गाथा और भरना अपनी कलम में स्नाह्यी और देना मुझे उपन्यास की एक श्रध्दांजलि
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गुुम हो जाना

बचपन में  उसे अच्छा लगता था गुम हो के रहना खास कर जब सूरज गुम होने की कगार पर होता और उसके गुम होने से अज्जी उसके नाम से बस्ती गुंजायमान करती गुम हो के रहती थी वो अक्सर गणित की कक्षा से इसीलिए तो आज भी नफा नुकसान में अधिकतर उठाया उसने नुकसान ही एक दफे हुई थी वो जवानी में जब गुम तब बस्ती में उसका नाम कम और उसके नाम के आगे बदचलनी के सर्वनाम अधिक जोडे़ गए थे एक दिन कर दी गई वो लाल जोड़े में बस्ती से गुम अब कभी कभार दिखाई देती है वो दरवाजा खोलने और बंद करने की कवायत में पर अक्सर बंद दरवाजे के भीतर से गुम ना होने  का अभ्यास करती बच्ची की ध्वनि गुंजायमान होती रहती है

जरूरी नही है

घर की नींव बचाने के लिए  स्त्री और पुरुष दोनों जरूरी है  दोनों जितने जरूरी नहीं है  उतने जरूरी भी है  पर दोनों में से एक के भी ना होने से बची रहती हैं  घर की नीव दीवारों के साथ  पर जितना जरूरी नहीं है  उतना जरुरी भी हैं  दो लोगों का एक साथ होना

तना हुआ वृक्ष

तुम देख रही हो ना नदी के तट पर नारियल के तने हुए वृक्ष असंख्य वे खड़े रहते हैं नदी के लिए हर अच्छे-बुरे मौसम में होना चाहता हूं मैं भी नारियल का वह वृक्ष खड़ा /झूमता /तना हुआ तुम्हारे लिए जीवन के सभी मौसम में तुम बनो नदी म ैं  बनूं नारियल का वृक्ष झूमता हुआ / तना  हुआ २३/०१/२०१७

वो एक आवाज

कोई सौ आवाजें दें तो कम से कम एक आवाज़ पर तो मुड़ लिया कीजिए किसे पता सांसों की या रिश्तों की आखिरी आवाज़ न बन जाए वो एक आवाज़।

रिश्तें

अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है ,और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को केवल किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तें को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | एक संवेदनशील और ईमानदार व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता है  और ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटनभरा समय और तकलीफ ही आती है |माना की इस तेज रफ्तार जीवन शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं 

बेटे के आस में जन्मी बेटियांँ

बेटे के आस में  पैदा की जाती रही बेटियाँ  वे बेटियांँ किसी बेल से  समय के पहले तोड़े हुए फल की तरह  अपरिपक्व मन से चली गई  और जिस दिन वे बेटियांँ  पिता और पति के घर की बिच वाली देहरीं पर खड़ीं रही  एक कतरा आंसू के साथ  उस दिन पिता ने अपनी आंखें  पीठ पर लगा दी और  माँ ने दरवाजे पर जमी  पराई भीड़  समझकर सांकल चढ़ा दी बेटे के आस में जन्मी बेटियांँ उदास मन से बार-बार लौटती रही