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नदी

सूरज के अस्त होने से  छा जाता है नदी के देह पर एक सन्नाटा मन में भर जाती एक उदासीनता  उसका अल्हडपन ढूंढती रहती है एक तलहटी जिसकी गहराई मे जा बैठती है वह  मौन हो  एक नई प्रतीक्षा की नदी फिर जी उठती है सूर्योदय के साथ ह
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औरतें पुल बनना नहीं चाहती है

औरतें पुल बनना नहीं चाहती हैं इन समाज के ठेकेदारों ने अपने निकम्मे झोली में से उन्हें वही शिक्षा दी सदियों से उसके कंधें  छीलते रहे पर तुम अपने अंहकार के चाबुक से उसे ढकते रहे उसका एक इंची भी सरकन तुम्हारे हत्यार बर्दाश्त न कर सके अपने जीव्हा पर अनंत काल से पड़े लोहे के ताले को अब वो तोड़ना चाहती हैं सड़कों को भी अब आदत डालनी पड़ेगी औरतों के मजबूत कदमों की औरतें पुल बनना नहीं चाहती हैं

सिंगल मदर

सिंगल मदर होना औरतें खुद से नहीं चुनती हैं !  बल्कि जब एक पुरुष गैर जिम्मेदार होता है ,उस स्थिति में अपने कंधों पर जिम्मेदारियों को उठाकर घर , नौकरी बच्चे इन तमाम चीजों के पिछे एक औरत खुद का जीवन भी जीना भूल जाती हैं । वह पूरी तरह से अपने बच्चों  के लिए समर्पित होती हैं और एक मोड़ ऐसा भी आता है,! जब कुछ पुरुष उनके अकेलेपन को दूर करने का दिखावा भी करते हैं और ऐसी स्थिति में कभी -कभी औरतें भी विश्वास कर बैठती हैं ! पर बहुत कम मामलों में पुरुष उनका साथ देते हैं नहीं तो हम अक्सर देखते हैं उनके हिस्से वही यातनाएं वही पीडा़ये आ जाती हैं ।  सिंगल मदर का जीवन उतना आसान नहीं होता है उन्हें  समाज में हर दिन एक नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है बच्चों के स्कूल से लेकर जहां वो रहती है जिस जिस रास्ते से गुजरती है हर जगह उन्हें प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा जाता है । कुछ तथाकथित पुरुष वर्ग उन्हें खुले मिठाई के डिब्बे की तरह मानता है पर उनका साथ देना नहीं चाहता है कुछ समय बाद बड़ी आसानी से पीठ दिखाकर नदारत भी हो जाता है। अक्सर उनके बच्चों के चेहरे पर पिता के साथ ना होने का जो दर्द उभरकर आता  है उसे न ज

एक रोज़

मैं अपने टुटे रिश्ते की मरम्मत रोज करती हूं मैं अपने आंसूओं को रोज तुम्हारे यादों की कश्ती में बिठाकर समंदर की सैर करवाती हूं मैं तुम्हें रोज़ आवाज देती हूं और रोज़ मेरे शब्द दीवार की आगोश में आत्महत्या करते हैं  और एक रोज़ ऐसा भी कुछ घटित होगा रोज़ का शोरों एक दिन अनन्त यात्रा में विलीन होगा और तुम तभी  मुस्कुराना  जैसे मुस्कुराती है मंद मंद एक नदी कावेरी की तरह समर्पित होने समंदर की बाहों में

तना हुआ वृक्ष

तना  हुआ वृक्ष तुम देख रही हो ना नदी के तट पर नारियल के तने हुए वृक्ष असंख्य वे खड़े रहते हैं नदी के लिए हर अच्छे-बुरे मौसम में होना चाहता हूं मैं भी नारियल का वह वृक्ष खड़ा /झूमता /तना हुआ तुम्हारे लिए जीवन के सभी मौसम में तुम बनो नदी म ैं बनूं नारियल का वृक्ष झूमता हुआ / तना हुआ ह २३/०१/२०१७

सच कहती हो तुम

तुम्हारी उदासियों से देखो  कैसी उड़ गई है  ओस की बूंदों की जान  सच कहती हो तुम खुशियां कितनी नाजुक होते हैं  तुम्हारी तरह  उदासियों को कर दो स्थगित १६/१२/२०१६

इन्तजार

दिन के उजाले  उस चिड़िया के लिए  जिसके पर रात भर  बेताब रहे  भरने को उड़ान  दिन के उजाले  उस तुलसी के लिए  जिसने किया है सारी रात  किसी बेवफा चांद का इंतजार ह ३०/१०/२०१६