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संदेश

युद्ध

कितने युद्धों की बनूँ मैं साक्षी  हर कदम की दूरी पर  नींव पड़ती नए युद्ध की  समेटने का क्रम नाकाफी विस्थापन का विस्तार  उजाड का फैलाव  होता जा रहा अनंत  न आप, न मैं कदाचित कभी न गुज़रेंगे युध्द की इति के उत्सव से यह फसल आयुधों की लहलहाती  पहुँचाएगी हमें  शायद  सृष्टि के पतझड़ तक कैसा यह विनाश का यह खेल ..

सागर तट

बैठती मैं सागर तट अकेली रेत का घर रोज बनाती थकती नहीं मैं सदियों से लहरे उसको रोज मिटाती लहरे कहाँ रिश्ता निभाती गुजर जाती एक पल में छुकर उस प्रेमी के भाँति जो छु जाता है केवल एक अंश जीवन का फिर भी तट पर मैं  रोज अकेली बैठी रहती ।

जिस दिन

जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

क्षणिकाएं

१ एक था चांद एक थी तुलसी  दोनों में प्रेम हुआ  चांद ने बादलों की आड़ में बेवफाई की  और मुंडेर पर बैठी तुलसी  ओस की बूंदों की आड़ में रोती रही । २ कुछ हाथ मरहम लगाने के  बहाने से आए तो थे पर  जख्मों को मेरा पता देकर चले गए । ३ बसंत ने तमाम रंग मेरे हिस्से कर दिए थे  पर तुम्हारी बेवफाई का रंग इतना गहरा था कि सब रंग खामोशी से मेरी जीवन से उतर गए । ४ दुनिया ने दिया दुःख  मैंने तुमसे बांटा  पर तुमने दिया दुःख  मैं किसी से बांट नहीं सकती । ५ धरा पर पड़ी बिवाईयां संकेत हैं  आसमान के रूठने की

कुएं पर पड़ी झुरियां

गांव के कुएं की देह अब झुरियों से भर गई हैं  मेंढकों ने भी शायद  वहां के बाशिंदों के मार्फ़त अपनी गठरी बांध ली हैं । बारिशों में  कुआं  मुमकिन होता तो  भीगने से खुद को  बचा लेता क्योंकि  उसके तृप्त होने का  उत्सव मनाने गगरी का  अब नृत्य नहीं होता है । क्या गांव के कुएं की देह पर पड़ती झुरियां  शहर - महानगरों की  नींव में पड़ते  ईटों के निशान है  या फिर मिट्टी को भूल  पेट की आग बुझाने के  मतलबी लोगों की पहचान है ।

आत्महत्याएं

कुछ आत्महत्याओं में  सच्चाई के पर्चें  नहीं खोले जाते हैं  हत्यारे के नाम पर  हमेशा कफन पड़ा रहता है  क्योंकि कुछ आत्महत्या  देह कि नहीं  आत्मा के होती हैं

सुनो ना

सुनो ना सुनो ना तुम्ह बनो कवि मै बनूँ तुम्हारी कविता तुम्हारे मन से बरस पडूँ छन छन लफ़्ज़ों की नदियों में उकेर दो तुम मुझमें एक प्रेमिका बन जाये  एक सिलसिला प्यार का समा जाऊं तुम्हारे कण कण मे बाँध दूं तुम्हारी चचंल गति मर्यादा में बन जाऊं तुम्हारी सीता तुम बनो मेरे राम उस कविता मे भर दो तुम कुछ रंग गुलाबी मै बह जाऊं उसमें निर्झर बनके सरिता जीवन की अँधयारे गलियों मे जला दो एक दिया प्रेम का थमा दो मेरे हाथ में एक टोकरी सुख की जिसमें कुछ रंग हो सजा दूं मै एक चित्र अगले जनम का जिसमें तुम रूक जाना अगले कई जन्मों तक भरूँ मैं अपने पंखो में उडान आऊं मै तेरे धाम  बाँध लू तुम्हे मै अपने केशों में जैसे बँधा होता है निर्मल जल मेघ में निहारता है चाँद तुलसी को निरतंर तुम बनो चाँद मै बनूँ तुम्हारी तुलसी उत्सव नही है ये एक दिन का युगों युगों का साथ है चाँद तुलसी का ह