सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्षणिकाएं



१

एक था चांद एक थी तुलसी 
दोनों में प्रेम हुआ 
चांद ने बादलों की आड़ में बेवफाई की 
और मुंडेर पर बैठी तुलसी 
ओस की बूंदों की आड़ में रोती रही ।


२

कुछ हाथ मरहम लगाने के 
बहाने से आए तो थे पर 
जख्मों को मेरा पता देकर चले गए ।


३

बसंत ने तमाम रंग मेरे हिस्से कर दिए थे 
पर तुम्हारी बेवफाई का रंग इतना गहरा था कि सब रंग खामोशी से मेरी जीवन से उतर गए ।


४

दुनिया ने दिया दुःख 
मैंने तुमसे बांटा 
पर तुमने दिया दुःख 
मैं किसी से बांट नहीं सकती ।


५

धरा पर पड़ी
बिवाईयां संकेत हैं 
आसमान के रूठने की

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

समर्पण का गणित

समर्पण का गणित हमेशा मेरे हिस्से ही क्यों ? क्यों तुम्हें लगा  बच्चों के नाम की बेडियां मेरे पैरों में डालकर स्वच्छंदता से तुम विचरते रहोगे  बाजार समझ मकान में लौटोगे जिसे घर बनाया मैंने संघर्ष की तपती रेत पर चलकर नहीं वे दिन कब के बीत गए मंगलसूत्र का एक धागा मांग में मौजूद थोड़ा सा सिंदूर  गर्भ में रचा तुम्हारा अंश  प्रमाण नहीं बनेंगे अब  तुम्हारे स्वामित्व का  तुम बेफिक्र घूमते रहे   समाज ने दी सिख लेकर औरत मां बनने के पश्चात  दहलीज पार नहीं कर सकती  पर अब बदलनी होगी  इस सिख की परिभाषा  अब रोपनी होगी मुझे ही भविष्य के नवनिर्माण की अभिलाषा