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संदेश

यह भी एक सच हैं

प्रेमीकाएं उम्रदराज होने पर त्यागी जाती है और यह मरणासन्न पीड़ा होती है  एक औरत के लिए वो टोटल टोटल कर लेती है अपने देह का जायजा लटकते स्तनों में खीचाव लाने की करती है भरकस प्रयत्न या फिर सोचती है शायद देह ने त्याग दी है उष्मा अब वो नही तपा सकती है अपने प्रेमी की देह या ढीली पड़ती उसकी कमर  समेटने का करती है एकाएक प्रयास तभी दूर से आता एक काफीला जो शमशान की राह लेता चार काधें पर जाता  मृतदेह देख  वो अपने शरीर को छुते हुए बुदबुदाती है आत्मा के पहले मेरी देह चली गई शमशान पर उसी प्रेमी के कधें पर होकर  जिसने कभी कहा था तुम्हारी देह जीतनी बुढी होगी मेरा प्रेम उतना ही गहरा 🙏

एक कविता

चालाकियां ईमानदारी और धुर्तता संसार के रंगमंच पर प्रमुख भूमिकाएं निभा रही हैं इस जंग लगे समय में ईमानदारी बेमनियों के घर पानी भर रही है कुछ तथाकथित नरियाँ अपने मुलायम उंगलियों के स्पर्श से कामयाबी के कंधे छू रही हैं वहीं कुछ पुरुष वक्र दृष्टि से आधी आबादी की बुद्धि की तरफ कम देह की और अधिक आकर्षित होता जा रहा है साधु संतों के भेष के पीछे धर्म कम और मंक्कारी और वासनाओं का बाजार अधिक फल-फुल रहा है सूरज की पहली किरण के साथ सच माथें पर काली पट्टी बांधे झूठ के दरबार में झुक कर सलाम कर रहा है पर परिवर्तन के नियम से कोई नहीं बचा है ना धरा ना आसमान ना इंसान समय का पहियां अपनी रफ्तार पकड़ लेगा कुम्हार के चाक पर फिसलती अनावश्यक मिट्टी की भांति बेइमानिक का यह फलता फुलता बाजार अस्तित्वहीन होकर नष्ट होगा पुनरुत्थान की किरणों पर बैठ सच दतुरी मुस्कान के साथ मुस्कुरा उठेगा

आना है कुछ इस तरह करीब

मन के पटल को धीरे से उँगली से स्पर्श कर उदासियों की धूल झाड़ दी  मन की खिड़कियाँ खोल दी समुचित आकाश को  निहारती  रही  दूर से किसी ने आवाज लगाई  करीब आते आते शाम हो गई उसने मंदिर के दीए की लो में  मेरे चेहरे पर फैली उदासियों  की चादर  अपने हाथों के स्पर्श से हटा दी और कहा उतना ही करीब आवुगा जिससे समिर  की गति में अवरोध न उत्पन्न हो   यामीनि के पंख जख्मी न हो  कहीं दूर दराज में गूंजती  संध्या वाणी में हमारी सांसों की  ध्वनि से व्यवधान न पड़े  हमें आना है करीब पर कुछ इस तरह  हमारे करीब आने की खबर से  हम भी बेखबर रहे  हमें आना है कुछ इस तरह करीब

अलगाव

अलगाव ये शब्द  एक अरसे से चल रहा है  मेरे साथ  यदाकदा आंखों से  बहता ही रहता है  आज सोचती हूंँ  इतनी बार ये शब्द  मेरी आंसुओं में बहा है  फिर भी इसका अस्तित्व  क्यों नहीं मिट रहा है ? हर रिश्ते में ये शब्द  इतनी शिद्दत के साथ  क्यों अपनी जगह बन जाता है शायद जिस दिन मैं  पूर्ण रूप से  टूट वृक्ष बन मिट्टी से उखड़ कर  मिटने की प्रार्थना करूंगी  उस ईश से उस  दिन ये  मेरे साथ ही दफ़न होगा  जब सांसें छोड़ देगी देह का साथ उस दिन मैं बिदा हो जाऊगी अंतिम इच्छा के साथ उम्रभर जीया जिन जिन  अपनों से अलगाव का दुख उनके आंखों से एक भी आंसू न बहे मेरे अलगाव में...  मृत्यु संवाद नहीं करती है

युध्द

दो देशों के बीच  जब युद्ध का ऐलान हुआ था  तब इस ओर से सरहद पार कर  एक तितली उस ओर  गई और उस ओर से एक तितली इस ओर आई दोनों सरहद पार कर  अलग-अलग देश में  कहीं दिनों तक रहे और लौट आए  इस तरह बेजुबान होकर भी  बहुत कुछ कह गए  और जुबान वाले विनाश की बमबारी करते रहे

अब खुद के पास रहना जरुरी लगने लगा है

तुम्हारी जाने के पश्चात मैंने गढ़ ली है  प्रेम की एक अलग सी दुनिया  जिसमें रात की टोकरी में  समय अपनी पैनी हथेलियों से  लिखता है चांद की पीठ पर मेरा विरह  तुम्हारे जाने के पश्चात  मैंने अपनी घर से वो तमाम राहें कर दी अलग   जहां से आती थी  मेंहदी और सिंदूर की महक  तुम्हारे जाने के पच्छात  मैं नहीं गुजरी उन चौराहों से  जहां मुझे अकेली औरत कम  और एक देह अधिक समझा जाता रहा तुम्हारे जाने के पश्चात  तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा के  दहलीज पर मैंने  एक पाषाण रख छोडा है अब  क्योंकि मुझे तुम्हारे लौटने से अधिक  मेरा खुद के पास अब रहना जरुरी लगने लगा है

काश

शाम जब  अंधकार की पोटली  खोल देती है  तब शिद्दत से महसूस होती हैं  किसी की कमी  काश वो जुगनू की तरह  कभी देता दस्तक  और इस भयावह रात के  डरावने क्षणों पर पंख फैलाकर बैठ जाता बिस्तरों पर पड़ी सिलवटें  गवाह है उन करवटों की  जो उस ओर का खालीपन  रात रात भर अपने भीतर  सोकती रही और शिद्दत से  महसूस करती रही  किसी के चले जाने के बाद उसकी कमी   सूरज की जेब से निकल आए  एक दिन ऐसा भी  चल पडू मैं किसी यात्रा पर  और दरवाजे पे ताला नहीं  किसी की प्रतीक्षा की आंखें लगी हो काश एक दिन ऐसा भी निकल आता