रात के दो बज रहे थे, फिर भी किस की यह मजाल है! कि इस महानगर की देह पर थोड़ी ही देर के लिए सही सन्नाटा पसरा दे । बस स्टैंड के बाहर की सड़क पर भारी भरकम ट्रकों की आवाजाही शुरू थी । सड़क दबकर उसकी सांसें भले ही फुल जाये पर वह चीख नहीं सकती उसका चिखना मानो उसके नियम के विरुद्ध होगा वह सड़क थी !उसे तो सबको ढोना होगा बिल्कुल वैसी ही कुछ चीखें इस समय मेघना के मन मस्तिष्क में उठ रही थी ,पर उनके ध्वनि पर अंकुश लगाना भी जरूरी था । पिछले तीन घंटे से वो यहां बैंठी थी । कितने ही मुसाफिर उसके बगल में बैठकर चले गए पर मेघना के पैर अपने आशियाने की तरफ नहीं उठ रहे थे । चारों तरफ लोगों का शोर पर उन सबसे मेघना उतनी ही बेखबर थी ! जितनी उसके इर्द-गिर्द की भीड़ मेघना से ! यहां मतलब के बिना कोई किसी पर एक क्षण भी खर्च नहीं करता है । मुर्दें को भी तब तक पूछा नहीं जाएगा जब तक वो अपने शरीर को गलाकर उसकी बदबू किसी के नाक में नहीं जमा करे...