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बेवफ़ाई का समंदर

रात बिरात 

एक कसक सी उठ जाती है

शब्दों को आंसुओं से भिगो कर 

जलाती हू एक दिया 

उसकी राख से 

दर्द का काजल

नैनों मे सजाती हूँ 

तुम्हारे बेवफाई के संमदर मे

तैरने लगता है

नैनों का काजल


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