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क्षणिकाएं

१.

बेलपत्र पर जब मैं
तुम्हारी प्रतिक्षा लिखकर
महादेव को अर्पण कर रही थी
ठीक उसी समय
दूर किसी वृक्ष पर एक चिड़िया
मिलन के बाद बिच्छड़ने का
गम गा रही थी ।

२.

मुझे बिहड़ में बिठाकर
मेरे सपनें मलबें में तब्दील कर
तुम चाहते हो मेरी कलम से
रंगीन तितलियों की
उन्मुक्त उड़ान मैं लिखूं ?


३.

कागज पर उतारी कविता
दुनिया पढ़ती है
पर पूर्णवीराम के बाद
कलम जो बिंदू उकेरती है
उसमें मेरे जीवन का सफर होता है
जिसे केवल तुम पढ़ सकते हो

४.

कुछ ने चाहा 
मैं खामोश रहूं
मैं खामोश रही
पर मेरी कलम
गुस्ताख़ी कर गयी ।

टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" आज बुधवार 27अक्टूबर 2021 शाम 3.00 बजे साझा की गई है....  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(२८-१०-२०२१) को
    'एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ'(चर्चा अंक-४२३०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर सारगर्भित क्षणिकाएं ।

    जवाब देंहटाएं
  4. पीड़ा को शालीनता से लिखा है आपने ,पर विरह का दर्द उजागर है।सृजन में।
    अभिनव सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  5. कलम की इसी गुस्ताखी ने खामोश रहने की शक्ति दी ...अब चन्द लोगों के लिए खामोश रहकर दुनिया से बतिया रही है लेखनी...
    लाजवाब सृजन
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं

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ईश्वर

ईश्वर  इन दिनों बीहड़ में बैठकर पाषाण पर लिख रहा है दस्तावेज सृष्टि के पुनर्निर्माण का उसके पहले वो छूना चाहता है जंगली जानवर के हृदय में स्थित प्रेम जिसका वह भूखा है सदियों से उसने खाली कर दी तमाम बैठकें जहां पाप के कीचड़ में पुण्यबीज बोने की इच्छाएँ जमा हो गई हैं  दिमागों को अंतिम आशीर्वाद देकर वो वहाँ से उठ चला है नदियाँ बीहड़ की तरफ मुड़ी हैं सुना है ईश्वर के चरणों के स्पर्श से बंधनमुक्त सांसें भर रही हैं  वनराई के सबसे ऊँचे तरू से बेल खींचकर ईश्वर ने पुरूषों के कदमों का माप लिया है कछुए के पीठ की कठोरता  उसने अपने कलम में भरकर  गढ़ ली है स्त्री की प्रतिमा।  तमस गुणों को नवजात के मुट्ठी में बंद करके ईश्वर ने बांध दिया है स्वार्थी मनुज को  दंन्तुरी मुस्कान में ।

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