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अबोध लड़की का दान



मुझे याद है
वो अबोध लडकी
अपने नन्हें हाथों से अपनी चोटियाें को संवारती
मुझे याद है
वो निच्छल चेहरा
लाल रंग की गुडिया
बस सपना था
हाथों से ककंड बीच सपनों को चुनना
जिस पर हरदम भय व अवसाद की मँडराती थी छाया

कहते हैं
माँ ने इस लडकी को
किसी और की गोद भरने के लिये
कर दिया दान
दे दिया गोद
दान तो होती हैं बेटियां
लेकिन यहाँ तो
बचपन ही छीन लिया

माँ शब्द का अर्थ
विषाद बना
मूक हुई वाणी उसकी
आँखें ही बोलती रही
वह भी अवसाद भरे
जख्मी शब्द

परिपक्वता
का दामन थाम लिया
मन की धरती पर कभी
किसी ने ममता के बीज न बोये
मन बोझ से दबा रहा
समय के पहले ही
पंखो को खोल दिया
नन्हीं सी पीठ पर
वक्त का भार झेल लिया
भूत से भविष्य तक
सोचती रही अबोध बच्ची
क्यों दिया दान बचपन में ही
क्यों दिया जाता है दान यौवन पर
क्यों होती है बटियों का ही दान

कावेरी

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1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है

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जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

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जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।