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अबोध लड़की का दान



मुझे याद है
वो अबोध लडकी
अपने नन्हें हाथों से अपनी चोटियाें को संवारती
मुझे याद है
वो निच्छल चेहरा
लाल रंग की गुडिया
बस सपना था
हाथों से ककंड बीच सपनों को चुनना
जिस पर हरदम भय व अवसाद की मँडराती थी छाया

कहते हैं
माँ ने इस लडकी को
किसी और की गोद भरने के लिये
कर दिया दान
दे दिया गोद
दान तो होती हैं बेटियां
लेकिन यहाँ तो
बचपन ही छीन लिया

माँ शब्द का अर्थ
विषाद बना
मूक हुई वाणी उसकी
आँखें ही बोलती रही
वह भी अवसाद भरे
जख्मी शब्द

परिपक्वता
का दामन थाम लिया
मन की धरती पर कभी
किसी ने ममता के बीज न बोये
मन बोझ से दबा रहा
समय के पहले ही
पंखो को खोल दिया
नन्हीं सी पीठ पर
वक्त का भार झेल लिया
भूत से भविष्य तक
सोचती रही अबोध बच्ची
क्यों दिया दान बचपन में ही
क्यों दिया जाता है दान यौवन पर
क्यों होती है बटियों का ही दान

कावेरी

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जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

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