१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब चिंता की रेखाएं सड़कों पर चलते माथे की लकीरों ने क्या कभी की होगी कोशिश होगी सिलवटों के न उभरने के गणित को बिगाड़ने की। २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 17 फ़रवरी 2022 को लिंक की जाएगी ....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
वाह!गज़ब 👌
जवाब देंहटाएंसराहनीय सृजन।
सादर
बहुत सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंवाह ! उन चोटों का क्या जो दिखाई नहीं देतीं ।
जवाब देंहटाएंमार्मिक
जवाब देंहटाएंगहन सटीक भावाभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंबहुत गहन ।
जवाब देंहटाएंआज कल तो देह के हत्यारों पर भी कफन पड़ा रहता है क्यों कि नाम सामने पता होते हुए भी साबित नहीं हो पाता ।