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जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी
तो रोने वाले ना के बराबर थे 
जो थे वे बहुत दूर थे 
खामोशी से श्मशान पर 
आग जली और 
रात की नीरवता में 
अंधियारे से बतयाती बुझ गई 

कमरे में झांकने से मिल गई थी
 कुछ सुखी कलियां 
जो फूल होने से बचाई गई थी 
जैसे बसंत को रोक रही थी वो
 कुछ डायरियों के पन्नों पर
 नदी सूखी गई थी 
तो कहीं पर यातनाओं का
वह पहाड़ था जहां
उसके समस्त जीवन के
पीडा़वों के वो पत्थर थे
जिसे ढोते ढोते
उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी

कुछ पुराने खत जिस पर 
नमक जम गया था 
डाकिया अब राह भूल गया था
मरने के बाद उस औरत ने 
बहुत कुछ पीछे छोड़ा था 
पर उसे देखने के लिए 
जिन नजरों की  आज
जरूरत थी 
उसी ने नजरें फेर ली थी 
इसीलिए तो उस औरत ने 
आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

टिप्पणियाँ

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०८-०१ -२०२२ ) को
    'मौसम सारे अच्छे थे'(चर्चा अंक-४३०३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही मार्मिक व हृदयस्पर्शि सृजन

    जवाब देंहटाएं
  3. मार्मिक रचना, हरेक के हिस्से में आते हैं कुछ पहाड़ और कुछ सूनी घाटियाँ जिनसे बच निकलने की कोशिश हर कोई करता है

    जवाब देंहटाएं
  4. अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति आदरणीय , बहुत शुभकामनायें ।

    जवाब देंहटाएं
  5. ओह ! बहुत ही मार्मिक एवं भावपूर्ण रचना ! अत्यंत सुन्दर अभिव्यक्ति ! हार्दिक शुभकामनाएं !

    जवाब देंहटाएं
  6. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 09 जनवरी 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
  7. हृदय को झकझोरती मर्मस्पर्शी रचना।
    अविस्मरणीय।

    जवाब देंहटाएं
  8. मार्मिक और हृदयस्पर्शी रचना । जीवन की गहरी अनुभूति का परिचय करा गई ।

    जवाब देंहटाएं
  9. मार्मिक ह्रदयस्पर्शी रचना,एक एक शब्द ह्रदय छू जातें हैं।

    जवाब देंहटाएं

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