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जनता और सत्ता

१)

सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं
कभी कोई सिलवटें 
जबकि झोपड़ियों के भीतर
जन्म लेती हैं बेहिसाब
  चिंता की रेखाएं 
सड़कों पर चलते 
माथे की लकीरों ने 
क्या कभी की होगी कोशिश होगी 
सिलवटों के न उभरने के गणित को 
बिगाड़ने की। 

२)

सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा
राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला
चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा 
या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला

३)

जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं 
उसी कटोरे को लेकर हर बार
हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं
आजादी से लेकर अब तक 
जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है
हमारे सांसों के साथ 
वो मनमर्जी से हर बार खेला है

सरिता सैल

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जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

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