गांव के कुएं की देह
अब झुरियों से भर गई हैं
मेंढकों ने भी शायद
वहां के बाशिंदों के मार्फ़त
अपनी गठरी बांध ली हैं ।
बारिशों में कुआं
मुमकिन होता तो
भीगने से खुद को
बचा लेता क्योंकि
उसके तृप्त होने का
उत्सव मनाने गगरी का
अब नृत्य नहीं होता है ।
क्या गांव के कुएं की
देह पर पड़ती झुरियां
शहर - महानगरों की
नींव में पड़ते
ईटों के निशान है
या फिर मिट्टी को भूल
पेट की आग बुझाने के
मतलबी लोगों की पहचान है ।