सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

कलम कि नोंक पर चढकर हर अन्यायी मुस्कुराता है कच्ची देंह से रिसता  खून बेईमानी की जेब से बहता है विकास का हर पन्ना सोता है पक्ष क्या विपक्ष क्या संसद की चारदिवारी में चुपके चुपके हँसता है किसानों के देह पर कफन ओढ़ा कॉपरेट दुनिया का चेहरा मुस्काता है
इन्तजार हर कण में होता है निहित जन्म से लेकर मरण तक दुख से लेकर सुख तक फिर हो वो व्यवहार का बाजार या हो वो भावनाओं  का संसार निहारना कभी उस उदास चेहरें को बेच रहा है जो गंली चौराहे पे झाडू बरतन सब्जी खिलौना इन चीज़ों के साथ साथ लेकर घूमता  है वो एक इंतजार सर का बोझ होकर थोडा सा हल्का पुँहच जाता है उसकी जेब तक खत्म होता है तब चंक्की चूल्हे का इन्तजार सरहदों पे तैनात है अनगिनत इन्तजार बूढ़े  चश्मे को बेटे के लौटने का इन्तजार जीवन  संगिनी को है मिलन का इन्तजार एक कदम के सरहदों से लौटने से खत्म होते है कही कही इन्तजार वंसुधरा को भी है इन्तजार उसकी बंजरता के खत्म होने का कुम्हार के चाक को भी है इन्तजार फिर से जीवन की गति  लिये दौडने का गाँव भी कर रहा है एक इंतजार शहर का फिर से लौटने का।  कावेरी
तुम्हें मैं खोजती हूँ कँटीले पर्वत पर नहीं मिलते तुम मखमली गलियारों पर तुम्हारे पैरों के छाले अक्सर बताते हैं पहाडों बियाबानों का पता नहीं मिलते हो तुम तालाबों झरनों के पास तुम अक्सर दौडते हो रणभूमि के पास कराह रहे हैं जहाँ कहीं कहीं सांसें चाँद कि गोलायियों को नहीं नापते तुम मेरे चेहरे की खूबसूरती से ढूँढते हो तुम उसमें रोटी की विवशता को और फिर पाती हूँ तुम्हें मंदिर मस्जिद गिरजाघरों की सीढ़ियों पर जहाँ दंतुरी मुस्कान भूख सह रही है पीढ़ियों से जाकर खडी होती हूँ मै प्रथम मुलाकात के मोड पे पर वहाँ नही पाती हूँ मैं तुझे तुम होते हो किसी बुढी माँ के ओसारे पर जहाँ सूरज कि प्रथम किरण से चाँद की शितलता तक इन्तजार में रिस रही है बुढी आँखे इन्हीं सबसे तुम्हें प्रेम है और तुम्हारे सब से मुझे प्रेम है .... कावेरी
तुम्हारा आना चाँद का आसमान में यूँ चले आना हौलें से मेरे दिल में तेरा दस्तक देना सूरज की किरणों का यूँ मुझ पर चमकना खुलें से मेरे माथे की बिंदी को तेरा चूम लेना कोयल का मेरी छत पर यूँ आकर कूकना हौलें से तेरे क़दमों की चहलक़दमी का उभरना धान की बालियों संग पवन का यूँ झूल जाना हॉल से मेरे कानो में तेरा नाम यूँ आकर गुनगुनाना संध्या में मंदिर के घंटी का यूँ बज जाना हौलें से मेरे ह्रदय मे तेरा ईश्वर बन जाना ।।
सड़क मेरे गाँव आयी थी एक सड़क उसे देखने पूरा  गाँव चला चलते चलते पुँहचा शहर वहाँ कुछ सड़के मिली और मेरा गाँव सड़को की कतार में गुम हो गया आज सड़क टूटी है मंरम्मत के लिये रूठी है अब फिक्र नही सरकार को जब से अँगुठे ने पकडी है शहर की रफ्तार को यदा कदा दो जोडी आँखे रहती है सड़क पर खडी और जर्जर कन्धों पर सवार श्मशान की तरफ निकलती है रोज सूरज आता है आँगन में बच्चों की किलकारियाँ न पाकर समय के पहले ही लौट जाता है चाँद भी थोडा सकुचाता है टूटी छतों पर गिरते समय विस्थापित सा महसूस करता है जिस दिन सड़क से शहर का सफर तय किया गया उस दिन खलिहानों  से पंगडण्डीयों का सफर खत्म हुआ . 
शैल पुत्री शैल पुत्री सरिता मैं निर्झर बहती रहती हूँ हर चट्टानों को हर सीमाओं को मैं लाँघती रहती हूँ नगर-नगर डगर-डगर जीवन भरती रहती हूँ जन-जन के उर में नव प्राण भरती रहती हूँ जहाँ जहाँ से गुजरी मैं वहाँ-वहाँ जन्मी सभ्यता जहाँ जहाँ ठहरी मैं वहाँ-वहाँ बसी मानवता नदी हूँ चलते रहना मुझे रूके कभी ना मेरे पांव ढूँढ रही मैं एक किनारा बने जो एक मेरा ठांव यात्रा मेरी जीवन सी, मिली अवेहलना हर्ष-दुत्कार सभी स्री जीवन है ही ऐसी हर भाव मुझे स्विकार अभी जब जब समाज ने चाहा धो दूँ उनके पापों का अंकुर समझा उनको मैने, जीवन यह नश्वर क्षणभंगुर शैल पुत्री सरिता मैं निर्झर बहती रहती हूँ