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संदेश

तुम्हें मैं खोजती हूँ कँटीले पर्वत पर नहीं मिलते तुम मखमली गलियारों पर तुम्हारे पैरों के छाले अक्सर बताते हैं पहाडों बियाबानों का पता नहीं मिलते हो तुम तालाबों झरनों के पास तुम अक्सर दौडते हो रणभूमि के पास कराह रहे हैं जहाँ कहीं कहीं सांसें चाँद कि गोलायियों को नहीं नापते तुम मेरे चेहरे की खूबसूरती से ढूँढते हो तुम उसमें रोटी की विवशता को और फिर पाती हूँ तुम्हें मंदिर मस्जिद गिरजाघरों की सीढ़ियों पर जहाँ दंतुरी मुस्कान भूख सह रही है पीढ़ियों से जाकर खडी होती हूँ मै प्रथम मुलाकात के मोड पे पर वहाँ नही पाती हूँ मैं तुझे तुम होते हो किसी बुढी माँ के ओसारे पर जहाँ सूरज कि प्रथम किरण से चाँद की शितलता तक इन्तजार में रिस रही है बुढी आँखे इन्हीं सबसे तुम्हें प्रेम है और तुम्हारे सब से मुझे प्रेम है .... कावेरी
तुम्हारा आना चाँद का आसमान में यूँ चले आना हौलें से मेरे दिल में तेरा दस्तक देना सूरज की किरणों का यूँ मुझ पर चमकना खुलें से मेरे माथे की बिंदी को तेरा चूम लेना कोयल का मेरी छत पर यूँ आकर कूकना हौलें से तेरे क़दमों की चहलक़दमी का उभरना धान की बालियों संग पवन का यूँ झूल जाना हॉल से मेरे कानो में तेरा नाम यूँ आकर गुनगुनाना संध्या में मंदिर के घंटी का यूँ बज जाना हौलें से मेरे ह्रदय मे तेरा ईश्वर बन जाना ।।
सड़क मेरे गाँव आयी थी एक सड़क उसे देखने पूरा  गाँव चला चलते चलते पुँहचा शहर वहाँ कुछ सड़के मिली और मेरा गाँव सड़को की कतार में गुम हो गया आज सड़क टूटी है मंरम्मत के लिये रूठी है अब फिक्र नही सरकार को जब से अँगुठे ने पकडी है शहर की रफ्तार को यदा कदा दो जोडी आँखे रहती है सड़क पर खडी और जर्जर कन्धों पर सवार श्मशान की तरफ निकलती है रोज सूरज आता है आँगन में बच्चों की किलकारियाँ न पाकर समय के पहले ही लौट जाता है चाँद भी थोडा सकुचाता है टूटी छतों पर गिरते समय विस्थापित सा महसूस करता है जिस दिन सड़क से शहर का सफर तय किया गया उस दिन खलिहानों  से पंगडण्डीयों का सफर खत्म हुआ . 
शैल पुत्री शैल पुत्री सरिता मैं निर्झर बहती रहती हूँ हर चट्टानों को हर सीमाओं को मैं लाँघती रहती हूँ नगर-नगर डगर-डगर जीवन भरती रहती हूँ जन-जन के उर में नव प्राण भरती रहती हूँ जहाँ जहाँ से गुजरी मैं वहाँ-वहाँ जन्मी सभ्यता जहाँ जहाँ ठहरी मैं वहाँ-वहाँ बसी मानवता नदी हूँ चलते रहना मुझे रूके कभी ना मेरे पांव ढूँढ रही मैं एक किनारा बने जो एक मेरा ठांव यात्रा मेरी जीवन सी, मिली अवेहलना हर्ष-दुत्कार सभी स्री जीवन है ही ऐसी हर भाव मुझे स्विकार अभी जब जब समाज ने चाहा धो दूँ उनके पापों का अंकुर समझा उनको मैने, जीवन यह नश्वर क्षणभंगुर शैल पुत्री सरिता मैं निर्झर बहती रहती हूँ
तुम्हारा जाना महज भीड़ में से केवल एक चेहरा गायब होना नही था मेरे शहर का खाली होना था कावेरी

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    विस्थापन ======≠============ विस्थापितों के कोलाहल से भरी पडी है महानगरों की गलियां, चौराहे, दुकानें सोंधी मिट्टी सी देह सन रही है काले धुँऐं से थके हुए मन को फुर्सत नहीं लौटने की पंछी को मिल रहा है बना बनाया घर वे भूल रहे हैं हुनर घोंसलों का मुर्गे ने छोड़ दी है पहरेदारी समय की जैसे सूरज की परिक्रमा नहीं करती पृथ्वी हो गई है हद ! अब पीठ भी विस्थापित हो रहे हैं बोरियां उठा रही हैं मशीने खाली पीठ को याद आती है गेहूँ की बोरियाँ भूसे की गंध डीज़ल की गंध से मिट रही है हरियाली के बचे खुचे निशान सुना है अब कि कंक्रीट का जंगल पसर रहा है अमरबेल की तरह गाँव -गाँव, घर -घर खेती की नाज़ुक देह पर देखे जा सकते हैं, लौह अजगर के दांतों के निष्ठुर निशान..!! *************