भाग 1
सुबह-सुबह सातण बाड़े से बैलों को खोलकर खारेगाँव के खेतों में हल चलाने लगा। ठंडी हवा के साथ ओस की बूँदें टपक रही थीं। पहाड़ और खेत पूरी तरह धुंध में डूबे हुए थे। जंगल के काफी भीतर तक खेत फैले थे , ऐसा लगता था, जैसे दोनों ओर से घना जंगल खेतों के ऊपर झुक आया हो। बैलों को हाँकते हुए सातण को जंगल से बंदरों की किच-किच और पेड़ों पर उनके छलाँग लगाने की आवाजें सुनाई दीं। जंगल में यह कैसी हलचल मची है ? वह कुछ समझ पाता, उससे पहले ही एक मोर अपने पंख समेटकर पेड़ पर आ बैठा। वह कुछ देर तक आवाज करता रहा, फिर उड़कर चला गया। कुछ संदेह और भय से सातण नायक सहम उठा और जोर-जोर से बैलों को हाँकने लगा। दोनों बैल हट्टे-कट्टे थे, मानो हल चलाते समय धरती को ही चीर डालेंगे।
इतने में वह जंगल से निकलकर खेत की सीमा पर आ खड़ा हुआ। पहले उसके शरीर से आती हुई तीव्र गंध नाक से टकराई, फिर प्रातःकाल के उस ताँबई-धूसर उजास में उसका आकार दिखाई दिया। सबसे पहले उसका पूरा मुख ही आँखों के सम्मुख उभरा। वह कोई साधारण बाघ न था, बल्कि एक विशाल बाघ था। उसे देखते ही सातण नायक के अंग-अंग में भय की कंपकंपी दौड़ गई। उसने धीरे-धीरे हल रोक दिया। फिर वहाँ से पीछे हटकर कुछ दूर जा खड़ा हुआ और निःशब्द, स्तब्ध भाव से उस बाघ को देखने लगा। बैल उसे देखते ही डर गए। बाघ बैलों पर नजरें गड़ाए धीमी चाल से उनकी ओर बढ़ रहा था। अचानक उसने छलाँग लगाई और अपने पंजों तथा दाँतों से लाल बैल की गर्दन दबोचकर उसे धराशायी कर दिया। जू बिच में से टूट गया टूटा हुआ जू और कटाई गले में लेकर शिवरा बैल जंगल की तरफ भाग गया गया। जंगल के किनारे खड़े सातण नायक की तरफ बाघ ने गुर्राते हुए देखा और फिर झाड़ियों में घुसकर पहाड़ की ओर चला गया। देर तक उसकी गुर्राहट सुनाई देती रही। जंगल के जानवरों में भगदड़ मच गई। सातण गँड़ासा हवा में घुमाते हुए जोर-जोर से चिल्लाने लगा। लाल बैल की गर्दन की शिराएँ फटकर लोथड़ों में बदल गई थीं। बाघ के तीक्ष्ण दाँत और पंजे उनके गर्दन के भीतर तक धँस गए थे। सातण बैल के पास बैठकर देर तक रोता रहा। फिर रोते-रोते हल वहीं छोड़कर बस्ती में लौट आया।
सातण को छाती पीट-पीटकर रोते देख सब बस्तीवाले बस्ती की सीमा पर इकट्ठा हो गए। सातण ने उन्हें सारी घटना सुना दी। बस्तीवाले भयभीत हो गए। गाँववाले डर-डरकर अपना रोजमर्रा का काम कर रहे थे। उनकी मान्यता थी कि गले में रस्सी और जुआँ हो तो शेर बैल का शिकार नहीं करता। पर गर्दन पर जुआँ होते हुए भी बैल मार दिया गया था। इस तरह जुएँ का टूट जाना भी अशुभ माना जाता था।
हे ईश्वर! यह कैसा अनिष्ट है?
चार दिन बाद, सोमवार को शिरवाड़ी में नायक कुल के कुलदेवता की पूजा होनी थी। गाँव का हर व्यक्ति डरा हुआ था। सबको लग रहा था कि आने वाले संकट से भगवान ही बचा सकते हैं। वही गाँव की रखवाली कर सकते हैं। इसलिए भगवान की पूजा-अर्चना ठीक से होनी चाहिए। भगवान की पूजा-अर्चना का काम इस साल वेकु नायक के जिम्मे था। गाँववालों ने भगवान के कार्य के लिए दो बीघा खेती की जमीन अलग से रख छोड़ी थी। जिसके हिस्से पूजा करने का जिम्मा आता, वह उस खेत में फसल उगाता और बदले में पूरे साल भगवान की पूजा करता। यह रिवाज वर्षों से चला आ रहा था।
गाँव की शामलाती चीजें जैसे हंडियाँ, लामण दीया, पुश्तैनी तलवार, ढोल, घुम्मट और पूजा का दूसरा सामान इसी घर में पूरे साल के लिए रखा रहता था। हर सोमवार उसी घर से भगवान की पूजा होती। गाँव की रखवाली करने वाले सभी देवी-देवताओं के लिए हर साल जोगवनी और जागरण करना, गोसाई को भोजन के लिए बुलाना, होली आदि त्योहारों पर दूसरे गाँवों से होली खेलने आने वालों का मान-सम्मान करना—ये सभी कार्य उसे एक वर्ष तक करने पड़ते थे।
सोमवार की एक शाम म्हादू पुजारी बहुत लंबा, दो मन वजनी सींग बस्ती की सीमा पर लेकर आया और बेल के पेड़ के नीचे खड़ा होकर जोर-जोर से सींग फूँकने लगा। उसकी ध्वनि पूरे आदोळशी गाँव में चारों ओर गूँज उठी। गाँववालों को पता चल गया कि आज शिरवाड़ के नायक परिवार की पूजा है। आज पूजा में अच्छा-खासा पोहे का प्रसाद मिलेगा। एक हाथ में प्रसाद की थाली और दूसरे हाथ में तेल का कटोरा लिए वेकु नायक आया। उसके पीछे उसका बड़ा लड़का जलती हुई मशाल लेकर चल रहा था। दस साल की पोती ने हाथ में नारियल पकड़ रखा था। वे पहले मुख्य देवालय के पास गए। फिर खुटीमाँ के यहाँ होते हुए ब्रह्मदेव के पास पहुँचे। हर देवता के सामने इस तरह सींग बजाया जा रहा था पूरी बस्ती गूँज उठे । वेकु नायक ने पत्थर से बनी दियली में तेल डालकर दीया जलाया और पोहे का प्रसाद रखकर मनौती माँगी।
वहाँ से वे सातेरी देवी के मंदिर की ओर चल पड़े। रास्ते में दो बड़े स्तनों जैसे पत्थर के भग्नावशेष पड़े थे। उनका सिर और कमर के नीचे का हिस्सा गायब था। लोग उन्हें राक्षसनी के स्तन कहते थे। कहा जाता था कि जब राक्षसनी कृष्ण को विष पिलाने आई थी, तब कृष्ण ने उसे धक्का दे दिया था। तब राक्षसनी टुकड़े-टुकड़े होकर गाँव के पहाड़ों पर जा गिरी थी। किसी सिरफिरे ने उसके स्तनों को उठाकर माथे पर रखकर यहाँ बस्ती में लाकर फेंक दिया था। लोगों का यह भी कहना था कि अमावस्या के दिन इन दोनों स्तनों से विष रिसता है और बड़े-बड़े नाखूनों वाला एक उल्लू आधी रात को आकर उस विष को चूसता है। जब तक वह उल्लू है, तब तक बस्तीवालों को डरने की कोई जरूरत नहीं। आज भी उस पत्थर के सामने से गुजरते हुए वेकु नायक को ऐसा आभास हो रहा था, जैसे उन स्तनों से विष रिस रहा हो और वे गीले हो गए हों।
बस्ती में सभी देवी-देवताओं के बीच सातेरी देवी का बना एक छोटा-सा मंदिर था। उसे केवल सोमवार के दिन ही खोला जाता था। बाकी दिनों में टाट लगाकर मंदिर बंद रखा जाता। सातेरी मतलब एक बहुत बड़ा और ऊँचा बाम्बी था। उस पर मिट्टी के छोटे-बड़े बहुत-से लिंग बने हुए थे। रोज एक-न-एक लिंग उभरकर आता था। यह वल्मीक कब बना और किसने इसकी पूजा शुरू की, किसी को पता नहीं था। हो सकता है, इन लोगों के यहाँ बसने से भी पहले का हो। वह आदिकाल से बनता आया था और हर साल उसका निर्माण होता ही जा रहा था। उसका मूल पाताल तक फैला होगा। उसमें कीट-पतंगे, चींटियाँ और अनेक प्रकार के साँप तथा दूसरे जीव शाश्वत रूप से निवास करते थे। धरती की तरह ही अमर, सर्वसमावेशक और धरती के गर्भ से निकला हुआ धरती माँ का ही एक अंश था वह। सातेरी के सामने शिंग—बिगुल—फूँके गए। फिर बेटे के हाथ से मशाल लेकर वेकु नायक ने दीया जलाया और पोहे का भोग चढ़ाकर साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। उसने मनौती माँगी—
“हे सातेरी देवी! धन-धान्य, कंद-मूल, फूल और पेड़-पौधे तुम्हारी ही कृपा से फलते-फूलते हैं। प्रथम धान का यह निवाले का भोग तुम्हारे चरणों में रखने के बाद ही हम इसे घर के भीतर ले जाएँगे और बाल-बच्चों को खिलाएँगे। कृपया इस भोग को स्वीकार करो। हर साल की तरह इस बार भी हमारी मिट्टी को उपजाऊ होने का आशीर्वाद दो। धन-धान्य, पेड़-पौधों और छाया पर, बारिश पर तुम्हारी कृपादृष्टि बनी रहे।”
इसके बाद उसने पोती के हाथ से नारियल लिया और वल्मीक पर रखते हुए कहा, “यह हम आपको अर्पित करते हैं।”
अगले सोमवार तक वल्मीक इस नारियल को अपने गर्भ में समेट लेगा—ऐसा गाँववालों का विश्वास था।
शाम को वह सातेरी मंदिर को टाट लगाकर बंद करने गया। उसने देखा कि मंदिर के आँगन में दो-चार मर्द तनकर खड़े थे। उन सबने खुले बदन पर केवल लंगोटियाँ पहन रखी थीं। वे गुस्से से आगबबूला हो रहे थे। उनके नथुने फूले हुए थे और नाक से सूँ... सूँ... की आवाज निकल रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे वे अभी-अभी जंगली सूअर का शिकार करके जंगल से लौटे हों।
बस्ती के ज्यादातर लोग सोमवार शाम की पूजा में नहीं आते थे। पूजा के बाद हर घर में पोहे का प्रसाद पहुँचा दिया जाता था। तभी सबको पता चलता था कि पूजा हो गई है।
पर इस समय ये लोग यहाँ क्यों आए हैं?
म्हाबळू नायक क्रोधित होकर बोला, “वेकु भैया, गाँव में इन दिनों बहुत अनिष्ट घट रहा है। क्या इस बारे में तुमने भगवान से सवाल किया? हमारे गोरू कीचड़ में फँसकर मर रहे हैं। नारियल के पेड़ों से कच्चे नारियल गिरकर खराब हो रहे हैं। गले में रस्सी और जुआँ होने के बावजूद बाघ बैलों पर हमला कर रहा है। यह सब क्या है? तुम्हारी पूजा-अर्चना ठीक से शायद नहीं हो रही है, या फिर भगवान की कृपादृष्टि हम पर से उठ गई है। अगर भगवान इस तरह पत्थर बना रहेगा तो फिर हम उसे किसी तालाब में डुबो देंगे, नहीं तो सरहद पार गाड़ आएँगे।”
अब बबूटो भी चिल्लाया, “गाँव की रक्षा नहीं होती तो ऐसा भगवान हमें क्यों चाहिए? क्यों उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए? भगवान को भोग चढ़ाने का क्या फायदा? वेकु!
भगवान से सवाल करो। पूछो उस भगवान से।” एक और आदमी बोला, “अब लोगों के पाप बढ़ गए हैं। आँखों के सामने बेल पर लगा फल गायब हो जाता है। खेत की सीमा पर लगा पत्थर एक ही रात में खिसक जाता है। यशा नायक के खलिहान से रातों-रात मोळनी करके धान का ढेर चुरा लिया गया और साळु देवदासी के घर पहुँचा दिया गया। किसने गुड़-पोहे बनाकर खाए थे? ये सब पाप अब भुगतने पड़ेंगे।”
दूसरा बोला, “वेकु भैया, अब हमें असल मुद्दे से मत भटकाओ। भगवान की छत्रछाया में होते हुए भी लोगों के मन में पाप करने की इच्छा क्यों जगी? उसका बंदोबस्त भी भगवान को ही करना होगा। नहीं तो यहाँ से भगवान को निकलना होगा। तुम भगवान से सवाल पूछो कि तुम्हारे होते हुए भी यह सब क्या हो रहा है?”
वेकु नायक ने शांत स्वर में कहा, “मैं अकेला कौन होता हूँ सवाल पूछने वाला? आप सबकी सर्वसम्मति से मैं पुजारी बना हूँ। सभी गाँववालों को मिलकर सवाल करना चाहिए। नहीं तो मूलपुरुष को लाओ—जिसके ऊपर देवता आते हैं—ढोल पिटवाओ और उसके ऊपर देवता को बुलाओ। फिर सवाल पूछो और प्रतिज्ञा ले लो। यहाँ सातेरी देवी के सामने क्यों झगड़ रहे हो? देवी माँ के पेट में जो नाग है न, उसको दुखाओगे तो भला नहीं होगा गाँववालों का।”
“मूलपुरुष के ऊपर देवताओं को लेकर आएँगे। तुम भी देखना, उसे कैसे आड़े हाथ लेते हैं हम। अगर उसने कहा कि पूजा-विधि ठीक से नहीं हो रही है तो तुम्हें हम नहीं छोड़ेंगे। शामलाती खेती तुझे सिर्फ धान उगाकर खाने के लिए नहीं दी है। भगवान की पूजा-अर्चना भी ठीक से करनी पड़ेगी।”
वे सब चले गए।
सातेरी को टाट लगाते हुए वेकु नायक ऊँची आवाज में बड़बड़ाया, “भगवान के पास झगड़ा करेंगे। बस्ती में अपने ही लोगों के साथ फसाद करेंगे। पर राजा के पटवारी ने अगर थोड़ा भी धमकाया तो बाड़े से बैल तक खोलकर दे देंगे। सारा जिम्मा भगवान पर ही क्यों डालते हो? हाथ में गँड़ासा, कुल्हाड़ी लेकर बाघ को जंगल से क्यों नहीं भगाते? पर वो नहीं करेगे। भगवान को दोष देना आसान होता है ना ।”
घर पहुँचते-पहुँचते उसे शाम हो गई थी।
धर्मू नायक के आँगन में महार भिवा खड़ा था। उसके हाथ में सूप था। धर्मू नायक उसे देखते ही चिल्लाया, “तू अपशकुनी! शाम के समय दरवाजे पर क्यों आया है? चला जा यहाँ से।”
“बच्चे घर पर भूखे बैठे हैं। आपके घर में चावल पछोरने के लिए साल भर से सूप नहीं था न, इसलिए लेकर आया हूँ,” भिवा दीनता से बोला।
“कल सुबह लेकर नहीं आ सकता था?”
“बच्चे भूख से बिलख रहे हैं। गलती हो गई। पैर पड़ता हूँ आपके।”
धर्मू नायक ने उसे सूप आँगन में रखने के लिए कहा और घरवाली से बोला, “गोबर का पानी छिड़ककर सूप भीतर ले जाओ और उसकी टोकरी में एक सेर चावल डाल दो।”
2)
एक दिन एक अजनबी आकर गाँव में आश्रय माँगने लगा।
उसने विनती की “घर के भीतर नहीं तो ओसारे में ही पड़ा रहूँगा,”। उसने बताया कि उसकी दूर की मौसी इसी गाँव में रहती हैं। पर न तो वह अपनी मौसी को पहचानता था, न मौसी उसे पहचानती थीं। कौन है यह? किस गाँव का राहगीर है? रास्ता भटककर यहाँ कैसे पहुँच गया—किसी को कुछ पता नहीं था। वैसे हमारे गाँववाले इतने निर्दयी भी नहीं थे कि दरवाजे पर आए किसी मेहमान को बाहर का रास्ता दिखा दें। कड़ी धूप में पहाड़ों से उतरकर आकर अठारह-बीस वर्ष का ये लड़का मंदिर के सामने खड़े पेड़ के नीचे भूखा-प्यासा और सहमा हुआ बैठा था । वहीं मंदिर की सीढ़ियों पर गाँव के कुछ लोग बैठे थे। उन्होंने उसे देखा और पास जाकर पुछा
“कौन हो तुम? किस गाँव से आए हो? और यहाँ रोनी सूरत बनाए क्यों बैठे हो?”
वह मुरझाए चेहरे से उनकी ओर चुपचाप देखता रहा।
“गूँगा-बहरा है क्या रे तू? चोरों की तरह यहाँ हमारे गाँव में आकर क्यों बैठा है? जवाब दे, नहीं तो सिर पर डंडा पड़ेगा!”
वह रोते-रोते कहने लगा, “मुझे यहाँ से मत भगाओ। मैं आप सबके पैर पड़ता हूँ। मत भगाओ मुझे।”
“कौन हो तुम? कहाँ के रहने वाले हो?”
“मैं दिवाड़े के लखु नायक का बेटा गणबा हूँ।”
“क्या तुम्हारे साथ कुछ अनहोनी हुई है?”
“मैं सच कह रहा हूँ। उस फिरंगी को मैंने कुएँ से पानी निकालकर पीने के लिए दिया था और उसे आगे का रास्ता बताया था। बाद में उसने मुझे खाने के लिए एक मोटी-सी रोटी दी और उसके साथ गुड़ के पाक में डले कुछ फल भी दिए। मुझे पता नहीं था कि वे कौन-से फल थे। पर वे फल ही थे।”
“फिर क्या हुआ?”
“उसके बाद सब लोग कहने लगे कि मैंने उसके हाथ से फल और रोटी खाई है। इसलिए मेरा धर्म भ्रष्ट हो गया। मेरे बाप ने भी मुझे घर से निकाल दिया। माई भी मेरे पास नहीं आई। वहाँ किसी ने मेरी पत्नी तक को मेरे पास नहीं आने दिया। उसके बाद पत्थर मार-मारकर सब गाँववालों ने मुझे भगा दिया।”
“तो यहाँ क्यों आया है तू?”
“एक गाँव से दूसरे गाँव घूमता रहा। पर कहीं भी ठिकाना नहीं मिला। मेरी माँ कहती थी कि आदोळशी गाँव में मेरे दूर के रिश्ते की मौसी रहती हैं।”
“नाम क्या है उनका?”
“मैंने बचपन में उन्हें देखा था। अब मैं उन्हें नहीं पहचानता और वे भी मुझे नहीं पहचानेंगी। पर माँ कहती थी कि उनके बदन पर बहुत सारे तिल थे। इसीलिए सब उन्हें तिळाय मौसी कहते थे। मैं आप सबके पैर पड़ता हूँ। मुझे यहाँ से मत भगाओ। मुझे यहीं रहने दो।”
अब सब लोग सतर्क हो गए। धर्म भ्रष्ट करके यहाँ आकर रहना चाहता है! गाँव के मुखिया के कानों तक यह खबर पहुँचानी पड़ेगी।
गाँव के लोग जानते थे कि सात समंदर पार से परधर्म के कुछ लोग गोवा के गाँवों में आ पहुँचे हैं। उनके हाथ का कुछ भी खा लिया तो हमेशा के लिए धर्म भ्रष्ट हो जाता है ऐसा उनका विश्वास था। पर इस गाँव के लोगों ने उन्हें कभी देखा नहीं था। वे लोग अभी इस ओर नहीं आए थे।
कोई राहगीर आकर तिळाय मौसी को ढूँढ़ रहा है यह बात देखते-देखते पूरे गाँव में फैल गई। पर एक भी औरत यह कहते हुए आगे नहीं आई कि “मैं ही तिळाय मौसी हूँ।”
गाँव के मुखिया खापरू नायक तक यह खबर पहुँची। उसने सीधे-सीधे कह दिया ।
“यह भगवान रामनाथ की पवित्र पुण्यस्थली है। यहाँ परधर्मी और धर्म भ्रष्ट लोगों को एक रात भी रहने की इजाजत नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो गाँववालों को पाप लगेगा और हमारे गाँव का सर्वनाश हो जाएगा।”
शाम के समय आठ-दस लोगों को हाथों में डंडे लिए अपनी ओर आते देखकर वह युवक घबरा गया। “मुझे मत मारो! मुझे मत मारो!” चिल्लाता हुआ वह खेतों की ओर भागने लगा। सब उसे खारी जमीन की तरफ खदेड़कर लौट आए।
अगले दिन सुबह खबर मिली कि जिस तालाब पर मेले के समय देवता स्नान करने आते हैं, उसी तालाब में किसी का शव तैर रहा है।
कुछ लोग जाकर देख आए। वह उसी युवक का शव था, जो कल आश्रय माँगने गाँव में आया था।
गाँववालों पर मानो कहर बरप गया। यह बहुत बड़ा अशुभ हुआ था।
वे सब मुखिया के पास गए और पूछा, “अब क्या करेंगे?”
मुखिया बहुत देर तक खामोश बैठा रहा। फिर कुछ अनमने शब्दों में बोला, “भट्ट जी के पास जाकर निदान पूछो।”
गाँववाले वहाँ से उठकर भट्ट जी के पास पहुँचे। भट्ट जी बहुत देर तक सिर खुजलाते रहे। देवताओं के स्नान के लिए जिस तालाब का पानी लिया जाता है, उसी तालाब में एक धर्म-भ्रष्ट व्यक्ति का शव पड़ा ल! ऐसी कठिन घड़ी गाँववालों पर पहले कभी नहीं आई थी।
वह पागल की तरह चिल्लाया
“रस्सी डालो और शव बाहर निकालकर दूर फेंक आओ। वहीं सड़-गल जाएगा। धर्म-भ्रष्ट हुए व्यक्ति को न अग्नि का अधिकार है, न किसी क्रियाकर्म का।”
पर ऐसा करने का साहस किसी में नहीं था।
पूरे दिन शव तालाब में तैरता रहा।
अगले दिन जब सदा नायक अपने घर के पिछवाड़े खड़ा था, तो उसने वहाँ से देखा—गिद्ध उस तालाब के इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं। यह देखकर उसका मन पिघल गया।
वह सीधा आँगन में आया। फावड़ा उठाया और दौड़ते हुए खेत लाँघकर तालाब के पास जा पहुँचा। ऐसा लग रहा था, जैसे उसे अपने होश ही नहीं थे।
शव तालाब के किनारे आ लगा था। उसने पेड़ पर बैठे गिद्धों को भगाया और शव के पास पहुँचा। वहाँ उसने एक बड़ा और गहरा गड्ढा खोदा। फिर शव को घसीटते हुए उस गड्ढे में डाल दिया और ऊपर से मिट्टी डाल दी।
सुध-बुध खोकर उसने एक ही झटके में सारा काम निपटा दिया था। मजबूत देहयष्टि वाला वह व्यक्ति अब पूरी तरह थककर चूर हो चुका था। ऐसा लग रहा था, मानो अभी बेहोश होकर गिर पड़ेगा।
गिरते-संभलते वह वहाँ से घर आ गया। फावड़ा उसने आँगन में फेंक दिया और सीधे कुएँ पर चला गया। मिट्टी के घड़े से कुएँ का ठंडा पानी निकालकर उसने स्नान किया। बाद में उसी मिट्टी के घड़े को तोड़ दिया और गीले वस्त्रों में ही घर लौट आया।
बस्तीवाले अब एक-एक करके उसके आँगन में जमा होने लगे थे। उनमें एक औरत भी थी। उसके गालों और गर्दन पर बहुत-से तिल थे। उसकी आँखों में आँसू भरे थे।
सदा नायक ने उसे देखकर कुछ अनुमान लगाया।
इतने में फटी नायक झुँझलाता हुआ दहलीज पर आकर खड़ा हो गया।
“सदा, तुमने शव को इस पार दफनाया है या उस पार?”
“इस पार।”
“गाँव की सरहद के अंदर तुमने एक धर्म-भ्रष्ट व्यक्ति का शव क्यों दफनाया?”
“उस समय मुझे इन बातों का ध्यान नहीं रहा। गाँव का कोई व्यक्ति यह सब समझाने वहाँ क्यों नहीं आया?”
“सदा, तुमने गाँव का सर्वनाश कर दिया। जिस गाँव में परधर्म का व्यक्ति एक रात के लिए भी नहीं रुक सकता, उसी गाँव की सरहद के भीतर तुमने उसका शव दफना दिया। कल मेले में देवता उस तालाब में स्नान करने आएँगे। बड़ा उत्पात मचेगा। गाँव का सर्वनाश हो जाएगा।”
सदा नायक कुछ नहीं बोला।
भाग 3
लिंगु नायक के खलियान में मळनी चालू थी। एक मेड में पाँच बैल बाँधकर घेरा बनाया गया था। उसका बेटा बैलों को हाँक रहा था और वह अपनी पत्नी के साथ मिलकर धान बैलों के पैरों के नीचे ला-लाकर डाल रहा था। धान डालते-डालते लिंगु नायक ने गर्दन उठाकर देखा तो जंगल की ओर से माथे पर लकड़ी का बोझा लिए पगडंडी से कोई चला आ रहा था। सुबह की खिली धूप और उजाले के बावजूद यह पहचान में नहीं आ रहा था कि कौन है।
जब वह खलियान के पास आकर लकड़ी का बोझा टेककर खड़ा हुआ, तब लिंगु नायक ने कमर सीधी करते हुए पूछा—
“कहाँ, नदी किनारे के जंगल में गए थे क्या, गणाभैया?”
“और कहां मिलेगी शीशम की तरह मजबूत लकड़ियाँ ? और तुमने यह क्या लंगोटी के सिरे में बाँधकर कमर में खोस रखा है?”
“रास्ते में बड़ा-सा केकड़ा मिल गया। पैर तोड़कर लंगोटी में बाँध लिया।”
“कहते हैं, राह चलते खेकड़ा बीच में आ जाए तो उसे पकड़कर घर पर नहीं लाना चाहिए, गणाभैया। राह रोकने वाली डायन है वह।”
“वो रहने दो। भुनकर खाऊँगा तो सब शुभ-अशुभ, शकुन-अपशकुन खत्म हो जाएगा। पत्नी घर के भीतर लाने से मना करेंगी बाहर आँगन में ही बुनकर खाऊँगा। खलियान पर ये मांडभात की मटकी है क्या ? प्यास से मेरा गला सूख गया है ।”
लिंगु नायक ने मटकी से थोड़ी मांडभात निकालकर गणाभैया को दे दी। उसने खड़े-खड़े ही गटक ली।
“लिंगु, तूने बहुत देर कर दी मोळनी करने में। अब कब तुम्हारा खलियान खाली होगा और कब तुम रब्बी की फसल के लिए बीज बोओगे? कौन-से दिन चल रहे हैं, इसका अंदाजा है न तुझे?”
लिंगु बड़प्पन के भाव से बोला—
“मुझे कोई जल्दबाजी नहीं है, गणाभैया। पिछले साल जो चावलों की बोरियाँ तह करके रखी थीं, वे ही अभी खाली नहीं हुई हैं। मैं इस साल का चावल अगले साल खाता हूँ। और मेरी खुद की खेती है न! बटाई पर मैं थोड़ी खेती करता हूँ।”
“रहने दो। वैसे भी गुस्सा तेरी नाक पर ही रहता है! गाँव के ब्राह्मणों के साथ हमेशा तेरा तू-तू, मैं-मैं चलता ही रहता है। जो आगे गया वह सो गया, पीछे रहा वह अटक गया समझो ।”
अचानक गाँव की सीमा की ओर पहाड़ पर से घम्म करके एक ध्वनि सुनाई दी। आसमान फटा या फिर कोई विशालकाय पेड़ टूटकर गिर गया कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कार्तिक मास चल रहा था और आसमान में तो सफेद नभ तैर रहे थे, फिर यह ध्वनि कैसी? इस तरह की विचित्र, अजीबोगरीब आवाज पहले कभी सुनाई नहीं दी थी। सब लोग सहमकर उस आवाज की ओर देखते रहे। तभी जंगल की ढलान से एक चरवाहा उतरता हुआ दिखाई दिया। कंधे पर की कंबल उसने हाथ में पकड़ रखी थी और उसकी लंगोटी पीछे से छूट गई थी। वह दौड़ते हुए जोर-जोर से चिल्ला रहा था ।
“वो गोरे लोग गाँव की तरफ आ रहे हैं! जंगल में उन्होंने भारी जंगली सूअर मार गिराया है। उनके पास आग की नलियाँ हैं। मैंने खुद देखी है!”
जो भी रास्ते में मिल रहा था, उसे वह यही खबर सुना रहा था।
गाँव के लोगों ने उनके बारे में बहुत-से डरावने किस्से सुन रखें थे, पर कभी उनको देखा नहीं था। कहा यह भी जाता था कि उन लोगों में हाथी का बल होता है और वे पूरी की पूरी गाय भूनकर खाते हैं। वे लोग इतने गोरे होते हैं कि उनके शरीर के भीतर का लहू तक नजर आता है। पिछले पाँच साल से गोवा राज्य पर इन्ह गोरों ने कब्जा कर रखा हैं ।पर कभी वे इस गाँव की तरफ नहीं आए थे। कुछ ही देर में उनका काफिला पहाड़ों से नीचे उतरता हुआ दिखाई दिया। उनमें जो दो प्रमुख अमलदार थे, वे घोड़े पर सवार थे। उनके पीछे कुछ अंगरक्षक दौड़ रहे थे, जिनमें कुछ देसी सैनिक भी थे। कुल मिलाकर समूह में दस-बारह लोग थे। एक घोड़े पर सवार व्यक्ति के कंधे पर बंदूक थी। दूर से उस बंदूक की नली उसके सिर के ऊपर से दिखाई दे रही थी।
गणा नाइक लिंगु नायक से कह रहा था—
“वो जो नली दिख रही है न, उसमें से आग निकलती है और इंसान के शरीर के आर-पार जाती है। कहते हैं, उसमें काँच के टुकड़े भरे होते हैं। मान लो कोई व्यक्ति इस बंदूक की गोली का शिकार हुआ, फिर भी अगर वह तुरंत नहीं मरा तो धीरे-धीरे सड़ता जाता है और फिर मरता है।”
गणाभैया लकड़ी का बोझा वहीं टेककर लिंगु नायक के बेटे और पत्नी के साथ धान के आड़ में छिपकर बैठ गया और वहीं से सबका निरीक्षण करने लगा।
भरी धूप में चलकर आने की वजह से वे सब रक्तिम लाल रंग के लग रहे थे।
लिंगु ने धीरे से कहा
“गणा भैया, इन लोगों को गोरे कहते हैं न, पर मुझे तो वे सब लाल रंग के दिख रहे हैं।”
“गोरे हैं या फिर लाल, कुछ समझ में नहीं आ रहा। लाल ही होंगे। लहू पीते हैं न वे इंसानों का!”
“लाल राक्षसों की जात है उनकी।”
वे सब वैसे ही दौड़ते-दौड़ते ग्रामदेवता के मंदिर के बाजू में पहुँच गए। घुटनों तक लंबी धोती पहने देसी अंगरक्षक उन्हें राह दिखा रहे थे। जंगल में फैली आग की तरह पूरे गाँव में यह खबर पहुँच गई। देऊळ बस्ती के देवदासी और पुजारी, भोई , शिरवाड़ी के नायक, घाण्या बस्ती के लोहार, कुम्हार, राय बस्ती के बाम्हण सब डर के मारे खेत, जंगल और घर में जहाँ-जहाँ थे, वहीं छिपकर बैठ गए। रामनाथ मंदिर के पास पहुँचते ही उनका मुख्य अमलदार घोड़े से उतर गया। मंदिर के परिसर में कोई नहीं था। मंदिर का पुजारी गर्भगृह के पीछे “ राम राम ” करते हुए छिपा था और कुछ गाँववाले भी गर्भगृह के पीछे छिपे होंगे, ऐसा लग रहा था। मंदिर बहुत विशाल और मजबूत था। बड़े-बड़े लकड़ी के बीम और खंभों के साथ यह मंदिर भव्य लग रहा था। गर्भगृह में नंददीप जल रहा था, फिर भी मंदिर के भीतर अँधियारा था। प्रसाद-स्तंभ पर कौल के फूल चिपके थे, पर कौल लेने के लिए वहाँ कोई भी मौजूद नहीं था।
मंदिर के परिसर में किसी को न पाकर गोरे अमलदार को आश्चर्य हुआ। उसने अपने कबीले के एक देसी सिपाही से पूछा
“मंदिर खुला छोड़कर सब लोग कहाँ गए?”
“डरकर छिपके बैठे हैं।”
“अगर हम लोग मंदिर के अंदर जाकर भगवान की मूर्ति पर हाथ डालेंगे तो सब आ जाएँगे क्या?”
“कह नहीं सकते। इस समय वे सब डरे हुए हैं।”
गोरा आगे कुछ नहीं बोला। कुछ देर तक चुपचाप मंदिर के आगे खड़ा रहा। चारों ओर का शांत और खूबसूरत परिसर देखकर वह मंत्रमुग्ध-सा हुआ था। मंदिर की मजबूत बनावट, सामने झूमता हुआ पीपल का वृक्ष, उस ओर पानी से भरा तालाब—मंदिर के सामने खड़े रहने पर पूरा आदोळशी गाँव एक नजर में ही दिखाई देता था। मंदिर के पीछे की ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पहाड़ों से होकर बाँबोळी पठार से कालापुर की तरफ और वहाँ से गोवा पाटण तक जाती थी। मंदिर के परिसर से दूर-दूर तक खेत पसरे थे और खेती की दोनों तरफ जंगल के किनारों पर गाँव बसा था। मंदिर टीले के ऊपर था। वहाँ से अग्नाशिनी नदी की धार दिखाई देती थी और वहीं से समुद्र की गर्जना भी थोड़ी-बहुत कानों में पड़ रही थी। तालाब के पास जाकर उन सबने पानी पिया और घोड़ों को भी पानी पिलाया। बाद में वे खेती में उतरकर शिरवाड़ी की तरफ आए। कहीं पर भी किसी की हलचल नहीं थी, न ही किसी का नामोनिशान। एक नीरवता-सी पसर गई थी, मानो पूरा गाँव उठकर पहाड़ी के उस पार चला गया हो।
ये सब देखकर उनमें जो मुखिया था, उसे गुस्सा आ रहा था।
“कितने डरपोक पागल लोग हैं! इंसान होकर इंसानों से डरकर भाग गए ।” वह खुद अल्फोंसो द आल्बुकेर्क के साथ मुसलमानों के खिलाफ लड़ते-लड़ते गोवा द्वीप पर पहुँचा था। इस घटना को चार बरस हो गए थे। कभी-कभी उसे क्रोध आता था। कितने ही तरह के लोग देखे थे उसने यहाँ। अगर कमर की तलवार निकालता तो जैसे विषैले साँप को देखकर भागते हैं, वैसे दूर भाग जाते थे। इन लोगों पर क्रोध आता था तो सहन न होने पर घोड़े पर बैठकर, हाथ में चाबुक लेकर निकलता और रास्ते में जो मिलता, उसे मारता जाता था।
शेरवाड़ी के बाड़ के पास एक बुजुर्ग खड़ा था। उसकी गर्दन थरथरा रही थी। उसने हाथ में गड़ासा पकड़ रखा था। गड़ासा देखकर सिपाहियों में कौतूहल जगा। उन्होंने उससे पूछा
“गाँव में कोई नहीं दिखता। सब गाँव छोड़कर चले गए क्या?”
उस बुजुर्ग ने गड़ासा आगे करते हुए कहा
“इस गड़ासे से न जाने कितनी ही कँटीली झाड़ियाँ काटी होंगी, बड़े-बड़े पेड़ों को काटकर धराशायी किया है। पहले यह गड़ासा मेरे पिता अपनी कमर में बाँधते थे। अब पिछले पचास सालों से मेरी कमर में है।”
उसकी बातें उन सबको बड़ी मजेदार लगीं। उनमें से एक देसी सिपाही ने पूछा
“कभी इस गड़ासे से बाघ को मारा है क्या?”
वह थोड़ा झिझकते हुए कहने लगा
“एक बार बाघ ने हमारी पूरी गौशाला खाली कर दी थी। बड़ा खूंखार जानवर है वह। आप लोग कौन हैं और यहाँ किससे मिलने आए हैं?”
इतना पूछकर उसने अपनी राह ली।
सिपाही समझ गए कि इसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है और वे सब आगे बढ़ गए।
आगे जाकर उन्होंने पूरे शिरवाड़ का निरीक्षण किया। यह बस्ती जंगल में फैली थी। कुकुम, जामुन और शीशम के वृक्ष बीच-बीच में खड़े थे और उनके बीच घास तथा नारियल के पत्तों से बनाए हुए लगभग तीस घर थे। हर घर के आँगन में कम-से-कम दो नारियल के पेड़ थे। कुल मिलाकर यह बस्ती जंगल के बीचोबीच बसी थी, पर इस समय इस बस्ती में एक भी इंसान दिखाई नहीं दे रहा था। घर के अंदर छिपकर बैठे थे या फिर पिछले दरवाजे से पहाड़ पर भाग गए थे—कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
शिरवाड़ी से अब वे सब रायगाळी की ब्राह्मण बस्ती में जाने के लिए निकले। बीच में खुला मैदान था। वहाँ खुले बदन वाले नाटे और काले रंग के पुरुष और औरतें थीं। पुरुषों के बदन पर केवल एक लंगोटी थी और औरतों की कमर पर एक वस्त्र था। बदन का ऊपरी हिस्सा अधिकतर खुला था। वे सब बारिश में लगाए उड़द के पौधे निकाल रहे थे। इन गोरों को देखकर सब इकट्ठा होकर जंगल की तरफ दौड़ने लगे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था, मानो जानवरों का झुंड जंगल की तरफ भाग रहा हो।
एक देसी सैनिक ने कहा
“सर, कुनबी जात के लोग हैं ये सब। खेती करने के लिए नीचे आते हैं, नहीं तो ये लोग ऊपर पहाड़ों पर ही रहते हैं।”
वहाँ से वे रायगाळी आए। यह प्रदेश सूरम्य और समृद्ध था। हरे-भरे बगीचे और दूर-दूर तक फैली रब्बी की फसल थी। पहाड़ी की ओर से एक पानी की नहर बह रही थी, जो केकरे की बस्ती से होकर शणै के बगीचे से बहती थी।
शणै ब्राह्मणों के कुल अठहत्तर घर थे। उनके बगीचे आम, नारियल, सुपारी, काली मिर्च, तोरंगी और कटहल—इन सभी पेड़ों से भरे थे। शणै ब्राह्मणों के कुलदेवता रवळनाथ थे और केकरे बस्ती का कुलदेवता नदी के उस पार का शंखवाळ का मंगेशी था। पर इन दोनों ब्राह्मणों के बीच आपस में नहीं जमता था।
कप्तान कास्तेल फिग्रेदीन ने एक देसी सिपाही को ब्राह्मणों की बस्ती में भेजा था, इस संदेश के साथ कि पुर्तगाली राजा का कप्तान गाँव में आ रहा है। उसके स्वागत की तैयारी की जाए। पर कहीं पर भी किसी की हलचल नहीं थी। ब्राह्मणों के सभी घर अंदर से बंद थे। एकदम शांत नीरवता पसरी थी।
कप्तान फिग्रेदीन ने गोवा द्वीप के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था और उसका अनुभव भी था कि ब्राह्मण जाति के लोग बहुत होशियार होते हैं। उन्हें पढ़ना-लिखना भी आता है। इनके साथ मिलकर ही गोवा पर कारोबार और सुव्यवस्थित राज्य किया जा सकता है। इसीलिए उन सबके साथ संवाद साधना बहुत जरूरी था। धैर्य के साथ समझाकर और समय पड़ा तो धमकाकर भी, कुछ भी करके उन सबको वश में करना था।
पर इस समय वे सब दरवाजों पर साँकल चढ़ाकर अंदर बैठे थे।
गोवा द्वीप पर आए चार बरस बीत गए थे, पर ये दूरदराज के लोग हमें देखकर भाग जाते हैं। हमने हजारों मुसलमानों को तलवार से मार डाला है। आज भी उनके मन से हमारा डर नहीं गया है। हम उनके धर्म पर आक्रमण करेंगे यह भय तो शुरुआत से ही उनके मन में है।
उसने अपनी बुलंद आवाज में सबको घर से बाहर आने के लिए कहा और यह भी संदेश दिया
“अब यह राज्य हमारा है। हम यहाँ के कप्तान हैं। हमने आदिलशाह को हराकर गोवा द्वीप पर कब्जा किया है। अब आप सब पुर्तगाली राजा की प्रजा हैं। इसीलिए आप सबको हमारे सामने आना ही पड़ेगा।”
उसकी वह बुलंद आवाज दुभाषिया कोंकणी भाषा में अनुवाद करके कह रहा था, मानो दोनों के बीच जुगलबंदी-सी चल रही थी। कप्तान की बातों में निहित क्रोध, अहंकार और हिदायत का भाव दुभाषिया भी उसी लहजे में व्यक्त कर रहा था।
पर कहीं से भी किसी की आहट नहीं आ रही थी। इतना चिल्लाने के बावजूद किसी ने दरवाजा नहीं खोला। कप्तान अब क्रोध से तिलमिलाने लगा और उसकी गोरी त्वचा के भीतर उमड़ता लाल खून साफ दिखाई दे रहा था। हाथ में तलवार लेकर वह दरवाजे के पास गया और धड़ाधड़ लात मारने लगा।
“सब कुछ तोड़कर आग के हवाले कर दूँगा!”
अचानक एक औरत ने दरवाजा खोलकर बाहर कदम रखा और चावल मापने का लकड़ी का माप कप्तान पर फेंक दिया, जो उसकी छाती पर लगा। मजबूत शरीर और थोड़ी नाटी कद-काठी वाली वह औरत इस समय आग उगलती नजरों से कप्तान की ओर देखकर चिल्लाई
“कमीने! दरवाजे पर क्यों लात मार रहा है?”
कप्तान अवाक रह गया। उसने औरतों का यह अवतार कभी अपने देश में भी नहीं देखा था। तभी वह औरत फिर गरज पड़ी
“यह हमारा देव-धर्म, विधि-विधान का घर है और तुम तो वहीं सात समंदर पार से आए राक्षस हो!”
दुभाषिया बीच में था।
कप्तान ने उस औरत को हेय दृष्टि से देखा और कहा
“दरवाजे पर साँकल चढ़ाकर घर के अंदर छिपकर बैठने वाले डरपोक लोगों का कौन-सा भगवान और कौन-सा धर्म?” कहकर वो चिल्लाने लगा “इस गाँव के सब मर्द घर के भीतर छिपे हैं और एक औरत दरवाजा खोलकर दहलीज पर खड़ी है! डरपोक कहीं के सारे मर्द! अगर आप सब बाहर नहीं आए तो हम बंदूक लेकर घर के भीतर घुसेंगे!” यह सुनकर बूढ़े-जवान, कुल मिलाकर पंद्रह-सोलह पुरुष घरों से बाहर आकर पाठशाला के आँगन में खड़े हो गए। चारों ओर निशब्दता पसरी थी। धीरे-धीरे सब गर्दन ऊपर करके उन्हें देखने लगे। बाद में उन सबको लगा ये तो हमारी ही तरह दिखते हैं। कान, आँख, नाक सब कुछ हमारी तरह ही है। खामखाँ लोग कुछ भी बोलते थे , हाँ हो सकता है इन लोगों में हमारे मुकाबले बल थोड़ा अधिक हो। शायद ये राक्षसों के कुल से होंगे। पर राक्षसों का संहार तो देवताओं ने ही किया था। उसी तरह भगवान हमारी मदद करेंगे इनका संहार करने के लिए । गोरे भी देर तक उन सबको निहारते रहे। धीरे-धीरे उन सबके मन से डर जाता रहा। फिर शांतू शैणै ने धीमे स्वर में कहा
“इसके पहले कभी किसी अमलदार ने हमें इस तरह धमकाकर घर के बाहर नहीं निकाला था। सब हमारी इज्जत करते थे।”
यह सुनकर कप्तान बोला
“हमें ये सब मत बताओ। हम पुर्तगाली लोग हैं। हमारे पास अपार शक्ति है और इसी शक्ति के बल पर हमने आदिलशाह को हराकर गोवा द्वीप पर कब्जा किया है। छः हजार मुसलमानों का रक्त हमने गोवा की भूमि पर बहाया है और आज हम आप सबको यह बताने के लिए आए हैं कि अब आगे से आप सब गाँववालों को हर महीने महसूल हमारे पास पहुँचाना होगा।”
इस बात पर सापटू शैणै ने कहा
“आप लोगों ने मुसलमानों को मारा और उनकी पत्नियों का धर्म परिवर्तन करके अपने सैनिकों के साथ उनका ब्याह रचा दिया। हम तो आप लोगों के सामने आना ही नहीं चाहते थे। जोर-जबरदस्ती करके आप लोग हमसे सब कुछ छीनना चाहते हैं। आते ही आप लोगों ने अपने धर्म के मंदिर खड़े कर दिए और अब तो यह भी सुनने में आया है कि हम हिंदुओं को कुछ खिलाकर आप लोग हमारा धर्म भ्रष्ट करते हैं।”
“जो धर्म राजा का है, वही प्रजा का भी धर्म होना चाहिए। और रही बात धर्म परिवर्तन करने की, तो वह काम हमने यहाँ अभी शुरू भी नहीं किया। पर आप ही लोगों ने यह सब शुरू किया है। अगर कोई गलती से हमारे हाथ का कुछ खाता है तो आप सब अपने ही लोगों को धर्म से, गाँव से बाहर कर देते हैं।”
“एक शर्त पर हम सब तैयार हैं अगर आप लोग हमारे धर्म और मंदिरों की हिफाजत करेंगे तो।”
“वायसराय अल्फोंसो ने ऐसा वचन गोवा द्वीप के हिंदुओं को दिया है, पर अभी भी इस बात पर राजा की मुहर लगना बाकी है। फिर भी मैं आप सब लोगों को बताना चाहता हूँ कि पोप की आज्ञा के अनुसार पुर्तगाली राजा की यह नीति है राजा का जो धर्म है, वही प्रजा का धर्म होगा। पर फिलहाल वायसराय आल्बुकेर्क ने दिए वचनों का पालन उनके कप्तान करेंगे।”
यह सुनते ही सब ब्राह्मण असमंजस में पड़ गए। उनमें से एक बुजुर्ग ब्राह्मण ने पूछा
“गोवा को आप अपने अधीन कैसे कर सकते हैं? म्हाळ पैन में हिंदुओं पर जुर्म करने वाले मुसलमानों और नायट को भगाने के लिए होनावर के सुबेदार तिमय्या ने आप लोगों को निमंत्रण भेजा था और उसके बाद तिमय्या तो आप लोगों को सहायता के लिए लेकर आया था। अब गोवा राज्य तुम लोगों का कैसा हो गया ?”
कप्तान ने उस बुजुर्ग ब्राह्मण की तरफ गुस्से से देखा। उसने घुटनों तक धोती पहनी थी। कमर में चाँदी की चमकीली करधनी, पेट पर जेनुआ और कपाल के मध्य चंदन का टीका लगाया था। बालों की शिखा पर उसने फूल खोसा था।
“कौन हो तुम?”
“गाँव का कुलकर्णी। आपू शैणे नाम है मेरा। पहले पूरे गाँव का लगान आदिलशाह के सूबेदार को पटेदार द्वारा मैं ही भिजवाता था।”
“देखो, आपू शैणे, एक बात ध्यान में रखना। पिछले चार साल से तुम सब हमारे अधीन हो। तिमय्या छोटी जाति का सूबेदार था। किसी राज्य का रक्षण करना या किसी राजा को हराना उसके बस की बात नहीं थी। वायसराय ने उसे गोवा द्वीप का प्रमुख थानेदार नियुक्त करने के बारे में सोच-विचार किया था, पर उसे वह मंजूर नहीं था। इसलिए वह गोवा छोड़कर चला गया।”
शाणू शैणे ने कहा
“छोटी जात का तिमय्या राजा के पद पर आसीन होता तो यह हम लोगों को भी अच्छा नहीं लगता था और उसे राजा का पद शोभा भी नहीं देता। हम लोगों को भी उसके अधीन रहना अच्छा नहीं लगता।”
कप्तान ने कुछ क्षण उसकी ओर देखा। फिर वहाँ से ध्यान हटाकर उसने कुलकर्णी से पूछा
“पिछले दो सालों में कितना लगान वसूल किया है तुमने और किसे पहुँचाया है?”
“पिछला लगान हमने आदिलशाह के पटेदार अब्दुल गनी को पहुँचाया था। तीन साल हो गए इस बात को।”
“कितना लगान पहुँचाया था?”
“कुल रकम तीन सौ बत्तीस शेराफीन, तीन टाक और बारह रीय थी।”
और पिछले साल ?
“किसका राज्य चल रहा है, कौन राजा बना है इसके बारे में हम लोगों को कुछ भी पता नहीं था। और दूसरी बात, नए राजा की तरफ से हम लोगों से मिलने कोई आया भी नहीं। इसलिए पिछले तीन साल से गाँव की सामूहिक आमदनी से लगान नहीं निकाला गया। राजा कौन है यह गांव वालों को जानना था इसलिए वो सब कहते हैं पहले हमें लाश दिखाओ, बाद में हम श्राद्ध करेंगे।”
कप्तान कुलकर्णी पर गरज पड़ा
“अब तुम पुर्तगाली राजा के कुलकर्णी हो। इसलिए सोच-समझकर बात करो। गोवा द्वीप में हमने तोप और बंदूक की नोक पर कितने ही मुसलमानों को खत्म किया है और कितने ही मुसलमान डरकर भाग गए। और तुम कहते हो हमारे आने की खबर तुम लोगों को नहीं लगी?”
“हमें लगा था तुम लोग सात समंदर पार से आए विदेशी हो। खजाना लूटकर चार-पाँच महीने बाद यहाँ से लौट जाओगे। आप लोग यहीं पर हमेशा के लिए बस जाओगे, इसकी कल्पना नहीं की थी हम लोगों ने।”
“वायसराय आल्बुकेर्क ने इस द्वीप पर हमेशा के लिए रहने का फैसला लिया है। यहाँ पर हम अपना राज्य और अपना धर्म स्थापित करेंगे। साथ-साथ अपने व्यापार का भी विस्तार करेंगे। कुलकर्णी, तुम मुझे यह बताओ—गाँव में कुल कितने लोग रहते हैं?”
“इकसठ मकान, बयानबे चूल्हे, एक सौ तीस जोड़ियाँ पति-पत्नी की, कुल मिलाकर छः सौ नब्बे लोग।”
“कालापुर से लगान वसूल करने के लिए पटेकार दासू पै आएगा। पिछले दो साल का भी लगान मिलना चाहिए। दासू पै बहुत खतरनाक आदमी है। नहीं मिला तो तुम सबको खदेड़कर लगान वसूल करके ले जाएगा।”
कुलकर्णी आपू शैणे का डर अब धीरे-धीरे जाता रहा। वह धैर्य जुटाकर बोला
“यह गाँव उतना अमीर नहीं है कि पिछले साल का लगान दे सकेगा। पिछले साल का दाना-चावल तो पिछले साल ही खत्म हो गया। गाँव की शामलाती खेती से उपजी आमदनी के कुल एक सौ नौ भागीदार हैं और गाँव के मेल-उत्सवों का खर्च भी इसी आमदनी से किया जाता है।”
“तुम्हारे गाँव का मुखिया कौन है?”
“शिरवाड़ी का खापरू नायक।”
“एक काम करो। गाँववालों की पंचायत बुलाओ और इस साल कुछ ज्यादा लगान जमा करो। बचा-बकाया भी थोड़ा भरना पड़ेगा।”
सब खामोश रहे।
आगे कप्तान बोला
“आप सबने अब हमारे राजा की सत्ता को स्वीकार किया है ऐसा हम मानकर चलते हैं।” इसलिए अब रोज आप सबको सुबह उठते ही पुर्तगाली राजा को नमस्कार करना पड़ेगा ।
भवानी शैणै बहुत देर से कप्तान को क्रोधित नजरों से देख रहा था। उसने कहा
“आपका राज्य हमें मंजूर नहीं है। सात समंदर के पार से आए भ्रष्ट लोग हैं आप। हम आपके राजा को क्यों नमस्कार करें? हमारा भगवान है। नमस्कार करने के लिए आपके परधर्मी राजा को हम नमस्कार नहीं करेंगे।”
उसकी ये बातें सुनते ही कप्तान की नाक लाल हो गई। उसकी नीली आँखों में खून उतर आया। उसने कमर से चाबुक निकाला और उसके नंगे बदन पर धड़ाधड़ चलाने लगा। भवानी शैणै जमीन पर लोट-पोट होकर तड़पने लगा।
कप्तान ने कहा
“हम अपने देह पर सौ तलवारों के घाव लेने के लिए तैयार हैं, पर कोई हमारे राजा का अपमान करेगा तो हम सहन नहीं करेंगे। और तुम्हारी इतनी हिम्मत! आज तो तुम्हें मार ही डालूँगा मैं!”
तलवार की दस्त मूठ में कसकर वह बोला
“अगर आप लोग खुशी-खुशी हमारे राजा और हमारे शासन को स्वीकार नहीं करते हैं तो हमें तलवार की नोक पर आप सबको राजी करना पड़ेगा, जैसे हमने हजारों लोगों का खून बहाकर इस गोवा द्वीप पर कब्जा किया है।”
बाद में बाकी सैनिकों ने भी तलवारें खींच लीं। बेचारे ब्राह्मणों ने इतनी नजदीक से तलवारों का यह नंगा नाच कभी नहीं देखा था। वे सब डर गए। उनमें से एक हाथ जोड़कर विनती करने लगा
“हम आज तक किसी के भी लड़ाई-झगड़े में नहीं पड़े हैं। हमारे सामने ये तलवारें निकालने का क्या फायदा? हम सब आप लोगों के साथ हैं। हमें केवल अपनी जात और अपने धर्म की फिकर है...”
कप्तान घोड़े पर सवार हो गया। घोड़ा थोड़ा आगे ले जाकर उसने पीछे मुड़कर पूछा
“आप लोगों को भगवान का पुत्र यीशु पता है?”
अब सब ब्राह्मणों ने सिर हिलाकर नहीं कहा।
“भगवान के पुत्र यीशु ने स्वर्ग से आकर हमें यह क्रैस्त धर्म दिया है और हमारे राजा का यही धर्म है।”
बाद में उसने शैणै की तरफ तीक्ष्ण नजरों से देखते हुए कहा
“अगर आगे चलकर तुम्हें तुम्हारा धर्म छोड़ना पड़ेगा तो तुम लोग क्या करोगे?”
दबे स्वर में दो-चार जन बोल पड़े
“हम खुद को आग के हवाले कर भस्म कर देंगे।”
“और अगर कोई तुम लोगों को गाय का मांस खाने के लिए कह देगा, तब तुम लोग क्या करोगे?”
“हमेशा के लिए भूखे रहकर मरना स्वीकार करेंगे।”
“और अगर धर्म परिवर्तन के बदले में तुम सबको खेत, जमीन और पैसा दिया तो...?”
“पूरे संसार की संपत्ति भी तुम हमारे कदमों में लाकर डालोगे तो भी हमारे धर्म के सामने वह तुच्छ है। हम अपना धर्म कभी नहीं छोड़ेंगे।”
इस समय गोरे कप्तान के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी।
“अंतिम प्रश्न अगर कोई तलवार और हथौड़ा लेकर तुम्हारे मंदिरों को नष्ट करने आया तो?”
अब वहाँ एकदम सन्नाटा पसर गया। ब्राह्मण अवाक् होकर एक-दूसरे को देखने लगे। बाद में सब एकस्वर में बोले
“जो ऐसा करेगा, भगवान उसे दंड देगा।”
कप्तान ने घोड़ा दौड़ाया। उसके पीछे सारा जत्था दौड़ने लगा। शैणै के बगीचे को पार करके वे सब पहाड़ के नीचे बसे रवळनाथ मंदिर के पास आ गए। इस मंदिर की दीवारें लाल मिट्टी से बनी थीं। छत के लिए जामुन की लकड़ी का उपयोग किया था और जमीन गोबर से लीपी हुई थी। यह मंदिर छोटा था, पर बहुत सुंदर था। मंदिर में कोई नहीं था। एक चटाई बिछी थी और खूंटी पर एक झोली लटक रही थी। गोरों ने चप्पल उतारे बिना ही मंदिर में प्रवेश किया और भीतर के चबूतरे पर जाकर बैठ गए। देसी सिपाही बाहर ही खड़े रहे। वे बहुत अस्वस्थ दिखाई दे रहे थे। उनमें से एक सिपाही ने गोरे से कहा भी
“साहब, जूते उतारकर मंदिर के अंदर जाइए।”
पर उसकी बात को अनसुना कर दिया गया।
तभी वहाँ एक बुजुर्ग साधु आया। लंबी दाढ़ी, सिर पर सफेद बाल। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वह नहर पर जाकर स्नान करके आया है। उसकी कमर पर गीली धोती थी। गोरों को मंदिर के भीतर देखकर वह हक्का-बक्का रह गया और क्रोधित होकर चिल्लाने लगा
“कौन हो तुम लोग? मंदिर अपवित्र किया है तुम लोगों ने! निकल जाओ मंदिर से बाहर! पाप लग जाएगा, भस्म हो जाओगे तुम सब!”
जैसे जानवरों को भगाते हैं, वैसे ही वह सबको भगा रहा था, पर वे लोग अपनी जगह से टस-से-मस नहीं हुए।
साधु मंदिर के बाहर आया और शैणै के घर की तरफ देखकर बोला
“अरे वो शैणै! जरा इधर आओ। यहाँ कुछ पापी मंदिर के भीतर बिना चप्पलें उतारे घुस आए हैं। जल्दी आओ, इन सबको खदेड़कर बाहर निकालना है।”
पर साधु के इस बुलावे पर किसी ने आवाज नहीं दी। चारों तरफ एक नीरवता पसरी थी।
उनमें से एक देसी सिपाही गोरों को समझा रहा था
“जैसे आपके धर्म में संत होते हैं, वैसे ही ये साधु धर्म की शिक्षा देने के लिए गाँव-गाँव घूमता है।”
कुछ देर बाद गोरे एक-एक करके मंदिर के बाहर आ गए। साधु मंदिर के परिसर में स्थित बेल वृक्ष के नीचे बदहवास-सा बैठा था। उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं।
उनमें से एक व्यक्ति ने साधु का मजाक उड़ाने के उद्देश्य से पूछा
“तू साधु है न? तो एक काम करो। वो जो सामने पेड़ है न, उस पर फल लगाकर दिखा सकते हो क्या?”
साधु खामोश रहा।
गोरा आगे बोला—
“साधु हो न तुम? तो पानी पर चलकर दिखा सकते हो क्या?”
अब साधु महाराज का पारा चढ़ गया। उसने कहा
“वो काम ईश्वर का है, हम मनुष्य का नहीं।”
अंग्रेज मुस्कुराया और कहने लगा
“बिल्कुल ठीक कहा आपने। सब काम तो ईश्वर का ही है। और हमारे देश में भी एक समय ईश्वर आया था—ईश्वर का पुत्र यीशु। हमारे ईश्वर के पुत्र ने अनगिनत चमत्कार किए हैं। यह तो आपको पता है न? और उस ईश्वर के मसीहा यीशु को लेकर हम आपके राज्य में आए हैं।”
अब साधु को अत्यधिक क्रोध आया।
“ईश्वर का पुत्र सामान्य चमत्कार क्यों करके दिखाएगा? आसमान से बारिश होती है, समुद्र में उफान आता है, बीज अंकुरित होता है, रात और दिन का चक्र घूमता रहता है, पेड़-पौधे फल-फूलों से भरे रहते हैं। ईश्वर के ये सब चमत्कार कितने बड़े और अद्भुत हैं! तो अन्य हल्के-फुल्के चमत्कारों की क्या जरूरत है?”
गोरे चुप रहे। कप्तान घोड़े पर चढ़ा और आगे बढ़ गया। उसके पीछे-पीछे सब चलने लगे।
पीछे मुड़कर देखने पर लग रहा था, जैसे किसी ने पूरे गाँव को मिट्टी में दफ्न कर दिया हो। चारों ओर निशब्दता पसरी थी। साधु गाँव की तरफ हाथ हिला-हिलाकर कुछ कह रहा था। देखने पर ऐसा लग रहा था, शायद वह गाँववालों को श्राप दे रहा है। कुछ देर बाद वह वहाँ से जाने लगा। बगल में चटाई और हाथ में कमंडल तथा लाठी लेकर, गाँव की तरफ पीठ किए साधु वहाँ से चला गया। गोरों का जत्था खेती को पार करता हुआ ग्रामदेवता के पास आया। मंदिर के परिसर में कदंब वृक्ष के नीचे कुल सात-आठ सती के पत्थर थे। पेड़ की छाँव में वे सब पत्थर उल्टे पैर वाले भूतों की तरह लग रहे थे। सुबह जब वे जंगल से गाँव की तरफ आ रहे थे, तब उन्होंने जंगली सूअर को मारकर पत्तों से ढककर झाड़ियों में रखा था। अब सूअर काटने के लिए उन्हें एक तजुर्बेदार आदमी और छुरा चाहिए था। वे लोग मंदिर के पास गए और उन्होंने भटजी को आवाज लगाई। भटजी डरता-डरता बाहर आया।
देसी सिपाहियों ने कहा
“भटजी, हमने पहाड़ पर जंगली सूअर का शिकार किया है। उसे काटने के लिए हमें एक आदमी चाहिए। और हाँ, गाँववालों को भी बुलाओ। हम उन्हें भी हिस्सा देंगे।”
भटजी ने कहा
“यह काम जिवु लोहार करेगा। पर सबसे पहले सूअर पर गाँव का मिराशी शिवा पहली छुरी चलाएगा। हमेशा वही पाइक और बेताल भगवान के पास बकरे काटकर बलि चढ़ाता है।”
“यह जिवु लोहार कहाँ मिलेगा हमें?”
“वो वहाँ जो सफेद अर्जुन का वृक्ष दिखाई दे रहा है न, वहीं पर जिवु लोहार की दुकान है। पूछने पर कोई भी बता देगा।”
देसी सिपाहियों ने कप्तान को मिराशी के संदर्भ में बताया। तब कप्तान बोला—
“अब यहाँ के मिराशी और इस प्रदेश के कार्यभारी सब हम ही हैं। और सूअर का शिकार हमने किया है तो हम ही छुरा चलाएँगे।”
जत्था जिवु लोहार के पास जाने के लिए निकला।
पीछे से भटजी श्राप दे रहा था
“हे ईश्वर! इन्ह गोरों को फिर से हमारे गाँव में कदम रखने मत देना। इनकी जीभ को लकवा , इनके घोड़े मर जाएँ ! हमें ये मुसीबत नहीं चाहिए हमारे गाँव में...”
जिवु लोहार अपने घर के सामने वाली दुकान में अकेला बैठा था। हाथ में हथौड़ा था, जिसे उसने जमीन पर टिकाकर पकड़ रखा था। आगे के साँचे के पीछे की धौंकनी खाली पड़ी थी। साँचे में राख और कोयला बिखरा पड़ा था और उसमें से हल्का धुआँ निकल रहा था। धौंकनी चलाने और हथौड़े से लोहा पीटने वाले को जैसे ही यह खबर मिली कि इस ओर गोरे आ रहे हैं, तो वे दोनों वहाँ से भाग गए। आधा पिटा गड़ासा वहीं धौंकनी के पास पड़ा हुआ था, पर जिवु हथौड़ा पकड़कर जहाँ था, वहीं बैठा रहा। गोरे सिपाही आकर कुछ दूरी पर रुक गए। उनमें से एक देसी सिपाही दौड़ता हुआ जिवु लोहार के पास आया और उसने पूरी हकीकत बताते हुए कहा
“सूअर काटने के लिए तुम छुरा लेकर आ जाओ।”
जिवु ने उससे सवाल किया
“शिवा मिराशी आया है क्या ?”
“नहीं। कप्तान का कहना है, अब हम ही यहाँ के राजा हैं और हम ही मिराशी हैं। इसलिए शिवा मिराशी की जरूरत नहीं है। हम ही छुरा चलाएँगे।”
जिवु लोहार उस देसी सिपाही पर चिल्लाया
“उनको जाकर बोल दो, मैं नहीं आऊँगा। कहकर कौन होते हैं वे लोग, हमारे गाँव में आकर अनाचार करने वाले ?”
उस देसी सिपाही ने उसे समझाया
“देखो जिवु, वे बहुत दुष्ट लोग हैं। उनके पास आग की बंदूकें हैं। उन बंदूकों में जो शीशा भरा होता है, वह आग की तरह सीने को भेद जाता है। समुद्र मार्ग से आकर उन लोगों ने गोवा द्वीप पर जो नरसंहार किया है न, उसे मैंने अपनी आँखों से देखा है।”
जिवु लोहार उठकर अंदर गया और दो छुरियाँ लेकर आया। पिछली दीवार के पीछे उसके दोनों मजदूर छिपकर बैठे थे। वहाँ जाकर उन दोनों को गालियाँ देता हुआ वह उन्हें भी लेकर आया। बाद में वे तीनों गोरों के पीछे-पीछे पहाड़ की तरफ जाने के लिए निकले।
राह चलता कोई दिखाई देता तो देसी सिपाही कहता
“पहाड़ पर बड़ा-सा जंगली सूअर हम लोगों ने मार गिराया है। हिस्सा चाहिए तो वहाँ आ जाना।”
झाड़ियों में छिपाकर रखा सूअर उन लोगों ने खींचकर बाहर खुली जगह पर लाया। जिवु लोहार पूरे जोश के साथ छुरियाँ चलाने लगा। पहले चमड़ी उतारकर ली और उसके बाद पेट फाड़कर अंतड़ियाँ निकालकर बाहर फेंक दीं। उसके बाद आगे के और पीछे के पैर काट डाले।
जिवु लोहार और उसके दोनों आदमी काम में लगे थे। देसी सिपाही भी उनकी मदद कर रहे थे। जिवु लोहार बार-बार कह रहा था
“ईश्वर ने पाला जानवर है और ये शामलाती संपत्ति है। गाँववालों के साथ बाँटकर खानी होगी। इसीलिए मिराशी पहले छुरी चलाता है न... अब ग्रामपुरुष को जवाब मुझे देना होगा।”
तभी गोरे सिपाहियों ने देखा कि कुछ गाँववाले झाड़ियों की आड़ में खड़े होकर मांस की तरफ लोलुप नजरों से देख रहे हैं। उनमें शिरवाड़ी के नायक भी थे।
जिवु लोहार गुस्से से तिलमिला जा रहा था। उसका मन कर रहा था कि इन सबको छुरा घोंपकर खत्म कर दे।
सिपाहियों ने जंगल से करमल के बड़े-बड़े पत्ते लाकर उनमें मांस बाँध लिया और जो मांस बचा था, उसे बीस भागों में बाँट दिया। सिपाहियों ने गाँववालों को बुलाकर सबको एक-एक हिस्सा उठाकर ले जाने के लिए कहा। जैसे ही उनमें से एक आगे आकर मांस उठाकर ले गया, उसके पीछे-पीछे सब आए और अपना-अपना हिस्सा उठाकर चलने लगे।
यह सब देखकर कप्तान कास्तेल फिग्रदी को आश्चर्य हुआ—ये कैसी इनकी संस्कृति है? एक तरफ कुछ लोग शाक-तरकारी के सिवाय कुछ नहीं खाते हैं और दूसरी तरफ मांस देखकर लार टपकाने वाले ये लोग हैं। उसमें भी पालतू सूअर का मांस खाने से परहेज, पर जंगली सूअर का मांस खाने में कोई दिक्कत नहीं। और तो और, गाय का मांस खाने से इनका धर्म भ्रष्ट होता है। उस पर छोटी जात के या फिर परधर्मियों के हाथ से कुछ नहीं खाएँगे। छूत-अछूत, भक्ष्य-अभक्ष्य इसी कोलाहल में खत्म हो जाएँगे, पता नहीं ये छूत-अछूत का धर्म इन लोगों को किसने थमा दिया है। ब्राह्मणों को छोड़कर अगर किसी और से उनका धर्म कौन-सा है, पूछा जाए तो कहते हैं , ,हमें पता नहीं, भटजी को पूछना पड़ेगा। अफ्रीका या फिर दक्षिण अमेरिका से लौटे उनके बुजुर्ग सैनिक वहाँ के आदिवासियों के बारे में बहुत कुछ कहते थे। गोरे लोग दिखाई पड़ने पर वे आग-बबूला होकर किस तरह ढोल पीटकर अपने अन्य साथियों को इकट्ठा करके जंगल में छिपते और जहर से बने बाण दुश्मनों पर छोड़ते; किस तरह आपस में लड़कर एक-दूसरे का रक्त बहाकर वे नरभक्षण करते थे ये सारी कहानियाँ गोरों ने अपने बुजुर्गों से सुन रखी थीं।
पर यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। न क्रोध, न उन्माद, न जंगली वहशीपन था। इनमें सभ्यता भी न के बराबर थी। सबके चेहरे लाचारी और भय से लिप्त थे और इनके खून में उबाल भी नहीं आता था।
“ये कैसा परास्त जीवन जी रहे हैं ये लोग! इन्हें नष्ट करना कितना आसान है...”
जाने के लिए गोरे घोड़े पर चढ़ गए मांस की गठरियाँ उन्होंने कंधों पर लटका लीं। अंत में जिवु लोहार जाने के लिए उठ गया। उसके हिस्से में आया मांस खून सूखकर काला पड़ गया था। जिवु लोहार आज तक कितने ही सूअर काटकर मांस को हिस्सों में बाँट था, पर आज अपमान और नैराश्य से उसका मन भर आया मांस खाने की इच्छा भी नहीं थी। जिवु का ध्यान शमी के पेड़ की तरफ गया। हर साल दशहरे के समय गुरव और चार-पाँच क्षत्रिय नायक हाथ में तलवारें लेकर गाँव की चारों ओर की सरहदों का चक्कर लगाते हैं। शिगेली रास्ते पर शिंग फूँकता चलता है और आखिर में वे सब शमी के पेड़ के पास आते हैं। गुरव अपने हाथ में पकड़ा त्रिशूल खड़ा करके गाँव की रक्षा के लिए मनोकामना करता है। पर आज शमी के पेड़ के नीचे पड़ी सूअर की अंतड़ियाँ और हड्डियाँ देखकर जिवु पूरी तरह सकबका गया। उसने एक ही झटके में वहाँ रखे मांस को लात मारकर जमीन पर बिखेर दिया।
भाग 4
इसी बीच पचास साल का समय बीत चुका था और 1562 का आरंभ हो चुका था। आदोळशे गाँव वैसे भी एक कोने में पड़ता , इसलिए इस ओर अधिक लोगों की आवाजाही नहीं होती थी। गोवा द्वीप से इसकी दूरी चौदह मील थी और यहाँ तक पहुँचने के लिए उबड़-खाबड़ पहाड़ों, समतल भूमि और जंगलों से होकर गुजरने वाले संकरे रास्तों से आना पड़ता था। इस कारण लोगों की आवाजाही भी कम थी। कभी-कभार लगान पहुँचाने में देरी हो जाती तो पाटीदार और कुछ देसी सिपाही गोरों के साथ आकर गाँववालों को डरा-धमका कर चले जाते।
एक बार गाँव में पंचायत बैठी। उसमें ब्राह्मण, नायक और गाँवकर—इन गुटों के बीच घमासान लड़ाई हुई और खून बहा। उस घटना की तफ्तीश करने एक शेफ चार सिपाहियों के साथ गाँव में आया और चार दिन तक उसने गाँव में ही डेरा डाला। वे कुछ साल आदोळशे के वासियों के लिए मुसीबतों से भरे रहे। हर तरफ से रोज़ एक-न-एक बुरी खबर आने लगी थी। हमेशा डर और दहशत का वातावरण बना रहता। गाँव की सीमा के भीतर तिळाई मासी के भांजे का शव दफन किए जाने की खबर तो पूरे गाँव में फैल गई थी। अब मेले के समय देवी-देवताओं को पालकी में विराजमान करके तालाब पर स्नान के लिए लाया जाता, तब भय के कारण पालकी को ऊपर की ओर रखा जाता और हड़बड़ी में सारा कार्य संपन्न किया जाता। इधर कुछ वर्षों से ढोल-बाजे बजना भी पूरी तरह बंद हो चुका था। ‘हर हर महादेव’ का जयकारा भी नहीं लगता था। गाँव में हमेशा एक अफ़वाह फैली रहती कि तिळाई मासी का भांजा रात के समय गाँव में घूमता है और सबके दरवाज़े पर जाकर फूल और सिंदूर माँगता है। अब गोरे अपने धर्म के प्रचार के लिए कालापुर, मेरशी, पाळले और आगाशी गाँवों में घूम रहे थे। बाकी जगहों पर भी धर्मांतरण का काम ज़ोरों से शुरू हो गया था। लालच दिखाकर, धमकाकर और बहला-फुसलाकर धर्म परिवर्तन कराया जाता है इस तरह की अफ़वाहों ने ज़ोर पकड़ लिया था।
एक सुबह मेरशी गाँव के कुएँ में ढोर की हड्डी दिखाई दी तो पूरा कुआँ खाली कराकर उसमें हवन करवाया गया और उसे शुद्ध किया गया। फिर अगले ही दिन किसी ने कुएँ में दोबारा ढोर की हड्डी फेंक दी। अब गोरे किसी को भी बाँधकर ले जाते और अपने चर्च में खड़ा कर देते। पीछे उनके सैनिक बंदूक और चाबुक लेकर खड़े रहते। वहाँ उन्हें कुछ खाने के लिए दिया जाता और उसके बाद कहा जाता, “अब तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो गया है।” इसके बाद एक और अफ़वाह उड़ गई कि गोवा की जेलों में जितने भी हत्यारे बंद थे, उन सबका धर्म परिवर्तन करके उन्हें जेलों से रिहा कर दिया गया है। अब वे गाँव-गाँव जाकर लोगों को जबरदस्ती उठाते हैं और गोवा पांटन के एक चबूतरे पर खड़ा करके बेचने के लिए उनकी नीलामी पुकारते हैं। आदोळशे गांव के लोग इन दिनों आतंक में जी रहे थे।
भाग 5
महासागरों में इनकी नौकाएँ कभी दिशाहीन होकर भटक जातीं तो कभी समुद्र की तलहटी में समा जातीं तो कभी अन्न-पानी खत्म हो जाने के कारण सफर में भूख से लोग मर जाते थे, फिर भी ये गोरे अदम्य साहस जुटाकर जहाजों के बेड़े लेकर आते रहे। उनके लकड़ी और पाल के जहाज हवा, तूफान और पर्वतों से भी ऊँची लहरों वाले इस त्रिखंड-व्याप्त समुद्र को चीरते हुए आगे बढ़ते रहे। वे गिरोह बनाकर आते रहे। हिंदुस्थान के कोच्चि शहर से लेकर दीव-दमन से हजारों मील दूर तक फैले प्रदेशों में वे अपने साम्राज्य का विस्तार करते रहे। समुद्र की लहरों पर विजय हासिल करते-करते उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर कब्जा किया। समुद्र में जहाज खड़ा करते और जमीन पर रहने वाले लोगों को ललकारकर उनके साथ युद्ध करते। समुद्र के रास्ते आते समय अरब के व्यापारियों को लूटकर उन्हें भगा देते।
नौकायन में वे काफी प्रवीण थे, पर इंसानियत के मामले में उतने ही असभ्य और क्रूर। अशिक्षित लोगों पर धर्म की अफीम की गोली का असर जल्दी होता है। इसीलिए आते समय उनके एक हाथ में तलवार होती तो दूसरे हाथ में क्रॉस। यहाँ आने का उनका मुख्य उद्देश्य ही अपने धर्म का विस्तार करना था। नहीं तो इतनी सारी मुसीबतों का मुकाबला करके वे यहाँ क्यों आते? यहाँ आकर न तो वे अमीर हुए, न ही उन्होंने अपने साम्राज्य का उस तरह विस्तार किया, जैसा वे चाहते थे। उन्होंने यहाँ की जनता पर कई तरह के अत्याचार किए। उन्हें मारकर, जलाकर और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाया। उनके इन जुल्मों के कारण यहाँ के लोग उनसे दूर होते गए, पर उन लोगों को किसी भी बात की चिंता नहीं थी। उनके अत्याचार से डरकर कई लोग गोवा छोड़कर जा रहे थे इसतरह पूरा गोवा द्वीप खाली होता जा रहा था, फिर भी उनका विवेक नहीं जाग रहा था। उनका मकसद केवल एक ही था धर्म का प्रचार-प्रसार करना।
कहा जाता रहा कि किसी म्हाळ पै और होनावर के सरदार तिमय्या की सहायता से पुर्तग़ालियों ने गोवा द्वीप पर कब्जा किया था। यह कहना सही नहीं है। असल में धर्म के प्रचार की आकांक्षा से ही आल्बुकेर्क ने बहुत कम सैनिकों के साथ आदिल शाह के शक्तिशाली सैनिकों को हराकर गोवा राज्य पर कब्जा किया था। पुर्तग़ाली सैनिकों और सैन्य प्रमुखों ने प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भाग लिया था। उनके सैनिक क्रूर और शक्तिशाली थे। अगर धर्म का भूत उन पर सवार न होता तो अपने साम्राज्य को फैलाकर, व्यापार करके दौलतमंद बन सकते थे।
पुर्तग़ाल से गोवा द्वीप तक समुद्र की लंबी दूरी तय करते समय रास्ते में उनके सिपाही भूख और तूफानों से जूझते और उनमें से कई सिपाही मर भी जाते थे। इसलिए वायसराय आल्बुकेर्क अपने सिपाहियों और कप्तानों को स्थानीय स्त्रियों के साथ विवाह करने के लिए बाधित करता। युद्ध में हारे हुए मुसलमानों की जवान बीवियों के साथ अपने सिपाहियों की शादियाँ उसने स्वयं करवा दीं। इस तरह जो भी शादी करता, उसे धन-संपत्ति दी जाती थी। जितने वे क्रूर और शक्तिशाली थे, उतने ही चालाक और धूर्त भी थे। भले ही उनका मुख्य उद्देश्य धर्म परिवर्तन था, पर शुरू के तीस वर्षों में उन्होंने स्वयं को स्थापित किया, मुसलमानों से निजात पाकर सुव्यवस्थित शासन कायम किया। शुरुआती दौर में यहाँ अपना आसन जमाने के लिए उन्होंने हिंदुओं को आश्वासन दिया था कि उनका धर्म और अधिकार सुरक्षित रहेंगे। ऐसे अनेक आश्वासन उन्होंने दिए, पर आगे चलकर उनका पालन नहीं किया। धर्म परिवर्तन और धर्म भ्रष्ट करने के उस दौर में हिंदुओं पर नाना प्रकार के जुल्म हुए। पुर्तग़ालियों ने उनके साथ पाशविक व्यवहार किया। अन्य धर्मों की तुलना में उस दौर में हिंदुओं पर अधिक अत्याचार हुए।
एक तरफ अपनी जमीन , जाति, धर्म और अपने सगे-संबंधियों के प्रति उनका अत्यधिक प्रेम था और दूसरी तरफ स्पृश्य-अस्पृश्य, पवित्र-अपवित्र जैसी अंधश्रद्धाओं की कड़ी दीवारें थीं। और जब इन दीवारों की ईंटें एक-एक करके टूटने लगीं, तब बड़ी उथल-पुथल मच गई। जो लोग चमारों, ढेडों और राजस्लव हुए औरतों की परछाईं पड़ने मात्र से स्वयं को भ्रष्ट मानते थे, उन लोगों के लिए अपना धर्म त्यागकर मांस-भक्षण करने वाले धर्म को अपनाना एक बड़ा अनर्थ था। दूसरी ओर ये गोरे अपने धर्म की मूल वास्तविकता और उसके उसूलों को ताक पर रखकर क्रूरता और अत्याचार कर रहे थे। इससे सब लोग खौफ खाने लगे थे। गोवा द्वीप पर उनकी धार्मिक न्यायसभा या इनक्विजिशन की इमारत की तरफ उँगली उठाने से भी लोग डरते थे। इतनी दहशत उन्होंने लोगों के मन में भर रखी थी। फिर धर्म-प्रचार के पीछे स्वभाव में मौजूद यह क्रूरता और हिंसा एक पहेली की तरह थी। खासकर उनके उस धर्म में, जिसकी सीख थी एक गाल पर तमाचा पड़े तो दूसरा गाल आगे कर दो। दया के सागर, प्रेमस्वरूप प्रभु यीशु की सीख लेकर आए हुए ये गोरे इतने निर्दयी और कठोर कैसे बने? क्यों इन्होंने मंदिरों को तोड़ा और यहाँ के लोगों पर अत्याचार किया?
उनके इतने सारे धर्म-पंडित, राजा और वायसराय थे, सैन्य प्रमुख और सरदार थे। इन सबने इस बात पर क्यों विचार नहीं किया कि उनका यह क्रूर व्यवहार दुनिया के महान धर्म पर कलंक लगा रहा है? क्यों वे इस काले कालखंड के प्रेरक बने? क्यों उन्होंने इस अंधे कारोबार को रोकने की कोशिश नहीं की? उन्होंने शासन और धर्म-संस्था का सुव्यवस्थित तालमेल बिठा लिया था। दोनों एक-दूसरे की सहायता से हाथ में हाथ डालकर धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य जोर-शोर से कर रहे थे। जरूरत पड़ने पर हाथ में तलवार लेकर भी इस कार्य को सुव्यवस्थित किया जा रहा था। वे बहुत शक्तिशाली थे समय पड़ने पर इनक्विजिशन राजा को भी धमकाने के लिए तैयार रहता था।
पादरी तोरकीमेड स्पेन के इनक्विजिशन का प्रमुख धर्म-न्यायाधीश था। एक बार इनक्विजिशन के भय से अपना घर-बार छोड़कर जा रहे यहूदी लोगों ने राजा फेर्दिनान्द के पास जाकर विनती की और कुछ समय के लिए आश्रय माँगा। तब राजा ने तीस हजार दुकाट की रकम लेकर उन्हें कुछ वर्षों तक अपने राज्य में यहूदी के रूप में रहने की अनुमति दी। जब यह खबर इनक्विजिशन के मुखिया तोरकीमेड को पता चली, तब उसे बहुत गुस्सा आया और वह सीधे राजा के पास गया। उसने कहा—
“जुडास इस्करियोत ने चाँदी के तीस सिक्कों के बदले यीशु को बेच दिया था। अब तुम उन्हें तीस हजार दुकाट में बेचो। मैं स्पेन छोड़कर पोप के पास जा रहा हूँ।” इतना कहकर उसने अपने हाथ का दंड राजा के पास फेंक दिया। राजा बड़ी विनम्रता से सिंहासन से उठा। उसने बड़ी श्रद्धा के साथ उस दंड को उठाया और तोरकीमेड के हाथ में दे दिया। उसके अगले ही दिन उसने तीस हजार यहूदी लोगों को अपने देश से निकाल दिया।
भाग 6
तलवार का डर दिखाकर जबरदस्ती ईसाई धर्म अपनाने के लिए बाध्य करने वालों के पास बड़ी ताकत थी। उनके मन से प्रेम, दया और क्षमा जैसे सारे भाव मिट चुके थे। उनके हृदय से कोमलता लुप्त हो चुकी थी। यीशु के नाम पर वे धर्म का प्रचार-प्रसार तो कर रहे थे, पर उनके व्यवहार में कहीं भी यीशु की सीख दिखाई नहीं देती थी। पर कुछ लोग इस बर्बरता के अँधेरे में आशा के दिपक की लौ बचाए रखने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें पता था कि उनकी ताकत पर्याप्त नहीं है। एक क्षण के लिए भी यदि यीशु का हाथ छूट जाता तो वे छटपटाने लगते। उनका मानना था कि यीशु के करुणामय संदेश का प्रचार करके, लोगों के हृदयों का परिवर्तन करके ही उन्हें ईसाई बनाया जाना चाहिए। उनमें से एक पादरी, सीमॉव पिरिस, कुछ सनकी स्वभाव का था। हिंदुओं के बीच व्याप्त स्पृश्य-अस्पृश्यता, अज्ञानता और अंधविश्वास को देखकर वह भीतर तक अस्वस्थ हो उठता था।
भाग 7
एक दिन लोगों ने उस गोरे पादरी को गाँव में अकेले घूमते देखा। कभी किसी ने इस तरह किसी गोरे को अकेले घूमते हुए आज तक नहीं देखा था। पर यह पादरी बेखौफ गली-गली अकेला घूम रहा था। उसने उम्र के पचासी वर्ष पूरे कर लिए थे। लंबा, मजबूत कद-काठी वाला। उसके सिर और दाढ़ी के बाल पूरी तरह सफेद होकर सुनहरे रंग में बदल गए थे। गाँव वाले सोचते थे—यह कौन अनजान आदमी है, जो समंदर पार से आकर यहाँ बेफिक्र घूम रहा है ?
पादरी सीमॉव पिरीस गाँव-गाँव घूमकर धर्म का प्रवचन देता और प्रार्थनाएँ करता था। पूरी ताकत लगाकर वह ईसाई धर्म की महिमा का बखान करता। प्रवचन करते समय उसकी भाव-भंगिमा देखकर ऐसा लगता, मानो वह देवलोक में ही विचर रहा हो। उसकी मधुर और कण्ठस्थ आवाज़ हर घर तक पहुँचती थी। प्रेम, ममता, दया और सेवा-भाव से भरा उसका हृदय उसकी मधुर आवाज़ के माध्यम से अभिव्यक्त होता था। फिर भी एक महीने तक उसका प्रवचन सुनने के लिए एक भी व्यक्ति आसपास नहीं फटका। न ही किसी ने उसका प्रवचन सुनने में कोई दिलचस्पी दिखाई। गाँव में चारों ओर से अशुभ खबरें आ रही थीं। लोग सोचते थे यह उन्हीं का आदमी है, यहाँ आकर यह क्या कह रहा है ? लोगों के मन में संदेह था। कभी-कभी इस गोरे पादरी पर उन्हें क्रोध भी आता था।
न कोई उसे सुन रहा था, न कोई उसे पूछ रहा था। फिर भी वह रोज आता, बिना चूके हर मोहल्ले में जाता, प्रवचन देता और प्रार्थना करता। उसकी मधूर आवाज़ घर-घर में पहुँच रही थी। सब कहते थे क्यों यह अपना खून-पसीना एक कर रहा है ? किसने इसे यहाँ आने के लिए इतना मजबूर किया है ?
एक दिन शिरवाड़ी के सभी नौजवानों ने मिलकर इस पादरी को धमकाया “आगे से यहाँ दिखाई दिया तो हम सब तुम्हारे पैर तोड़कर बहुत बुरा हाल कर देंगे । हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। फिर भी पादरी नहीं रूका अपने नियम के अनुसार रोज नियत समय पर वहाँ पहुँच गया और गाँव की सीमा पर रहकर उसने अपना प्रवचन शुरू किया
“आसमान से उतरा साक्षात् भगवान का पुत्र, जिसने पवित्र मरियम की कुँवारी कोख से जन्म लिया था। वह दुनिया में करुणा, प्रेम और सुख-समृद्धि का संदेश लेकर आया था। प्रेम और दया से भरे ह्रदय से उसने कहा था । प्रेम में अपार शक्ति है। इसीलिए आप सब अपने परिवार, पड़ोसी और दुश्मनों से प्रेम करो। प्रेम और अपनेपन से दुश्मन भी प्रिय मित्र बन सकता है। कोई अगर आपके एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा गाल आगे करो। आप सबके हृदय में स्थित प्रेम और आँखों में बसी करुणा की अश्रुधारा से इस दुनिया में इंसानियत और सद्भावना का प्रसार होगा। इस तरह हम इस सृष्टि में प्रेम का प्रसार कर सकते हैं… आमेन।”
इतने में किसी ने पेड़ की ओट से पादरी के ऊपर पत्थर फेंका। वह ठीक उसके कपाल पर लगा और जख्म हो गया। कपाल से खून बहने लगा। उसी क्षण पादरी घुटनों के बल जमीन पर बैठ गया और उसने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए पत्थर मारने वाले को क्षमा करने की याचना की
“हे ईश्वर! उन्हें पता नहीं कि वे क्या कर रहे हैं। अज्ञानता से भरे हुए उन लोगों के गुनाह को आप माफ करना।”
अगले दिन पादरी सीमॉव फिर शिरवाड़ी में आया। उसके कपाल पर लगा जख्म अब तक नहीं भरा था। उसने प्रवचन शुरू किया
“सृष्टि में व्याप्त स्वार्थ, क्रोध और हिंसा जैसी सभी दुष्ट प्रवृत्तियों को दूर करके इंसानों को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए ईश्वर ने अपने पुत्र यीशु को धरती पर भेजा है। उसका हृदय आसमान जितना बड़ा और समंदर जितना विशाल है। वह हम सबकी अंतरात्मा का राजा है…”
पादरी ने देखा कि मोहल्ले की कुछ स्त्रियाँ और पुरुष उसके सामने आकर उसका प्रवचन सुन रहे हैं। एक“आप सब श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान के पुत्र यीशु को स्वीकार करो और अपने दुख-संकट उनके चरणों में रखो। फिर देखना, आप सबके दुख दूर होंगे। हम इंसानों से हमेशा कुछ न कुछ पाप होता रहता है और अंत में उसका दंड हमें भुगतना पड़ता है । यीशु पर अपनी श्रद्धा रखो। अपने हृदय को उनके समक्ष खोलकर अपने हाथों से हुए पापों को उनके सामने रखकर कबूल करो। वह आप सबको उन पापों से मुक्ति देंगे। वह आप सबकी बुरी आदतों का अंत करेगा। वह ईश्वर का पुत्र है। जिस वृक्ष को उसका स्पर्श होता है, वह फल और फूलों से भर जाता है। उसके एक स्पर्श से रोगी निरोगी हो जाता है। एक बार कुछ लोग नाव में बैठकर समंदर में जा रहे थे। तभी अचानक तूफान आया। उन सबने यीशु का स्मरण किया। तभी चमत्कार हुआ। स्वयं यीशु पानी पर चलते हुए नौका के सामने आए। जैसे ही उनके पैर पानी पर पड़े, तूफान थम गया और समंदर शांत हो गया। दुनिया के सारे पाप, सारे दुख यीशु ने अपने कंधों पर ले लिए। दुनिया के कष्ट दूर करने के लिए यीशु खुशी-खुशी क्रूस पर चढ़ गए। यीशु को स्वीकार करो, दुख और परेशानियाँ हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जाएँगी। आमेन।”
अणु कुछ दूरी पर बेल के पेड़ के नीचे खड़ा था पादरी की बातें सुनकर बहुत प्रभावित हुआ। उसने पास जाकर पूछा, “हे अजनबी, यह जो तुम कह रहे हो, क्या वह सत्य है?”
“हाँ अक्षरक्षा सत्य है यीशु के इन उपदेशों को यीशु के शिष्य अंतोनिने ने अपने शिष्य पावलू को बताया और पावलू ने ये उपदेश पूरी दुनिया को बता दिए, ऐसा कहा जाता है। जब क्रूस पर यीशु की मृत्यु हुई, तब अठारह दिनों तक यीशु के उपदेशों की प्रतिध्वनि होती रही। उनके कहे एक-एक शब्द समस्त सृष्टि में घूम रहे थे। खेत में काम करने वाले किसानों ने, जंगलों में घूमते चरवाहों ने और भट्टी में रोटियाँ सेंकने वालों ने उन्हें सुना और वे सब एक-दूसरे को बार-बार यही शब्द सुनाते रहे।”
अणु ने पादरी के पैरों में गिरकर पादरी के चरण स्पर्श किए। पादरी की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उसने अणु से कहा, “यीशु तुम्हारा कल्याण करेंगे। अब तुम्हें सारी चिंताओं से मुक्ति मिलेगी।”
वहीं पेड़ की ओट में गुणा खड़ा था। वह आगे आया और पादरी को धमकाते हुए बोला, “गोवा पाटण में और आसपास के गाँवों में आप लोगों ने जबरदस्ती धर्म परिवर्तन का काम शुरू किया है। चोडण द्वीप का चामुंडेश्वरी मंदिर तोड़कर मिट्टी में मिला दिया है , और सुना है, अगर कोई इसका विरोध करता है तो तुम्हारे सिपाही उन्हें पीट-पीटकर बंदी बना लेते हैं। तुम्हारा यह कौन-सा षड्यंत्र है, जो तुमने यहाँ चला रखा है? लगता है, हमें जाल में फँसाने के लिए तुम्हें भेजा गया है। तुम्हारी कुटिया में हमने एक आदमी को देखा था। उसके हाथ में तलवार भी थी। हमें तो तुम बड़े धोखेबाज इंसान लग रहे हो।”
मानो हृदय के भीतर कोई टीस उठ गई हो। कुछ इसी तरह के भाव पादरी के चेहरे पर उभर आए। उसने तिलमिलाते हुए कहा, “नहीं, मेरे भाई। तुम्हें कुछ गलतफहमी हुई है। तुम गलत सोच रहे हो। मैं प्रेम और करुणा का संदेश लेकर आया हूँ। धर्म के बल पर लालच दिखाना पाप है। कुछ लोग गलत राह पर जा रहे हैं। हम ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। वह उन्हें सद्बुद्धि देगा। वे लोग भी यीशु पर अपार श्रद्धा रखने वाले हैं, धर्म का अनुसरण करने वाले हैं। किसी ने उन्हें भटकाकर गलत राह दिखाई है। यीशु ने जो राह बताई है, उस पर इंसानियत के बल का उपयोग करके जबरदस्ती यह काम नहीं किया जा सकता। इस तरह का व्यवहार दया के सागर यीशु को अमान्य है। यह उनके उपदेशों के विरुद्ध है। आमेन…”
इतना कहकर पादरी चलने लगा और उसके पीछे-पीछे अणु भी कदम से कदम मिलाकर चलने लगा। मोहल्ले के लोग यह सब देखकर क्रोध और क्षोभ से भर गए। उन सबने अणु को पीछे से आवाज दी
“अणु! पीछे आ, मत जा। माँ-बाप के बिना अनाथ बच्चा है तू और घर में अपाहिज भाई है तेरा। बिना सोचे-समझे उस अनजान व्यक्ति के साथ मत जा। कल कोई ठिकाना नहीं रहेगा तेरा ।” उनमें से एक उसे खींचकर वापस लाने के लिए दौड़ा, पर उसे यह कहते हुए सबने रोक दिया, “परधर्मी व्यक्ति को छुआ है उसने। स्नान करके गोबर के पानी का छिड़काव किए बगैर उसे छुआ नहीं जा सकता।”
अणु सबकी आवाजें अनसुनी करके खेत, पगडंडी सब पार करके पादरी के पीछे जा रहा था। पर पादरी पीछे मुड़कर उसकी ओर देख भी नहीं रहा था। केवल उसके कदमों की आहट सुन रहा था। बीच में एक वनराई पार करके वे आगे बढ़े। लगभग एक एकड़ में फैली वह वनराई घने वृक्षों से घिरी हुई थी। अभी भी वहाँ सुबह की ठंड की शीतलता थी। दूसरी ओर नाले के बगल में खड़ी महारों की झोपड़ियाँ मानो ओस की बूँदों में भीगती हुई खड़ी थीं। ऐसा लग रहा था। आसमान में काले बादलों के बीच सूर्य जाग रहा था। गाँव के बीचों-बीच पसरे हरे-भरे रबी के खेतों में अभी भी सफेद धूप उतरना बाकी थी, इसलिए हर रंग कुछ स्याह-सा दिखाई दे रहा था। कुछ दूर जाकर पादरी एक बाँद पर रुक गया और उसने पीछे मुड़कर कहा, “अज्ञानी बालक, तुम किस दिशा में जा रहे हो?”
“मैं आपकी राह पर आपके साथ जाने के लिए निकला हूँ। क्योंकि आप मेरी भेंट प्रभु यीशु से कराएँगे। मैं उनसे मिलने के लिए बहुत आतुर हूँ।”
“क्या यह तुम अपने मन से कह रहे हो?”
“हाँ, मैं उनसे मिलने के लिए बहुत आतुर हूँ।”
“क्यों? तुम्हारे पास तुम्हारा भगवान नहीं है?”
“तो यीशु किसका भगवान है?”
“तुम बहुत भोले और निष्पाप हो। चलो, कुछ दिन मेरे साथ रहो। तुम जब तक चाहो, मेरे साथ रह सकते हो। जिस दिन तुम्हारा मन यहाँ से जाने का होगा, तुम जा सकते हो। पर जब तुम यीशु और उसका धर्म स्वीकार करोगे, तब तुम उसे कभी नहीं छोड़ सकते।”
इतना कहकर पादरी चलने लगा। उसके पीछे-पीछे अणु भी चलने लगा। वे दोनों मंदिर के पार, पहाड़ी के नीचे, जहाँ उसकी झोपड़ी बनी थी, वहाँ आए। गोवा पाटण से सैनिकों ने आकर एक ही दिन में पादरी के लिए यह झोपड़ी बनाकर दी थी। भीतर के एक खंभे पर लकड़ी का बड़ा-सा क्रॉस टँगा हुआ था। एक कोने में चूल्हे के सामने बैठकर एक बलिष्ठ सा आदमी चूल्हा फूँक रहा था। चूल्हे पर रखे मटके में उबाल आ रहा था। उसे देखकर अणु ने पादरी से पूछा, “ये कौन हैं, पादरी बाबा?”
“ये थॉमस है। मेरी देखभाल करने के लिए वायसराय ने इसे मेरे पास भेजा है। पर मुझे क्यों रक्षा चाहिए? वह देख, वहाँ उसकी तलवार। जब से आया है, वहीं लटक रही है। यहाँ वह केवल रसोई बनाता है और नीचे जाकर पानी लेकर आता है। पहले वह भी तुम्हारी तरह हिंदू था।”
अणु के आने की आहट सुनते ही थॉमस वहाँ आकर खड़ा हो गया, जहाँ उसकी तलवार टँगी थी। उसके बदन पर केवल एक लंगोट था।
पादरी सीमॉव पिरिस ने उससे कहा, “थॉमस, यह हमारे साथ लगभग पंद्रह दिन रहेगा। उसके बाद तय करेगा कि इसे हमारा धर्म स्वीकार करना है या नहीं।”
थॉमस हँसने लगा।
“पंद्रह दिन बहुत हुए, फादर। एक ही दिन में तय कर लेगा ये ।”
“थॉमस, तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?”
“यहाँ एक बार आने के बाद वापसी का रास्ता अपने आप बंद हो जाता है। परसों पानेली में जो घटना हुई, वह पता है न आपको? एक ईसाई परिवार बैलगाड़ी से जाते समय रास्ते में रुका। उन्होंने तीन पत्थरों को जोड़कर एक चूल्हा बनाया और उस पर खाना पकाकर खा लिया और वहाँ से चले गए। उनके पीछे एक हिंदू परिवार ने उसी चूल्हे पर खाना पकाकर खाया। जब यह बात उस हिंदू परिवार की जाति के लोगों को पता चली तो उन सबने मिलकर उस परिवार को जाति से बाहर कर दिया। उनके साथ सभी व्यवहार बंद कर दिए।
जब यह परिवार आत्महत्या करने के लिए नदी के पास गया था, तब एक सिपाही ने उन्हें देख लिया और उन सबको पकड़कर पादरी के पास लेकर आया। उसके अगले दिन गोवा पाटण के सांत कातारीन चर्च में लाकर उन सबका बाप्तिज्म कर दिया गया।”
पादरी ने एक गहरी साँस छोड़कर कहा, “बहुत हट करके आया है यह मेरे साथ। यीशु के सामने मेरी यही प्रार्थना है कि मेरे सिर पर जबरदस्ती का पाप न लगने पाए।”
अणु उस सिपाही के पास गया। ईसाई होकर भी उसने सिर मुंडवा रखा था और ऊपर बीच में भँवरा रखा था, पर शिखा नहीं रखी थी। कान की लौ में छेद तो था, पर खाली था। हो सकता है, कान में डाली बालियाँ उसने निकाल दी हों।
अणु ने उससे पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
देर तक वह खोया-सा रहा। बाद में भर्राई हुई आवाज़ में धीरे से बोला, “देवु नाम है मेरा। तुम मुझे देवु मामा कहकर पुकार सकते हो।”
अणु ने उसकी नम आँखों के भीतर झाँका, पर कुछ कहा नहीं।
देवु ने उससे पूछा, “तुम क्यों आए हो यहाँ?”
“मुझे हमेशा लगता था कि गाँव छोड़कर कहीं चला जाऊँ। पंढरपुर जाने की भी इच्छा होती थी। पिछली बार जब पंढरपुर की वारी में जाना चाहता था, तब सैरु चाचा ने यह कहकर मना कर दिया कि तुम अभी छोटे हो। पादरी ने कही बात मुझे अच्छी लगी। सुना है, भगवान यीशु बहुत अच्छे हैं। वह जिस भी वृक्ष को छूते हैं, वह वृक्ष फल-फूलों से भर जाता है।”
“किसे पता कौन अच्छा है, कौन बुरा? यहाँ हर कोई अपनी-अपनी बात करता है। दो साल हो गए मुझे बाप्तिज्म लिए। मेरी पत्नी और बच्चे अभी भी हिंदू हैं। जब तक वे सब बाप्तिज्म नहीं लेते, तब तक मैं उनके पास नहीं जा सकता। कई दिन हो गए आज बाप्तिज्म लेंगे, कल लेंगे’ कहकर दिन धकेल रहे हैं। आगे क्या होगा, वह यीशु ही जाने।”
“लेकिन आप क्यों ईसाई बने?”
“एक क्षण का मोह आज भुगत रहा हूँ। मेरी बुद्धि भ्रष्ट हुई थी। मैंने एक गोरे सिपाही के संदूक से सोने के क्रुसाद (पुर्तग़ाली सिक्के) चुरा लिए थे। उन्होंने मुझे पकड़ लिया और मेरी कमीज़ की जेब में हाथ डालकर उन्होंने चुराए हुए क्रुसाद निकाल लिए। जब वे मुझे जेल में डालने के लिए ले जा रहे थे, तब कप्तान ने कहा—‘अगर तुम ईसाई होने के लिए तैयार हो तो हम तुम्हें छोड़ देंगे और तुम्हारी नौकरी भी नहीं जाएगी। वायसराय का ऐसा आदेश है।’
मैं तैयार हो गया। बाद में मुझे गोवा पाटण के चर्च में बाप्तिज्म दिया गया।”
“बाप्तिज्म मतलब क्या करते हैं?”
“ज्यादा कुछ नहीं। पहले जाकर तालाब में स्नान करके आना पड़ता है। बाद में वे उँगलियों पर तेल लगाकर कनपटी पर स्पर्श करते हैं। फिर कुछ खाने के लिए दिया जाता है। उसके बाद प्रवचन और प्रार्थना करते हैं और अंत में बाप्तिज्म लेने वाले का हिंदू नाम बदलकर उसका ईसाई नाम रखा जाता है। पहले मेरा नाम देवु था, अब थॉमस फ़र्नान्डिस हूँ।
यहाँ वे बड़ी चालाकी से हमसे लिखकर लेते हैं कि हम अपनी इच्छा से ईसाई बन रहे हैं।”
“भजन-कीर्तन करते हैं ये लोग?”
“भजन तो नहीं, पर सुर-ताल के साथ गीत गाते हैं। वह तो हमें बिल्कुल समझ नहीं आता।”
“ देवुमामा आप को ईसाई धर्म अपनाने का पछतावा होता है क्या ?”
अणु ने जब ‘देवु मामा’ कहा तो मानो उसके देह पर काँटे उठ आए और वह रोमांचित हो उठा। उसने कहा, “अब पछतावा नहीं है। बस, शुरुआत के एक महीने तक बेचैनी लगातार बनी रही। अब एक बार मेरा परिवार मेरे पास आ जाए तो बस… और तुम्हारा नाम क्या है ? यह तो मैंने पूछा ही नहीं।”
“अणु है मेरा नाम।”
“मेरे एक मौसेरे भाई का नाम भी अणु ही है।”
भाग 8
पादरी सिमॉव पिरिस कपड़े बदलकर खंभे पर टंगे क्रूस के सामने घुटने टेककर लैटिन भाषा में प्रार्थना करने लगा। पादरी सिमॉव पिरिस मूलतः स्पेन का रहने वाला था। उसके पिता एक पुर्तगाली नाविक थे। एक बार उनका फातमार जहाज़ स्पेन के समुद्र में डूब गया । वे काफी समय तक स्पेन में रहे। वहीं उन्होंने स्पेन की एक लड़की से विवाह कर लिया। सिमॉव के जन्म के बाद वे हमेशा के लिए पुर्तगाल लौट आए। सिमॉव की माँ संतरे के बगीचे में काम करती थी। अथक परिश्रम करने के बावजूद उनके परिवार को हमेशा दो वक्त की रोटी के लाले पड़े रहते थे। कुछ समय बाद उसकी माँ ने दूसरी शादी कर ली। सिमॉव का सौतेला पिता सड़े हुए संतरे इकट्ठा करके उनसे शराब बनाता था। स्वभाव से वह बेहद उग्र और क्रोधी था। शराब के नशे में वह सिमॉव की माँ के बालों में उँगलियाँ लपेटकर उन्हें इतनी बेरहमी से खींचता कि तीन-चार साल बाद उसके सिर के लगभग सारे बाल झड़ गए। उसके साथ भी दुर्व्यवहार करता था। छोटी-सी गलती होने पर भी वह उसके पेट और पीठ पर घूँसे बरसाता। सिमॉव ने स्पेन की एक धार्मिक संस्था में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी।
तेरह वर्ष की उम्र में एक दिन वह घर से भाग गया और बिछौने बनाने की एक फैक्टरी में काम करने लगा। वह कपास को बड़ी कुशलता से छाँटता था । एक दिन उसके कारखाने के सामने ही पुर्तगाली और स्पेनिश दोनों देशों के सैनिकों के बीच बहुत बड़ा झगड़ा हो गया। झगड़े में स्पेन के एक सैनिक ने पुर्तगाली सैनिक को तलवार से मार डाला। इसके बाद कुछ स्थानीय लोग वहाँ आए और उन्होंने पुर्तगाली सैनिक की लाश पर कीचड़ फेंका। उस समय स्पेन और पुर्तगाल, दोनों राष्ट्रों के बीच राजा और राजगद्दी को लेकर संघर्ष चल रहा था। राजसत्ता की इस लड़ाई में धीरे-धीरे आम लोग भी शामिल होते जा रहे थे।
अगले दिन कारखाने के मालिक ने सिमॉव से पूछा,
“क्या तुम मूलतः पुर्तगाली वंश के हो?”
सिमॉव की आँखों के सामने ही पुर्तगाली सैनिक की हत्या हुई थी , इस घटना को देखकर वह भीतर तक डर गया था। उसे इस बात पर भी आश्चर्य हुआ कि कारखाने के मालिक को कैसे पता चला कि वह पुर्तगाली वंश का है। उसने कोई उत्तर नहीं दिया और उसी रात वहाँ से भागकर चर्च चला आया। कुछ वर्षों तक उसने चर्च में सेवा की , उसकी ईमानदारी और निष्ठा देखकर वहाँ के प्रमुख पादरी ने उसके नाम एक चिट्ठी लिखी और कुछ पैसे उसके हाथ में देकर उसे व्हेटिकन में धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेज दिया।
उसने आधा सफर जहाज़ में बैठकर तय किया और उसके बाद सैकड़ों मील पैदल चलकर व्हेटिकन पहुँचा। वहाँ पहुँचते-पहुँचते भूख और प्यास से उसकी हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था। व्हेटिकन में सात वर्ष रहने के बाद वह पादरी बनने की शिक्षा लेने ग्रीस चला गया। वहाँ उसका अनुभव अच्छा नहीं रहा। कुछ लोग ईसाई धर्म के विरोध में बातें करते थे। एक दिन सिमॉव एक पुराने किले के भग्नावशेष देखने गया था। वहां पर कुछ युवकों ने उस पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए और चिल्लाकर वे कह रहे थे
“इस हरामज़ादे धर्म के नाम पर हमारी परंपरा और संस्कृति को नष्ट कर दिया है!”
उस घटना के बाद वह तुरंत व्हेटिकन लौट आया।
पोप के आदेशानुसार उसे पहले सीलोन और बाद में गोवा भेजा गया। उसके पास पुर्तगाली राजा का कोई पत्र नहीं था। उसके पास केवल पोप द्वारा दिया गया आज्ञापत्र था। गोवा पहुँचने के बाद जब वह वायसराय के पास गया, तो उसे रहने की अनुमति देने में वायसराय आनाकानी करने लगा। ऊपर से पुर्तगाल से आए जेजुइट पादरी भी वायसराय पर दबाव डाल रहे थे कि सिमॉव को गोवा में रहने की अनुमति न दी जाए। फिर भी वायसराय ने पोप के आज्ञापत्र का पालन किया और सिमॉव को गोवा में रहने की अनुमति दे दी।
इस तरह सिमॉव पिरिस की नियुक्ति गोवा पाटन के निकट स्थित आदोळशे गांव में हो गई। उसके साथ-साथ हर छह महीने में चालीस क्रुसाद और एक सिपाही भी उसके खर्च और सुरक्षा के लिए भेजा जाने लगा। आदोळशे गाँव में आने से पहले सिमॉव आठ महीने सांत पावलू कॉलेज में रह चुका था। वहाँ उसने स्थानीय लोगों के रीति-रिवाजों के साथ-साथ हिंदू धर्म के बारे में भी जानकारी जुटाई थी और स्थानीय भाषा भी थोड़ी-बहुत सीख ली थी। वहाँ के पादरी उसे पुर्तगाली नागरिक नहीं समझते थे। इसलिए न तो कोई उससे घुलता-मिलता था और न ही उससे कोई विशेष व्यवहार करता था। वे उसे राजा का आदमी भी नहीं मानते थे।
आदोळशे गाँव जाने से पहले वह वायसराय कोन्स्तान्तीन ब्रागंझा से मिलने गया था। वायसराय ने उससे कहा था—
“मुझे अक्सर सपने आते हैं कि यह गोवा द्वीप पूरी तरह ईसाई धर्म के लोगों का हो गया है और मेरे इस काम से प्रसन्न होकर राजा ने मुझे सम्मानित किया है। मुझे लगता है कि जल्द ही मैं इस गोवा द्वीप को ईसाई बनाकर ही दम लूँगा। इसके लिए मुझे आप सबके सहयोग की आवश्यकता है।”
इस पर पादरी सिमॉव ने कहा—
“मैं आदोळशे गाँव में जाकर लोगों को ईसाई धर्म की श्रेष्ठता का उपदेश देकर उन्हें बताऊँगा कि प्रभु का पुत्र यीशु करुणा का सागर है। लेकिन उनके मन के विरुद्ध उन्हें फँसाकर, बहलाकर या छलपूर्वक उनका बाप्तिस्मा नहीं कराऊँगा।”
वायसराय ने कहा
“आप यह मत भूलिए कि आप यहाँ पोप की आज्ञा से आए हैं। यहाँ का राजा पोप के विचारों पर चलता है और उनकी हर आज्ञा का पालन करता है। राजा का धर्म ही उसकी प्रजा का धर्म होना चाहिए यह राजा का हुक्म है।”
सिमॉव ने शांत स्वर में कहा
“निश्चित ही ऐसा होगा, पर बल या छल से ऐसा नहीं होना चाहिए। पहले हमें उन सबका हृदय जीतना होगा और उन्हें श्रद्धा के साथ इस धर्म को अपनाने के लिए तैयार करना होगा। इस काम में कुछ अधिक समय लगेगा, पर डरा-धमकाकर अगर हम उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर करेंगे तो आगे चलकर वे अच्छे ईसाई नहीं बनेंगे। और ऐसा हुआ तो ये लोग हमारे ही धर्म के विरुद्ध काम करेंगे। यदि हम उन्हें जबरदस्ती ईसाई धर्म अपनाने के लिए कहेंगे तो इससे हमारे धर्म को भी नुकसान पहुँचेगा।”
वायसराय ने कहा
“इनक्विज़िशन की स्थापना करके राजा ने इसका उपाय भी निकाल लिया है। इनक्विज़िशन ईसाई धर्म के विरुद्ध किसी भी कृत्य को सहन नहीं करेगा। वे बहुत शक्तिशाली हैं।”
पादरी सिमॉव ने शांत भाव से कहा
“सचमुच, यहाँ के अशिक्षित, दुर्बल और नासमझ लोगों के लिए इनक्विज़िशन की जरूरत है? आपको नहीं लगता कि इससे लोग डरकर धर्म से और भी दूर हो जाएँगे?”
सिमॉव की इस बात पर वायसराय कोन्स्तान्तीन ब्रागंझा क्रोधित हो उठा।
“आपने आज जो कुछ भी कहा, वह आखिरी बार होना चाहिए। आज के बाद उनके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोलेंगे। आप इस बात का ध्यान रखिए। आपको उनकी सामर्थ्य और ताकत का अंदाज़ा नहीं है।”
पादरी ने विनम्रतापूर्वक कहा
“मैंने स्पेन और इटली के इनक्विज़िशन के बारे में थोड़ा अध्ययन किया है। उनकी ताकत अपार होती है। वे केवल मुझ जैसे साधारण पादरी को ही नहीं, समय आने पर वायसराय जैसे बड़े-बड़े अधिकारियों को भी जेल में डाल सकते हैं। उनसे डरकर ही हमें काम करना पड़ेगा, पर मैं अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ सकता।”
वायसराय ने कहा
“लगता है, आपका किसी के साथ भी नहीं जम सकता। खुद मुझे भी आपके साथ तालमेल बिठाने में कठिनाई हो रही है। अब लग रहा है कि जिस जहाज़ से आप आए थे, उसी जहाज़ से आपको वापस भेज देना चाहिए था। आप एक काम कीजिए—आदोळशे गाँव में जाकर अपने तरीके से काम शुरू कीजिए। लेकिन मैं आपको चेतावनी देता हूँ, दूसरे के काम में आप दखलअंदाज़ी नहीं करेंगे।
“जो दुनिया को जीतने के लिए निकलता है, उसके पास न फुर्सत होती है, न सब्र। यहाँ तक कि उसे समय का भी ध्यान नहीं रहता।”
पादरी सिमॉव ने वायसराय को प्रणाम किया और वहाँ से चल पड़ा।
आदोळशे गाँव उसे बहुत भा गया।
पहाड़ की तलहटी में बसे इस गांव के एक तरफ पहाड़ और दूसरी ओर अग्नाशिनी नदी और चारों ओर हरी-भरी खेती पसरी हुई थी। सुबह पर्वतों के उस पार से सूर्यनारायण का उदय होता तो उसकी सुनहरी किरणें पूरे गाँव को अपनी रोशनी से भर देतीं। कहीं मंदिर में बजती घंटियों की आवाज़ सुनाई देती, तो कहीं मवेशियों के रंभाने का शोर और खेतों में काम करते किसानों की आवाज़ें और बच्चों की किलकारियाँ वातावरण में घुली रहतीं। लेकिन रात होते ही पूरा गाँव शांत होकर नींद के आगोश में चला जाता।
भाग–9
अब थोमस और अणु की अच्छी दोस्ती हो गई थी। थोमस ने उसके लिए तीन पत्थरों का एक चूल्हा बनाकर दिया और कुम्हार के पास जाकर मिट्टी के कुछ बर्तन भी ले आया था। रोज़ वह उसे दो मुट्ठी चावल मिलता था। अणु निचली बस्ती में जाकर पानी लाता और अपना खाना पकाता।
दोनों देर तक खूब बतियाते। यह देखकर पादरी सिमॉव पेरिस ने मन ही मन सोचा इन दोनों के बीच तो खून का रिश्ता है। धर्म बदलने से भला क्या होगा? हम सब इन लोगों का धर्म परिवर्तन कराने में ख़ामख़ा लगे हुए हैं। पानी पर लाठी मारने से पानी थोड़े ही अलग होता है। शायद हम बेकार में अपना समय और ऊर्जा नष्ट करने में लगे हैं। पर अगले ही क्षण उसे लगा कि इस तरह की बातें सोचकर वह अपने कर्तव्य के प्रति गद्दार बन रहा है। उसी क्षण इन विचारों को अपने दिमाग से निकालकर बाहर फेंक दिया और प्रण लिया ।
मैं अपने ईसाई धर्म को इस दुनिया का श्रेष्ठ धर्म बनाऊँगा। प्रेम की राह पर चलकर सबको यीशु के पास ले जाऊँगा।
भाग 10
भले ही पादरी सिमॉव की सुरक्षा के लिए एक सिपाही नियुक्त किया गया था, पर वह कभी भी उस सिपाही को अपने साथ लेकर नहीं जाता । वह गाँव में अकेला ही घूमता। धीरे-धीरे लोगों का उस पर विश्वास जमने लगा , पर पूरी तरह नहीं। कोई उसे अपने आँगन में आने नहीं देता । गाँव की सीमा पर जब वह प्रवचन करता, तब लोग दूर खड़े होकर सुनते, जैसे भजन-कीर्तन सुनने आए हों।
एक दिन जब वह रायगाळी गाँव के पास से गुजर रहा था, तब उसने देखा कि जंगल के किनारे एक बूढ़ा आदमी अपने पंद्रह साल के बेटे के साथ मिलकर एक मरे हुए ढोर की चमड़ी उतार रहा है। पादरी सिमॉव पास जाकर खड़ा हो गया। उन दोनों के हाथों में बड़े-बड़े छुरे थे। मांस काटकर अलग करके टोकरियों में भर दिया गया था। चमड़े का ढेर एक तरफ पड़ा था। दोनों का शरीर पसीने से तर होकर रक्त के छींटों से सना हुआ था । मांस की गंध से पास के पेड़ पर कुछ गिद्ध आकर बैठने लगे थे। पादरी उनके पास जाकर कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। पादरी को देखते ही दोनों अपना काम छोड़कर खड़े हो गए। बाजू में रखे मांस की ओर इशारा करके पादरी ने पूछा, “आप लोग ढोर का मांस खाते हैं क्या?”
संकोच से दोनों ने कहा, “हाँ, खाते हैं क्या ।”?
“आप लोग हिंदू नहीं हैं क्या?”
“नहीं। यहाँ तो केवल ब्राह्मण को ही हिंदू कहा जाता है। हम महार जाति के हैं। हम ढोर खाते हैं और बाँस के सूप-टोकरियाँ बनाने का काम करते हैं।”
“तो तुम्हारा धर्म कौन-सा है ?”
“धर्म-वर्म तो बड़ी जाति के लोगों का होता है, साहब। हम महार हैं। हम तो बस... भूत-पिशाच लग जाए तो उसे छुड़ाने के लिए भट्टजी के पास जाते हैं...”
“इसका मतलब आपका कोई धर्म नहीं है ?”
उसने अनमने भाव से कहा, “यह तो ब्राह्मणों से ही पूछना पड़ेगा।”
“तुम्हारे हाथ का खाना दूसरे लोग खाते हैं?”
“नहीं, नहीं। हम तो महार हैं।”
“इसका मतलब आप लोग इंसान नहीं हैं?”
“हमें पता नहीं, हम लोग क्या हैं?”
वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “बाकियों की तरह हमारे भी दो पैर और दो हाथ हैं, इसलिए हम इंसान हैं। पर हमारी परछाई भी किसी पर पड़ जाए तो वे गोबर के पानी का छिड़काव करके अपने बदन को शुद्ध करते हैं।”
“इसका मतलब आप लोग गोबर से भी हीन हुए?”
“कौन जाने?”
“आप लोग अपना धर्म और जाति छोड़कर किसी दूसरे धर्म में जाने के लिए तैयार हैं?”
वह कुछ देर अचरज में पड़ा रहा।
“साहब, आप क्या बोल रहे हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा। पर हम कहीं भी जाएँ, महार के महार ही रहेंगे ना ? कहते हैं, एक बार ईश्वर गोसाईं का रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर भीख माँगने आया था। तब हमारे पूर्वजों उन्हें टूटे हुए सींग भीख में दिए थे। तब ईश्वर ने श्राप दिया था ‘आज के बाद तुम्हारे दरवाजे पर कोई भीख माँगने नहीं आएगा और इन सींगों को पकड़कर तुम्हारी बिरादरी जीवन भर ढोर खींचेगी।’”
पादरी सिमॉव उसके करीब गया और पूछा, “महार के अलावा आज तक तुम्हें किसी दूसरी जाति के व्यक्ति ने छुआ है ?”
“नहीं। पर एक बार छत के लिए कुछ लकड़ियाँ लाने जंगल गया था। बोझा लेकर लौटते समय रास्ते में गलती से वीरू नायक को मैंने छु लिया, बाद में उसने मुझे डंडे से खूब पीटा और घर जाकर कम से कम बीस बार गोबर के पानी का छिड़काव करके नहाया था वो ।”
जैसे ही पादरी ने थोड़ा करीब गया और उसके कंधे पर हाथ रख दिया तो अगले ही पल वह आदमी घबराकर दूर जा खड़ा हुआ, मानो उसके शरीर पर बिच्छू ने डंक मार दिया हो। वह काँपते हुए बोला,
“नहीं, नहीं! मत छुओ हमें। आप तो गोरी चमड़ी वाले ब्राह्मण जैसे लगते हैं और हम... हम तो अपवित्र, पापी लोग हैं। कहते हैं, जो भी हमें छूता है, उसका पाप हमें ही लग जाता है। हमे पाप में मत डालो।”
मरे हुए ढोर के कटे सिर के सामने वे दोनों बाप-बेटे लाचार और बहिष्कृत-से खड़े थे। ऊपर पेड़ पर गिद्धों का झुंड जमा होने लगा था। यह सब देखकर पादरी सिमॉव बेचैन हो उठा। कुछ देर वह स्तब्ध होकर वहाँ खड़ा रहा।
इतने में अणु वहाँ आ पहुँचा।
“पादरी बाबा, मैं तुम्हें ही ढूँढ़ रहा था। रामू कुम्हार ने बताया कि आप इस ओर आए हैं।”
“मुझे क्यों ढूँढ़ रहा था तू ?”
“ऐसी कोई खास बात नहीं। बहुत देर तक आप कहीं दिखाई नहीं दिए ना, इसलिए...”
पादरी हँस पड़ा। फिर उसने अणु की ओर देखकर पूछा, “अणु, तुम इन दोनों को छू सकते हो ?”
अणु एकदम सकपका गया। उसने सिर हिलाकर मना कर दिया।
“ अणु क्यों नहीं छुना चाहते हो तुम उन्हें ?”
“इन लोगों को कोई नहीं छूता। अगर छुओगे तो भ्रष्ट हो जाओगे, ऐसा कहते हैं।”
“मतलब क्या होगा ? शरीर गल जाएगा ? या शरीर पर जख्म हो जाएँगे ?”
“यह सब पता नहीं, पादरी बाबा। पर लोग उनकी परछाई तक नहीं छूते। इसलिए मुझे भी इन्हें नहीं छूना है।”
“क्या तुम बैलों और भैंसों को छूते हो ?”
“हाँ।”
“मेंढक को छूते हो ?”
“हाँ जी।”
“तो इन्हें क्यों नहीं छू सकते ?”
अणु ने झिझकते हुए कहा, “यह तो भट्टजी से पूछना पड़ेगा।”
पादरी अणु के जवाब से क्रोधित हो उठा।
“दुष्ट मनुष्य! जंगली लोग हो तुम! ऐसे धर्म का क्या मतलब है ? जहां एक इंसान दूसरे इंसान को केवल इसलिए नहीं छूना चाहता क्योंकि वह नीची जाति का है। यह कैसी विडंबना है, कैसा अधर्म है! तुम सबको ईसाई करके छोड़ना चाहिए, नहीं तो किसी समुद्र में डुबोकर मार डालना चाहिए।”
,अणु मुँह लटकाए चूप खड़ा रहा।
पादरी जब खेती के बीच से चलने लगा तो अणु भी उसके पीछे-पीछे चलने लगा। पूरे रास्ते पादरी सोचता रहा—ये लोग मनुष्य होकर भी मनुष्य नहीं हैं! एक बात उसे बार-बार खटक रही थी कि ये लोग हर बात पर भट्टजी या जोशी की सलाह लेने की बात करते हैं। आदिमानव की तरह मनुष्य होकर भी मनुष्य नहीं! ऊँची जाति की परछाई से भी डरकर दूर भागने वाले ये दो पैरों पर खड़े मनुष्य...। वह आश्चर्य में पड़ गया। कैसा धर्म है, जहाँ एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को हीन समझता है ?
पादरी ने सोचा कि आज हरिहर जोशी से मिलना उचित रहेगा क्यों कि हरियर जोशी से उसे बहुत कुछ पूछना था । वह उसके घर की ओर चल पड़ा। नायकों की खेती के बाजू में एक टीले पर ही हरिहर जोशी का घर था।
पादरी को आदोळशे गाँव में आए दो महीने बीत चुके थे। इन दो महीनों में उसने बहुत कुछ देखा-परखा था। आठ दिन पहले सती प्रथा के नाम पर एक औरत को जिंदा जला दिया गया था। उस मामले के बारे में भी उसे जोशी से पूछताछ करनी थी।
जोशी के घर जाने के रास्ते में एक छोटा-सा बगीचा पड़ता था। वहाँ शिरवाड़ी के नायक मिलकर निळु नायक के कुएँ के तले में चौक बैठाने के लिए जामुन का पेड़ काट रहे थे।
उन्होंने जैसे ही अणु को पादरी के साथ देखा, वे आग-बबूला हो उठे। अणु का बस्ती छोड़कर इन ईसाइयों के साथ घूमने और उनके हाथ का खाना खाने की बात से वे पहले ही नाराज थे। अणु को पादरी के साथ देखते ही वे हाथ में जो मिला, वही लेकर उसे मारने के लिए दौड़ पड़े।
शिव नायक चिल्लाया, “हरामखोर! जाति भ्रष्ट करके परधर्मियों के साथ घूम रहा है। हमारी जाति और कुल को कलंकित किया है तुमने!”
बाबली नायक ने हाथ में पकड़ा डंडा जमीन पर पटकते हुए कहा, “इसका बाप साक्षात भगवान था और यह पापी-दुष्ट अपने लंगड़े भाई को अकेला छोड़कर इन गोरों के साथ भाग गया। अब तो गाय का मांस भी खाता होगा यह!”
म्हाळू नायक आगे आया और कहने लगा, “इसको तो डंडे मार-मारकर मौत के घाट उतार देना चाहिए।”
इतना कहते ही उसने हाथ में पकड़ा जामुन का डंडा अणु की पीठ पर दे मारा।
पादरी बीच-बचाव के लिए आगे आया।
“आप इस तरह इसे मार नहीं सकते। यहाँ पुर्तगाली राजा की कानून-व्यवस्था चलती है। चाहें तो आप इसे वापस अपने साथ ले जा सकते हैं। वैसे भी अभी तक इसका बाप्तिस्मा नहीं हुआ है।”
उनमें से एक ने कहा, “इतने दिनों से यह आपके साथ रह रहा है, आपके साथ खाना खाया है। इसलिए अब हमने इसे अपने धर्म से निकाल दिया है।”
पादरी सोच में पड़ गया—इन लोगों के सिर पर यह जो छुआछूत का भूत सवार है उसे कैसे निकाला जाए ?
उसने क्रोधित होकर कहा, “अगर आप में से किसी ने भी इसे हाथ लगाया या इसे एक खरोंच भी आई, तो इसका नतीजा बहुत बुरा होगा। कल गोरे की फौज यहाँ गाँव में आएगी और तुम सबको हथकड़ियाँ डालकर ले जाएगी। फिर भी अगर तुम इसे मारने के लिए आगे बढ़े तो सबसे पहले तुम्हें मेरा सामना करना पड़ेगा।”
“ऐसा सुनते ही” वे सब थोड़ा पीछे हट गए और हाथों में पकड़े डंडे जमीन पर फेंक दिए।
पादरी और अणु वहाँ से चल पड़े।
इस समय पादरी खुद को दुर्बल और असहाय महसूस कर रहा था। उसे पता था कि इस लड़ाई में जीतना मुश्किल है। इस दुनिया में चारों ओर अन्याय ही अन्याय है। पता नहीं, इस दुनिया का क्या होगा !
,जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करना, फिर धर्म का ठीक-ठाक पालन न करने पर लोगों पर अत्याचार और अनाचार करनके, उन्हें तहखानों में बंद करके समय आने पर जिंदा जला देना… मैं पहले सोचता था कि यीशु मसीहा के बताए प्रेम के मार्ग पर चलकर मैं सबके दुख-दारिद्र दूर कर सकता हूँ। पर ये लोग तो यीशु मसीहा के नाम पर भी बल का प्रयोग कर रहे हैं।
‘हे ईश्वर! उन सबको सद्बुद्धि दो। उनके हाथों से तलवार छीनकर केवल प्रेम और करुणा का क्रॉस उनके हाथों में थमा दो।’
ओसारे पर एक बक्सा रखकर जोशी आसन जमाए बैठा आँगन में खड़े आदमी को डाँटते हुए कह रहा था,
“अरे अरे , आँगन के अंदर मत आओ। जो कहना है, दूर से ही कहो।”
उस आदमी ने डरते-डरते कहा, “शाम तक तो कुछ भी नहीं था, पर सुबह उठकर देखा तो घर के मुख्य द्वार के ऊपर मधुमक्खियों का एक बड़ा-सा छत्ता लटक रहा था। यह देखकर मैं घबरा गया। आस-पड़ोस वाले कहने लगे कि यह बहुत बड़ा अपशकुन है। इस तरह मधुमक्खियों का छत्ता घर के ऊपर लटकना घर के किसी बुजुर्ग की मौत का संकेत होता है।”
जोशी ने अपने सामने रखे बक्से पर कुछ चावल डाले और मंत्रों का उच्चारण करते हुए उन चावलों पर हाथ फेरने लगा। इसके बाद उसने उन चावलों के तीन बराबर भाग किए और तीन अलग-अलग पुड़ियों में बाँधकर दूर से ही उस आदमी के हाथ में फेंककर कहा ।
“ये चावल घर के चारों तरफ और छत पर फेंक दो। सारा शकुन-अपशकुन दूर हो जाएगा। और हाँ, वह सामने वाला नारियल का पेड़ देख रहे हो ना? उस पर नारियल सूख गए हैं। किसी के सिर पर गिर गए तो सिर फूट जाएगा। जरा ऊपर चढ़कर उन्हें निकालकर फेंक दो।”
“मुझे नारियल के पेड़ पर चढ़ना नहीं आता।”
“तो ऐसा कर—पीछे झोपड़ी में कुल्हाड़ी रखी है और वहीं एक बड़ा-सा लकड़ी का लट्ठा पड़ा है। उसे फोड़कर जलावन के लिए लकड़ियाँ बना जा।”
वह व्यक्ति घर के पिछवाड़े जाकर लकड़ियाँ फोड़ने लगा।
पादरी सिमॉव को आते देख जोशी की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उसने पादरी को बैठने का इशारा किया। वही अणु कुछ दूरी पर खड़ा रहा।
जोशी ने तीखे लहजे में कहा, “मैं देख रहा हूँ कि किस तरह तुम यहाँ के लोगों को बहलाने-फुसलाने के लिए गाँव-भर घूमते रहते हो। पर इससे कुछ नहीं होगा। कोई अनाड़ी ही तुम्हारे जाल में फँसेगा, इससे अधिक कुछ नहीं होगा।”
पादरी चुपचाप बैठा रहा।
जोशी ने पूछा, “अब यहाँ मेरे पास क्यों आए हो?”
“एक बात बताओ। यहाँ एक इंसान दूसरे इंसान को छूने से क्यों डरता है? आप लोगों के लिए गाय का गोबर और मूत्र पवित्र है, पर छोटी जातियों के लोगों की परछाई तक को आप अपवित्र मानते हैं। यह सब क्या है?”
जोशी भड़क उठा।
“तुम गाय के विषय में एक शब्द भी मत बोलो। गाय के पेट में हमारे तैंतीस करोड़ देवता वास करते हैं। उसका गोबर-मूत्र सब भगवान का ही अंश है।”
“मनुष्य भी भगवान का ही अंश है। तुम्हारा धर्म इस बात को मानता है ना?”
“सामान्य मनुष्य नहीं। केवल ब्राह्मण। ब्राह्मणों का जन्म ब्रह्मा के मस्तक से हुआ है और बाकी निचली जातियों के लोग ब्रह्मा के पेट, बाँह और पैरों से जन्मे हैं। समझे तुम ?”
“अगर ऐसा है तो ब्राह्मण को दूसरों की अपेक्षा कम-से-कम एक इंद्रिय तो अधिक होनी चाहिए थी ना? पर ऐसा नहीं है। हाथ-पैर से तो सब मनुष्य एक जैसे हैं।”
“एक इंद्रिय अधिक है।”
“कौन-सी?”
“ बुद्धि।”
“वह तो अन्य लोगों के पास भी है।”
“बाकियों के पास बुद्धि है, पर बैल-बुद्धि है।”
पादरी को समझ में आया कि यह ब्राह्मण बुद्धि से बहुत चालाक है। इसलिए वह कुछ देर के लिए खामोश रहा।
संत पावलु कॉलेज में जब वह पढ़ रहा था, उस समय उसने हिंदू धर्म के विषय में बहुत-सी जानकारी जुटा रखी थी। उसे यह भी पढ़ाया गया था कि हिंदुओं का महाकाव्य ‘रामायण’ एक शूद्र जाति में जन्मे वाल्मीकि ने लिखा था और ‘महाभारत’ नीचली जाति के व्यास नाम के व्यक्ति ने लिखा था,,
व्यास की माता मछुआरे की पुत्री थीं और भगवद्गीता कृष्ण ने रणभूमि में सुनाई थी, और वे स्वयं क्षत्रिय थे। अब जोशी के क्रोध का पारा चढ़ गया था।
“झूठ! सफेद झूठ! रामायण और महाभारत किसी एक दिन, किसी एक व्यक्ति द्वारा लिखी गई रचनाएँ नहीं हैं। सैकड़ों विद्वानों ने हजारों वर्ष लगाकर निर्माण किया है। भगवद्गीता में हिंदू धर्म का पूरा सार है और उसमें जो कुछ कहा गया है, वह सब ब्राह्मणों का ही है। केवल उसे युद्धभूमि में कृष्ण के मुख से कहलवाया गया है।
देववाणी संस्कृत केवल हमें ही आती है। हम ही ज्ञान के महामेरु हैं। हम ही वेदों और उपनिषदों के रचयिता हैं। हमारे पास मंत्र हैं, महामंत्र हैं। और तो और, हम शाप देकर किसी को भी भस्म कर सकते हैं। हमारे यज्ञ से पापियों का नाश होता है। अकाल पड़ने पर वर्षा होती है, निःसंतान को संतान प्राप्त होती है, मृत पितरों को स्वर्ग में मोक्ष मिलता है। ब्रह्मा और ब्राह्मण अद्वैत हैं और ब्रह्महत्या महापाप है।”
बोलते-बोलते उसकी आवाज और तेज हो गई। क्रोध के कारण वह हाँफने लगा।
पादरी ने शांत स्वर में कहा, “मेरा एक महत्वपूर्ण सवाल है—मनुष्य, मनुष्य को क्यों नहीं छूता है ? ”
जोशी के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था।
“सात समंदर पार परदेश से आए तुम जंगली लोग आप लोगों को छूनै , यह तो एक प्रकार का अनाचार और अपवित्रता होगी। इस तरह के विचारों के फेर में पड़कर एक दिन मनुष्य अपनी ही जाति को खो देगा। वर्ण संकीर्णता बढ़ जाएगी। फिर समाज तितर-बितर होकर रसातल में चला जाएगा। वर्ण संकीर्णता के कारण यदि कल ब्राह्मण जाति नष्ट हो गई, तो चारों ओर पाप मच जाएगा। पापियों का राज आएगा, भूकंप होंगे, प्रलय आएगा। हम लोग ईश्वर की पूजा-अर्चना और यज्ञ करते हैं, इसीलिए तो दुनिया टिकी हुई है। भगवान केवल ब्राह्मणों की ही बात सुनता है।”
पादरी ने शांत भाव से उसकी ओर देखते हुए कहा, “अगर आप ऐसा कहते रहेंगे, तो कल हिंदू धर्म में जो निचली जातियों के लोग हैं, वे किसी दूसरे धर्म को स्वीकार कर लेंगे। तब आप लोगों को यह मान्य होगा?”
पादरी ने बीच में ही बात कांटते हुए कहा जोशी ने कहा “ यदि किसी दूसरे धर्म में वे जाना चाहते हैं तो जाने दो मैं तो समझुगा चांडालों की संख्या कम हो गई , और इससे कुछ नहीं बिगड़ेगा बल्कि मैं तो कहूँगा कि हिंदू धर्म धो-पोंछकर और भी पवित्र हो जाएगा।”
“सच कहूँ तो आप लोगों को हमारा धन्यवाद करना चाहिए। हम यहाँ यीशु की सीख लेकर आए हैं। यहाँ के लोग यीशु के ईसाई धर्म को स्वीकार करें, यही हमारी इच्छा है।”
अब जोशी क्रोध में भड़क उठा। उसने अपनी आवाज ऊँची करते हुए कहा, “आप जैसे कितने ही धर्मगुरु यहाँ आकर चले गए। जैन और बौद्ध धर्म की बड़ी-से-बड़ी लहरें भी यहाँ टिक नहीं सकीं। एक दिन आप लोगों को भी मुँह काला करके यहाँ से भागना पड़ेगा।
पादरी ने कहा वह सब जाने दीजिए। आपको एक बात की खबर तो लगी होगी? हमारे बहुत-से लोग तलवार की नोक पर हिन्दुओं को जबरन ईसाई धर्म स्वीकार करवाने के लिए बांध्य कर रहे है और यह काम अब शुरू भी हो चुका है। उनके विरुद्ध तुम क्या करोगे ?”
आंखें तरेरते हुए जोशी बोला, “हमारे भगवान की दैवी-शक्ति के बारे में आप लोग अनजान हैं। हमारे धर्म की ओर आँख उठाकर भी देखोगे, तो तुम सबकी लाशें यहाँ बिछ जाएँगी। अब तक हमें काशी से ब्राह्मण बुलाकर महाचंडी यज्ञ करवा देना चाहिए था; तुम सबका सर्वनाश हो जाता। हमारे भगवान ही तुम्हारा हिसाब करेंगे।”
इस पर पादरी हँसा और बोला, “कल को जब हमारे लोग तुम्हारे धर्म और भगवान पर प्रहार करने के लिए हाथों में तलवार लेकर आएँगे, तब क्या तुम लोग उन्हें रोक सकोगे? उन्हें रोकने के लिए हाथ में डंडा उठाओगे?”
“हम नहीं, हमारा भगवान उन्हें रोकेगा। जो भी हमारे धर्म पर प्रहार करेगा, हमारा भगवान उसके हाथ-पैर तोड़कर उसे वहीं पर अपाहिज करके छोड़ेगा ।”
यह सब सुनकर पादरी कुछ क्षण के लिए हक्का-बक्का रह गया। फिर उसने कहा, “दस-बारह दिन पहले सती-प्रथा के नाम पर एक स्त्री को आग में जलाकर मार दिया गया। यह देखकर मेरा मन बहुत दुखी हुआ। क्या आपका धर्म ऐसे कार्य को सहमति देता है? क्या आप इसे अपराध नहीं मानते?”
जोशी की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उसने तीखे स्वर में कहा, “आप गलत कह रहे हैं। बोलने के पहले थोड़ा सोच-विचार कर लीजिए । हम लोग उन्हें आग में नहीं धकेलते। वे स्वयं अपनी इच्छा से पति की मृत्यु के उपरांत उसकी चिता पर चढ़ जाती हैं। सच तो यह है कि उनके पूर्वजन्मों के पापों के कारण उनके पति की मृत्यु होती है और वे स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं। उन्हें जीने का कोई अधिकार नहीं होता; इसलिए वे पति की चिता पर चढ़कर अपने पापों का प्रायश्चित करती हैं। उनका जीवित रहना समाज और परिवार के लिए भार के समान समझा जाता है। और एक बात की जानकारी आपको देना चाहता हूँ सती की परंपरा केवल क्षत्रियों में है , हम ब्राह्मणों में विधवा स्त्रियों का श्रृंगार उतारकर उनके केशों का मुंडन कर दिया जाता है और उन्हें संसार की सभी मोह-माया से दूर रखा जाता है। वे अपने विधवा-धर्म का स्वेच्छा से पालन करती हैं और अपना पूरा जीवन ईश्वर की पूजा-पाठ में लगा देती हैं। आप लोगों की तरह हमारे यहाँ विधवा स्त्रियों को खुला छोड़कर उन्हें समाज की अधोगति का कारण नहीं बनने दिया जाता।”
पादरी वहाँ से जाने के लिए उठे तो जाते-जाते उन्होंने कहा,
“आप लोगों का धर्म के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम इसी तरह बना रहे।”
जोशी को लगा कि उसने तर्क-वितर्क में पादरी को परास्त कर दिया है। उसके मुख पर विजय का संतोष उमड़ आया। किंतु जोशी के घर से लौटते समय पादरी की चाल सहसा धीमी पड़ गई। मन में जैसे कोई उत्साह शेष ही न रहा था। जोशी की अधिकांश बातें उन्होंने स्वीकार की थीं, किंतु उसका सती-प्रथा का समर्थन करना पादरी के मन को भीतर तक आहत कर गया था।
दस दिन पूर्व ही उसने अपनी आँखों के सामने एक स्त्री को उसके पति की चिता में धकेलते हुए देखा था। उस अबला की हृदय-विदारक चीखें आज भी उसके कानों में गूँज रही थीं। उस घटना को स्मरण करते ही उसका शरीर आज भी सिहर उठता था। उस दिन प्रातःकाल वह अपनी दहलीज पर खड़ा था। वहाँ से पहाड़ की तलहटी में बसा सती चौक स्पष्ट दिखाई देता था। जामुन, आम, इमली और न जाने कितने प्रकार के विशाल वृक्षों के बीच सात-आठ सती-शिलाएँ भी स्थापित थीं। वृक्षों की घनी छाया में खड़ी वे शिलाएँ दूर से ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो किसी बीते युग की भयावह स्मृतियाँ भूतों की भाँति वहाँ पहरा दे रही हों। उस दिन सुबह से कुछ लोग चुपचाप बचाकर वहाँ इधर-उधर चहलकदमी करते दिखाई दे रहे थे। सती चौक में स्थापित उन शिलाओं के विषय में जानने की जिज्ञासा पादरी सिमॉव को पहले से ही थी। किंतु आज वहाँ लोगों की इस गुप्त गतिविधि को देखकर उसके मन में संदेह और गहरा गया। उसे प्रतीत हुआ कि अवश्य ही वहाँ कुछ होने वाला है। सती-प्रथा के विषय में उसने पहले भी बहुत कुछ सुन रखा था। अब तो यह भी समाचार था कि वायसराय कोंस्तान्तीन ब्रागांझा शीघ्र ही इस प्रथा के विरुद्ध कठोर कानून लागू करने वाले हैं।
आदोळशे गाँव के नायक स्वयं को क्षत्रिय मानते थे। किंतु उनमें सती-प्रथा का चलन नहीं था। पहाड़ की दक्षिण दिशा में रहने वाले सोळखीयों में यह प्रथा प्रचलित थी। एक समय था ये लोग कमर में तलवार बाँधते और सिर पर पगड़ी धारण करते थे। अब उनकी तलवारें और पगड़ियाँ घर की खूँटियों पर टँगी पड़ी है , पर क्षत्रिय होने का रोब अब भी उनके स्वभाव में बना हुआ था। उन्हें लच्छेदार मूँछें रखने का और ढोल बजाने का शौक था । बैलगाड़ियों के पहिए बनाकर कभी कालापुर, कभी आगशी और कभी गोवा-पाटण जाकर बेच आते। उनके पास अपनी जमीन अधिक न थी। वर्षा ऋतु में वे जमींदारों से बटाई पर खेत लेकर अन्न उपजाते थे। शिरवाड़ी के नायकों के साथ उनका रोटी-बेटी का व्यवहार था, किंतु नायकों में सती-प्रथा का प्रचलन न होने के कारण सोळखी उन्हें अपने से कमतर समझते । यहाँ तक कि नायकों की विधवा स्त्रियों को वे अपशकुनी और डायन तक कह डालते थे ।
सती चौक में वृक्षों के नीचे लोगों की चहल-पहल अब बढ़ गई थी। खुरपी और कुदाल से मिट्टी खोदने की खप-खप ध्वनि सुनाई देने लगी। पादरी अपनी झोंपड़ी से निकलकर उस ओर आया और पेड़ों के झुरमुट के पीछे छिपकर खड़ा हो गया। उसने देखा उन लोगों ने कमर-भर गहरा गड्ढा खोदकर उसमें सूखी लकड़ियाँ डालकर चिता सजाई । वे सब वृक्ष के नीचे बैठकर प्रतीक्षा कर रहे थे। इतने में कुछ दूर से ढोल पीटने की आवाज सुनाई दी। पादरी ने गर्दन उठाकर उस ओर देखा। कुछ लोग कंधे पर अर्थी उठाए चले आ रहे थे। अर्थी के पीछे सफेद साड़ी पहने एक स्त्री चली आ रही थी।
स्त्री क्या वह तो कोई पंद्रह-सोलह वर्ष की बालिका थी! रोते-रोते उसकी आँखें सूजकर लाल हो गई थीं। फिर भी आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसके कदम इस प्रकार लड़खड़ा रहे थे, मानो उसे कोई मादक औषधि पिला दी गई हो और वह अर्धचेतना की अवस्था में चल रही हो। उस समूह में कुछ और स्त्रियाँ भी थीं। वे सती चौक की सीमा पर पहुँचकर कुछ दूर रुक गईं। फिर वे जोर-जोर से छाती पीटकर विलाप करने लगीं। सफेद साड़ी पहने उस बालिका को अंतिम बार प्रणाम करके वे वहीं से लौट गईं।
ढोल और ताशे की गड़गड़ाहट के साथ अर्थी को उस खोदे हुए गड्ढे के पास रखकर वे सब कहने लगे “हे प्रभु! इनके जीवन की यात्रा यहीं तक थी, अब वे इस संसार से विदा हुए।”
उस स्त्री को एक पत्थर बिठाया और अर्थी पर से शव उतारकर चिता पर रख दिया गया। एक छोटा-सा लड़का कंधे पर मिट्टी का घड़ा और जलते हुए उपले लेकर आया था। वह भी हिचकियाँ लेकर रोए जा रहा था। बीच-बीच में वह सहमकर वहाँ खड़े लोगों से पूछता “आप लोगों ने भाभी को यहाँ क्यों लाया है ?” वह मृत व्यक्ति का छोटा भाई था और वही मुखाग्नि देने वाला था। उसके कंधे पर बुजुर्गों ने पानी से भरा घड़ा रख दिया और पीछे से गडा़सा मारकर उसमें छेद कर दिया। उस घड़े से पानी की धार बह रही थी उसे लेकर उस लड़के ने सफेद वस्त्र पहने पत्थर पर बैठी स्त्री और चिता के चारों ओर तीन बार चक्कर लगा दिए । बाद में उसने मटका जमीन पर मारकर फोड़ दिया।
अब ढोल-नगाड़े फिर से बजने लगे।
सती जाने वाली उस स्त्री को गड्ढे के पास एक पत्थर पर खड़ा कर दिया गया। वह जोर-जोर से रो रही थी । लाचार, असहाय-सी उस पत्थर पर खड़े रहने का प्रयत्न करती, पर बार-बार उसका संतुलन बिगड़ जाता।
पादरी सिमॉव को उस स्त्री को देखकर पूरा विश्वास हो गया कि इन लोगों ने उसे बेहोश करने के लिए अवश्य कुछ न कुछ खिलाया है। पादरी कुछ भी सोच नहीं पा रहा था। उन लोगों के पास जाने का साहस उसमें नहीं था। वह मूरत की भाँति एक ही स्थान पर निःशब्द खड़ा रहा ।
वह औरत गड्ढे में डालें पति की लाश की ओर देखने के लिए भी तैयार नहीं थी । दिन चढ़ आया था, पर फिर भी सिर के ऊपर फैले कदंब वृक्ष के पत्तों से अँधेरा झड़ रहा था। ढोल-नगाड़ों की आवाज के बिच जीती-जागती औरत बिलख-बिलखकर व्याकुल होकर रो रही थी, तो दूसरी ओर गड्ढे में लाश पड़ी थी। सारा दृश्य मानो किसी भयावह स्वप्न जैसा प्रतीत हो रहा था। उनमें से एक आदमी ने चिता पर तेल उड़ेल दिया। उस लड़के ने नारियल के पत्तों की मशाल उपलों से जलाई और चिता को अग्नि दे दी। एक वयस्क आदमी पत्थर पर खड़ी उस औरत के पास गया और ढोल-नगाड़ों की आवाज को चीरता हुआ जोर से बोला
“सुहागन! मरोगी तो स्वर्ग के द्वार तुम्हारे लिए खुल जाएँगे। पति की चिता पर चढ़ोगी तो तुम्हारे सारे पाप अग्नि में जलकर भस्म हो जाएँगे। तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी और हर जन्म में यही पति तुम्हें मिलेगा।
तुम देवी के स्थान पर विराजोगी।
तुम अखंड सौभाग्यवती कहलाओगी।
तुम पतिव्रता कहलाओगी ।
डरो मत! पीछे मत हटो। खुशी-खुशी पति की चिता पर चढ़कर अग्नि को स्वीकार करो।” चिता की लपटें जब उसके पैरों तक पहुँच गईं , तो वो पीछे हटने लगी। उसी समय उस बुजुर्ग आदमी ने पीछे से उसके दोनों कंधों पर हाथ रखकर उसे जोर से धक्का दिया और आग में धकेल दिया। पीछे खड़े सभी लोग “हर-हर महादेव!” का जयघोष करने लगे। ढोल-नगाड़े जोर-जोर से बजने लगे। वो औरत चिता पर से जोर-जोर से चीख रही थी। ढोल नगाड़े के कान फाड़ देने वाले शोर के बीच उसकी चीखें दबती जा रही थीं। उसने आग से बाहर कूदने का प्रयास किया, लेकिन लड़खड़ाकर गड्ढे के किनारे जा टकराई। हाथ में लंबा डंडा लिए वहीं एक आदमी खड़ा था उसने फिर से उस औरत को आग में धकेल दिया। उसकी चीखें लगातार जारी थीं।
पादरी सिमॉव से अब रहा नहीं गया। वह चिता की ओर दौड़ा और चिल्लाकर बोला—
“ ईश्वर तुम सभी को नरक में डाल देगा! ये सब क्या कर रहे हो तुम ?
पादरी उस औरत को आग से बाहर खींचना चाहता था, पर तभी चार-पाँच पुरुषों ने उसे पकड़कर जमीन पर पटक दिया। उनमें से एक ने उसे डंडे से मारा और गरजकर कहा—
“यह पादरी यहां हमारे दाह-संस्कार की विधि को भ्रष्ट करने के लिए आया है। हम क्षत्रिय परंपरा के लोग हैं। अभी के अभी यहाँ से निकल जाओ!”
पादरी सिमॉव को चिता की ओर देखने का साहस नहीं हुआ। वह उठकर चुपचाप चलने लगा। धीरे-धीरे उस औरत की चीखें धीमी पड़ती गईं और अंततः रात के सन्नाटे में विलीन होती चली गईं।
पादरी लड़खड़ाते कदमों से अपनी कुटिया के पास आ पहुँचा। दरवाजे पर खड़े होकर उसने पीछे मुड़कर देखा। ढोल-नगाड़ों की आवाज अब धीमी हो गई थी। सती-चौक पर एक भयानक सन्नाटा पसरा था। चिता की लपटें शांत हो चुकी थीं। अब केवल राख धधक रही थीं और इंसान के जलने की गंध उसमें समाई थी , उस धुएँ ने जैसे सूर्य के उजाले को भी निगल लिया था।