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मेरा गाँव

मेरा गाँव अब गाँव कम,
खंडहर अधिक नज़र आने लगा है;
हर दूसरे घर ने नींव को नंगा कर दिया है।

​खिड़कियाँ अंदर से बंद हैं,
पर समय ने उन्हें बाहर से खोल दिया है;
दरवाज़े पर ताला किसी
बूढ़े के हाथ में लाठी की तरह पड़ा है।

​बचपन में जो घर मुझे
विशालकाय लगते थे,
अब मानो मरणासन्न हालत में
किसी अस्पताल के बिस्तर पर पड़े
मरीज की तरह सिमट गए हैं।

​जिस कुएँ में एक साथ
कई गगरियाँ नृत्य करती थीं,
वह कुआँ आज मकड़ियों के जाल
और कँटीली झाड़ियों के बीच,
किसी की टोह के लिए प्यासा है।

​छोटी-छोटी पगडंडियों को
न जाने कौन निगल गया,
बिना कोई निशान छोड़े

​नाग देवता का कच्चा पत्थर
अब पक्का बन गया है,
पर पक्का बनने पर भी
वह वीरान और उजड़ा क्यों नज़र आ रहा है ?

​जो घर गिरकर मिट्टी हो चुके हैं,
उन घरों की बुनियाद पर पड़े
सिलबट्टे और टूटी तुलसी ने
उनके 'घर' होने के संकेत आज भी बरकरार रखे हैं।

​एक गाँव को खंडहर बनाकर हम,
फिर से एक और खंडहर बनाने की
यात्रा पर निरंतर चल रहे हैं।

टिप्पणियाँ

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 05 मई, 2026
    को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
      

    जवाब देंहटाएं
  2. कमोवेश हमारे उत्तराखंड में पलायन ने ऐसा ही ज़ख्म दिए हैं,,,जब भी गांव जाओ तो निराशा ही हाथ लगती है,,

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खूब! गाँव छोडकर अब लोग रोजी -रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं ..

    जवाब देंहटाएं
  4. मर्मस्पर्शी रचना है यह आपकी सरिता जी

    जवाब देंहटाएं
  5. बिल्कुल सर हर जगह यही स्थिति है

    जवाब देंहटाएं

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दु:ख

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