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मेरा गाँव

मेरा गाँव अब गाँव कम,
खंडहर अधिक नज़र आने लगा है;
हर दूसरे घर ने नींव को नंगा कर दिया है।

​खिड़कियाँ अंदर से बंद हैं,
पर समय ने उन्हें बाहर से खोल दिया है;
दरवाज़े पर ताला किसी
बूढ़े के हाथ में लाठी की तरह पड़ा है।

​बचपन में जो घर मुझे
विशालकाय लगते थे,
अब मानो मरणासन्न हालत में
किसी अस्पताल के बिस्तर पर पड़े
मरीज की तरह सिमट गए हैं।

​जिस कुएँ में एक साथ
कई गगरियाँ नृत्य करती थीं,
वह कुआँ आज मकड़ियों के जाल
और कँटीली झाड़ियों के बीच,
किसी की टोह के लिए प्यासा है।

​छोटी-छोटी पगडंडियों को
न जाने कौन निगल गया,
बिना कोई निशान छोड़े

​नाग देवता का कच्चा पत्थर
अब पक्का बन गया है,
पर पक्का बनने पर भी
वह वीरान और उजड़ा क्यों नज़र आ रहा है ?

​जो घर गिरकर मिट्टी हो चुके हैं,
उन घरों की बुनियाद पर पड़े
सिलबट्टे और टूटी तुलसी ने
उनके 'घर' होने के संकेत आज भी बरकरार रखे हैं।

​एक गाँव को खंडहर बनाकर हम,
फिर से एक और खंडहर बनाने की
यात्रा पर निरंतर चल रहे हैं।

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