सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अकेली औरत

उसकी घर की दीवारों पर
खिड़कियाँ अब नहीं बची हैं

और जो है ,उसे वो खिड़कियाँ
इसलिए नहीं कहती है
क्यों कि वहाँ से वो जभी
बाहर की दुनिया में
देखने की कोशिश करती है
इसके पहले ही इन खिड़कियों पर
वो तमाम आंखें मौजूद रहती हैं
जिन्हें देखना होता है
अकेली औरत सच में अकेली रहती हैं
या फिर उसकी देह से
पर पुरुष की गंध आती हैं

या फिर उसके दरवाजे़ पर
ताला चढ़ाने का और
उतारने का समय कही बदला तो नहीं
अगर बदला भी है तो फिर क्यों बदला है ?

असमय खुलता हैं दरवाजा जभी
तब तब मोहल्ले की
दस खिड़कियां भी खुल जाती  हैं

और आज के समय में ज्यादातर
खिड़कियाँ भीतर से नहीं
बाहर से खुलती हैं

पर आने वाले समय में अकेली औरत
उसकी खिड़कीे पर जमा
अनायास प्रश्न चिन्हों की धूल
लापरवाही के अंदाज में झाड़कर
ऊँची तान में संगीत की धुन छेड़ देगीं
गली मोहल्ले की खिड़कियाँ
निरुतरता के साथ बंद होगी

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल