सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रतिक्षाएँ



प्रतिक्षाएँ  रेत की तरह 
फिसलती हैं 
आँखों में घड़ी की 
सुई की तरह चुंभती हैं 

घने बर्फबारी के बीच 
प्रतिक्षाओं के क्षण 
दावाग्नी के कण बन
तपिश पैदा करते हैं 

प्रतिक्षाएँ हथेलियों पर 
नमक की खेतीं करकें 
यादों की फसल कांटती हैं

प्रतिक्षाएँ अनादि काल से 
ओसरे पर बैठे बूढ़ी माई जैसी बनने पर 
उस जगह से उठने का 
संकेत देती हैं 

प्रतिक्षाएँ सफल रही तो 
अर्थ है नहीं व्यर्थ हैं

टिप्पणियाँ

  1. वाह!!!!
    प्रतिक्षाएँ सफल रही तो
    अर्थ है नहीं व्यर्थ हैं
    बहुत सुंदर सार्थक सृजन।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सपनो का मर जाना

सपनों का मर जाना वाकई बहुत खतरनाक होता है  वह भी ऐसे समय में  जब बडे़ मुश्किल से  तितली संभाल रही हैं  अपने रंगों का साम्राज्य निर्माण हो रहा है मुश्किल  से गर्भ में शिशु  और जद्दोजहद करके  नदी बना रही हैं  अपना रास्ता  बहुत कठिनाइयों से  वृक्ष बचा रहे हैं अपनी उम्र कुल्हाड़ियों के मालिकों से  वाकई समय बहुत खतरनाक हैं  जब केंचुए के पीठ पर  दांत उग रहे हैं  और ऐसे समय में  सपनों का मर जाना  समस्त सृष्टि का कालांतर में  धीरे-धीरे अपाहिज हो जाना है

युद्ध

युद्ध के ऐलान पर  किया जा रहा था  शहरों को खाली  लादा जा रहा था बारूद  तब एक औरत  दाल चावल और आटे को  नमक के बिना* बोरियों में बाँध रही थी  उसे मालूम था  आने वाले दिनों में  बहता हुआ आएगा नमक  और गिर जाएगा  खाली तश्तरी में   वह नहीं भूली अपने बेटे के पीठ पर  सभ्यता की राह दिखाने वाली बक्से को लादना  पर उसने इतिहास की  किताब निकाल रख दी अपने घर के खिड़की पर  एक बोतल पानी के साथ क्योंकि, यह वक्त पानी के सूख जाने का है..!

धर्म बनिए का तराजू बन गया है

सबके पास धर्म के नाम पर  हाथों में उस बनिये का तराजू हैं  जो अपने अनुसार तौलता  है  धर्म के असली दस्तावेज तो  उसी दिन अपनी जगह से खिसक गए थे जिस दिन स्वार्थ को अपना धर्म  बेईमानी को अपना कर्म  चालाकी को अपना कौशल समझकर इंसानियत के खाते में दर्ज किया था