सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हो जाओ तुम मुक्त

उस व्यवस्था से तुम 

हो जाओ मुक्त 

जो छाँव देने के भरोसे के बदले 

छीन लेती है तुम्हारी 

स्वनिर्मित आशियाने की छत


उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त 

जो तुम्हारी हथेली पर

खींच देती है एक रेखा 

भाग्य के सिदुंर की 

और छीन लेती है 

तुम्हारी अँगुलियों की ताकत 


उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त 

जो तुम्हारे कंधों पर रख देती है हाथ

जीवन भर साथ निभाने के 

आश्वासन के साथ 

और तोड़ देती है एक मजबूत हड्डी 

तुम्हारे बाजुओं की


उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त 

जो तुम्हारे ह्रदय के गर्भ गृह में

हो जाती है प्रेम से दाखिल 

और तुम बसा लेती हो

एकनिष्ठ एक ईश्वर की प्रतिमा 

जिस दिन 

तुम हठ करती हो

एक कतरा उजाले की

वो छीन लेती है 

तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ।


।।।।।

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही गहराई से उस व्यवस्था पर चोट है की है जो हमारी जिंदगी में दबे पांव कभी हमारी अनुमति और पसन्द कभी अनुमति और पसन्द के बिना दाखिल हो जाती है।
    सादर
    रचना दीक्षित

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जिस दिन

जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

क्षणिकाएं

१) अनगिनत वृक्ष दुनिया भर की अलमारियों में बैठे हैं मौन और दीमकें जता रही हैं उन पर अपना हक। २) संमदर में रोती हुई मछलीयां  सीप में रख देती हैं  अपने आंसूओं को  जो मोती बन चमकते हैं  धरती के गालों पर ३) हर पार्वती के हिस्से  नहीं होते शिव  फिर भी वो अर्द्धनारीश्वर के रूप में विचरती रहती है इस धरा पर ! ४) मैं तुम्हारे आंगन कि कृष्ण तुलसी बनकर  तुम्हारे ललाट पर स्थित  समस्त कठिन रेखाएं खींच कर  भस्म कर अपने देह के अंदर धर लूंगी ५) हम दोनों के प्रेम में स्थित अधूरापन तुम्हारे लौटने की परिभाषा है