अपने आलीशान महलों से उठकर
कभी महानगर भी गांव जाता
राह तकते आंगन में
कुछ पल सुस्ताता
जर्जर होते चौक पर
लगी किसी नेता की
प्रतिमा के सामने
सेल्फी खीचता
किताबों की दुकान में भी
काश अपनी हाज़िर दे आता
जहाँ बोया गया था
उसके मन में एक बीज
कविताओं के सृजन का
पर आलिशान
महलों से उठकर
अब कहाँ
महानगर गाँव जाता है
आंगन के नाम पर
उसके पास शानदार
बालकनी जो है
महानगरों के बढियां
रेस्टोरेंट के सामने
गाँव के स्टेशन पर
बैठे चायवाले की
चाय का स्वाद
फिका जो पड़ गया है
अब फैशन के नाम पर
अपने दोस्तों के पास
महानगर बस एक संदेशा
भेज देता है