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अपनी सहूलियत के हिसाब से

नजरअंदाज कर उन तमाम अपशब्दों को
जो आपके अच्छाई के बदले में
आपके हिस्से में आती हैं
लोक यहां अपनी सहूलियत के
हिसाब से आपके बारे में
अपना मत बदलते हैं

माना आसान नहीं होता
उस जगह से अपमान का घूंट पीकर
खामोशी से लौटना
जिस जगह की खुशहाली के लिए
मन्नतो की चिट्टियां ईश्वर के चरणों पर
अनगिनत बार आपने अर्पण की हो

अपने भीतर एक रक्त रंजित
घाव  समेटे रखना
थोड़ी सी हवा लगने पर
उतर सकते है अपनों के ही
चेहरे पर से मुखोटे
इसीलिए तो उसने जख्मों पर
ओढ़ रखी है लोहे की चद्दरें

यातनाएं देने वाले शहर का पता
अनजान बीहड़ में छोड़ आई है वो
जिसने उसकी संवेदनाओं का भोग किया
उसी ने आज उसे चौराहे पर खड़ा करके
असंवेदनशीलता का गहरा घाव दिया
दुनिया की उंगलियों को उसकी ओर मोड़ दिया
हे प्रियवर अपनी सहूलियत के लिए उसे
बता देना और कितने घावों का हिसाब बाकी है
ताकि वो इस संसार से विदा होने के पूर्व
तृप्त कर सकें तुम्हारी हर इच्छाओं को

टिप्पणियाँ

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(०७-०४ -२०२२ ) को
    'नेह का बिरुआ'(चर्चा अंक-४३९३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. नजरअंदाज कर उन तमाम अपशब्दों को
    जो आपके अच्छाई के बदले में
    आपके हिस्से में आती हैं
    लोक यहां अपनी सहूलियत के
    हिसाब से आपके बारे में
    अपना मत बदलते हैं
    बहुत ही तथ्यात्मक सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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क्षणिकाएं

1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है

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जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

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जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।