सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अपनी सहूलियत के हिसाब से

नजरअंदाज कर उन तमाम अपशब्दों को
जो आपके अच्छाई के बदले में
आपके हिस्से में आती हैं
लोक यहां अपनी सहूलियत के
हिसाब से आपके बारे में
अपना मत बदलते हैं

माना आसान नहीं होता
उस जगह से अपमान का घूंट पीकर
खामोशी से लौटना
जिस जगह की खुशहाली के लिए
मन्नतो की चिट्टियां ईश्वर के चरणों पर
अनगिनत बार आपने अर्पण की हो

अपने भीतर एक रक्त रंजित
घाव  समेटे रखना
थोड़ी सी हवा लगने पर
उतर सकते है अपनों के ही
चेहरे पर से मुखोटे
इसीलिए तो उसने जख्मों पर
ओढ़ रखी है लोहे की चद्दरें

यातनाएं देने वाले शहर का पता
अनजान बीहड़ में छोड़ आई है वो
जिसने उसकी संवेदनाओं का भोग किया
उसी ने आज उसे चौराहे पर खड़ा करके
असंवेदनशीलता का गहरा घाव दिया
दुनिया की उंगलियों को उसकी ओर मोड़ दिया
हे प्रियवर अपनी सहूलियत के लिए उसे
बता देना और कितने घावों का हिसाब बाकी है
ताकि वो इस संसार से विदा होने के पूर्व
तृप्त कर सकें तुम्हारी हर इच्छाओं को

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

मेरा गाँव

मेरा गाँव अब गाँव कम, खंडहर अधिक नज़र आने लगा है; हर दूसरे घर ने नींव को नंगा कर दिया है। ​खिड़कियाँ अंदर से बंद हैं, पर समय ने उन्हें बाहर से खोल दिया है; दरवाज़े पर ताला किसी बूढ़े के हाथ में लाठी की तरह पड़ा है। ​बचपन में जो घर मुझे विशालकाय लगते थे, अब मानो मरणासन्न हालत में किसी अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज की तरह सिमट गए हैं। ​जिस कुएँ में एक साथ कई गगरियाँ नृत्य करती थीं, वह कुआँ आज मकड़ियों के जाल और कँटीली झाड़ियों के बीच, किसी की टोह के लिए प्यासा है। ​छोटी-छोटी पगडंडियों को न जाने कौन निगल गया, बिना कोई निशान छोड़े । ​नाग देवता का कच्चा पत्थर अब पक्का बन गया है, पर पक्का बनने पर भी वह वीरान और उजड़ा क्यों नज़र आ रहा है ? ​जो घर गिरकर मिट्टी हो चुके हैं, उन घरों की बुनियाद पर पड़े सिलबट्टे और टूटी तुलसी ने उनके 'घर' होने के संकेत आज भी बरकरार रखे हैं। ​एक गाँव को खंडहर बनाकर हम, फिर से एक और खंडहर बनाने की यात्रा पर निरंतर चल रहे हैं।