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अंधियारे को भेदकर

बौना नजर आता है
समाज का हर वो बांशिदा
जो जिम्मेदारियों को
रख नेताओं के कंधे पर
केवल शब्दों के
बाण देता है छोड़
आओ
उठाओं जिम्मेदारी का
चादर
जो गिरा
विकास पर बनकर
कफन
धरा की आत्मा से
उर्जा का रस निकालो
उडेल दो आसमान पे
और लगा दो बांशिदों के
पीठ पर एक पंख
जिसकी उडान
अँधेरे को भेदकर
उजाला कर दे ।

कावेरी

टिप्पणियाँ

  1. सुंदर। अपना नाम क्यों बदलना। सरिता सैल के नाम से लिखिए।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद सराहना करने के लिए सर कावेरी मेरा जन्मनाम है सर

      हटाएं
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 21 अप्रैल 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं

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