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धर्म बनिए का तराजू बन गया है

सबके पास धर्म के नाम पर 
हाथों में उस बनिये का तराजू हैं 
जो अपने अनुसार तौलता  है 
धर्म के असली दस्तावेज तो 
उसी दिन अपनी जगह से
खिसक गए थे जिस दिन
स्वार्थ को अपना धर्म 
बेईमानी को अपना कर्म 
चालाकी को अपना कौशल समझकर
इंसानियत के खाते में दर्ज किया था

टिप्पणियाँ

  1. बहुत उम्दा, बस बनिए की रशीद की जगह तराजू कर लें तो बढ़िया है

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  2. जैसी आप की आज्ञा भाई धन्यवाद

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  3. वाह ! सीमित शब्दों में बङी बात !
    धारदार ।

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  4. सही कहा आपने... धर्म को लेकर ज़्यादतरों की सोच का सटीकता से चित्रण किया है...

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दु:ख

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