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क्षणिकाएं




एक था चांद एक थी तुलसी 
दोनों में प्रेम हुआ 
चांद ने बादलों की आड़ में बेवफाई की 
और मुंडेर पर बैठी तुलसी 
ओस की बूंदों की आड़ में रोती रही ।



कुछ हाथ मरहम लगाने के 
बहाने से आए तो थे पर 
जख्मों को मेरा पता देकर चले गए ।



बसंत ने तमाम रंग मेरे हिस्से कर दिए थे 
पर तुम्हारी बेवफाई का रंग इतना गहरा था कि सब रंग खामोशी से मेरी जीवन से उतर गए ।



दुनिया ने दिया दुःख 
मैंने तुमसे बांटा 
पर तुमने दिया दुःख 
मैं किसी से बांट नहीं सकती ।



धरा पर पड़ी
बिवाईयां संकेत हैं 
आसमान के रूठने की

टिप्पणियाँ

  1. कमाल की छोटी कविताएं
    बधाई

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  2. अच्छी क्षणिकाएं। चौथी क्षणिका की अंतिम पंक्ति में किसी से कर लीजिए किससे की बजाय। शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं

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