दिन 1
समाज ने उसी सीप में बसा
अंधेरा ही बहाल करना चाहा
पर वो हर बार मोती बन उभरती गई
उसके लिए तुम सब ने
बिना जल के कुएं की खुदाई की
पर वो वहां से भी सरिता बन बही
लोहे का घुंघट उसके माथे रख छोड़ा
उसी लोहे को पिघला कर
उसने भविष्य का रास्ता बना दिया
उसकी बेड़ियों को तो खोल दिया
उसके पंखों को बांध दिया
पर उसके मन की गति तुम जान न सके
हर युग में तुम ग़लत हिसाब कर गये
ये वही रमणि है
जो अपने सांस के भीतर
और एक सांस लेकर
चलने का सामर्थ्य रखती है