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नदी



सूरज के अस्त होने से 

छा जाता है

नदी के देह पर

एक सन्नाटा

मन में भर जाती

एक उदासीनता 

उसका अल्हडपन

ढूंढती रहती है

एक तलहटी

जिसकी गहराई मे

जा बैठती है वह 

मौन हो 

एक नई प्रतीक्षा की

नदी फिर जी उठती है

सूर्योदय के साथ

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ईश्वर

ईश्वर  इन दिनों बीहड़ में बैठकर पाषाण पर लिख रहा है दस्तावेज सृष्टि के पुनर्निर्माण का उसके पहले वो छूना चाहता है जंगली जानवर के हृदय में स्थित प्रेम जिसका वह भूखा है सदियों से उसने खाली कर दी तमाम बैठकें जहां पाप के कीचड़ में पुण्यबीज बोने की इच्छाएँ जमा हो गई हैं  दिमागों को अंतिम आशीर्वाद देकर वो वहाँ से उठ चला है नदियाँ बीहड़ की तरफ मुड़ी हैं सुना है ईश्वर के चरणों के स्पर्श से बंधनमुक्त सांसें भर रही हैं  वनराई के सबसे ऊँचे तरू से बेल खींचकर ईश्वर ने पुरूषों के कदमों का माप लिया है कछुए के पीठ की कठोरता  उसने अपने कलम में भरकर  गढ़ ली है स्त्री की प्रतिमा।  तमस गुणों को नवजात के मुट्ठी में बंद करके ईश्वर ने बांध दिया है स्वार्थी मनुज को  दंन्तुरी मुस्कान में ।

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

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