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हमें मंजूर है

हमें मंजूर है सीप बनकर रेत में दफन होना
शर्त फकत इतनी सी है तुम मोती बन चमको

हमें मंजूर है बीज बन मिट्टी में दफन होना
शर्त फकत इतनी सी है तुम फूल बन महकना

हमें मंजूर है मेघ  बन पानी में घुल जाना
शर्त फकत इतनी सी है तुम वृक्ष  बन लहलहाना

हमें मंजूर है सूखे  पत्ते बन धरा पर बिछ जाना
शर्त फकत इतनी सी है उस राह से तुम गुजरना

हमें मंजूर है तेरे लिये स्वर्ग  कि तलाश मे मर जाना
शर्त फकत इतनी सी है उसे मुक्कमल न तू करना

टिप्पणियाँ

  1. अहा सावन की बूंदो में सराबोर पंक्तियाँ | बहुत ही प्यारी रचना , सरिता जी

    जवाब देंहटाएं
  2. बढ़िया रचना..
    कल मेरी धरोहर में साझा करूँगी
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. समर्पण लिए बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति .
    सादर

    जवाब देंहटाएं

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दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

पितृसत्ता

समंदर ने पानी उधार लिया है  नदियों से  नदियां जब सूख रही होती हैं  समंदर नहीं लौटता है नदियों के हिस्से का जल !  समंदर न्याय नहीं करता  नदियों के साथ जैसे पिता नहीं करते न्याय अपनी  बेटियों से !