सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

एक औरत की पीड़ा

एक औरत की पीड़ा

वह औरत थी उसकी
वो जब चाहता था
अपनी मर्ज़ी से
उसे अलगनी पर से उतारता
इस्तेमाल करता और
फिर वहीं रख देता 
फिर आता 
और उसे उतारकर भोगता
जितनी बार उसे उतारा जाता
टूट जाती उसके शरीर की एक नस 
नज़र आता चमड़ी से बहता हुआ कुछ लहू 
जितनी बार उसे उतारा जाता
उसके नाखूनों से 
भूमि कुरेदी जाती
कुरेदी गई धरती का प्रत्येक निशान
जन्म देता था 
कुछ जलते हुए सवालों को
उसकी आँखो का खारा पानी
सूखकर जम जाता था 
उसके रिसते घाव पे
उसके लड़ख़डा़ते पैर,
उसका रक्तरंजित मन,
उसकी लाचारी,
एवं उसकी बेबसी,
छोड़ जाती थी 
उन तमाम पुरूषों के लिये
एक अनुत्तरित सवाल
जिसका जवाब खोजना अभी भी
शेष है
क्या औरत केवल एक देह मात्र है ??

टिप्पणियाँ

  1. स्त्री की पीड़ा को और उस पीड़ा के मर्म को एक स्त्री से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता | बहुत ही गहरी बात आपने कितनी सरलता से कह दी | सुन्दर प्रभावी पंक्तियाँ

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जिस दिन

जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

क्षणिकाएं

1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है