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वैश्या

वेश्याओं का जन्म!
माँ के गर्भ से नहीं होता है
वो तो खाली तश्तरी से उठकर
स्वार्थ की घने अन्धकार में
हवस की दीवार पर 
बिना जड़ की बेल सी पनपती है

उसका मन 
हमेशा देहलीज़ पर बैठ
हर दिन गिनता रहता है
उसके ही तन की आवाजाही को
जब वो बाजार के पैने
दांतों पर बैठकर
हवस के पुजारियों की आँखो में
ढूंढती है रोटी 
मन उसे वहीं पर छोड़ चला आता 
और दहलीज़ पर बैठकर 
करता खुद से 
अपने अस्तित्व को लेकर अनगिनत 
 सवाल
आखिर क्यों 
अंतड़ियों की भूख भिनभिनाती है
हमेशा मक्खियों की तरह
क्यों नहीं सो पाया बेचैन मन 
एक अरसे से 
घना अंधेरा क्यों जम जाता है
घर की दहलीज़ पर 

 मन को लगता है
आंगन के उस पार
एक घना सा बीहड़ है शायद
और उस घने बिहड़ में से
एक खूंखार जानवर 
उसके घर के अंदर दाखिल हो गया है

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जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जब वह औरत मरी थी

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मेरा गाँव

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