बड़ी माँ जैसे खेत में पनपे
अनचाहे धान को उखा़ड़कर फेंक दिया करती
कुछ इसी तरह अनचाहा जन्म हुआ मेरा
जैसे छत पर किसी पौधे के उगने से
चितां में पड़ जाती थी दादी छत के टुटने के
कुछ ऐसा ही रहा जनम मेरा
सुनाती थी अक्सर पड़ोस की चाची
पिता ने किस तरह से भारी मन से
दो रूपये दिये थे दाई माँ को
और ढेर सारी गालियाँ उस ईश्वर को
याद आता है सचित्र वह दृश्य आज भी
जब मैं बैठती मोड़कर पैर पीछे की तरफ
दद्दा देते खूब गालियाँ उनका मानना था
तुम्हारे बाद लड़के का जन्म होगा
और पीछे पैर डालने से है।उसका अपमान
जैसे-जैसे बड़ी होती गई
घर के हर कोने में मैने जगह बनाई
एक दिन बिना किसी के, मन के तालों को खोले
फिर, मै वहाँ से निकल गयी हमेशा के लिये