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लॉकडाउन


उतना आसान नहीं है
जितना दिख रहा है ये लॉक डाउन
अदृश्य जंजीरों से बंधे
अंदर ही अंदर  छटपटाना
दुनिया भर के लाखों लोगों की मृत्यु
रीते आंखों से देखना
उनके लिए तो उतना
आसान नहीं है ये लॉकडाउन

जिसका कल का कोई ठौर नहीं
जो हथेली पर भूख लेकर जीता है
फुटपाथ पर देह की तह करके सोता है
सड़कों पर भीख मांगते भिखारी
उनके लिए तो उतना
आसान नहीं है ये लॉकडाउन

भीड़ में खिलौने-गुब्बारे बेचते
किसी कोने में बैठे
मछली सब्जी बेचने वाले
दिन की कमाई अन्न की गवाही
इस तरह घर चलने वाले
उनके लिए तो उतना
आसान नहीं है ये लॉकडाउन

बेघर निराधार अनाथ
फ्लाऔवर के नीचे से नाले किनारे से
आसमान को ताकने वाले
उनके लिए तो उतना
आसान नहीं होगा ये लॉकडाउन

दिन-रात पति से पिटती औरतें
उनके साये से भी ड़रती
शारीरिक और मानसिक अत्याचार सहती
जो पहले से ही एक चक्रयुह में फंसी है
उनके लिए तो उतना
आसान नहीं होगा है ये लॉकडाउन
ह

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जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

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