सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं


तुम्हारे शहर में


तुम्हारे शहर में

आज भी मै

इन पगडंडियों पर

ढूंढती हूँ तुम्हारे क़दमों के निशान

ताकि रखकर अपनी कदमें उनपर

चल सकूं उसी धैर्य और सहनशीलता के साथ

पा सकूं तुम्हे अपने भीतर

जिन्हें भूल तुम नहीं लौटे कभी

इन पगडंडियों की ओर

किन्तु सुना है

तुम्हारे शहर में

संवेदनाओं को कहते हैं

नाटक

इसीलिए शायद वहां होते हैं

उपरिपुल, राजमार्ग

नहीं होती पगडण्डीयां ! ह






टिप्पणियाँ

  1. अच्छी कविता । लेकिन टिप्पणी डावने के लिए क ई चरण पूर्ण करने पड़े ।

    जवाब देंहटाएं
  2. शहर तभी अलग हैं वो ख़ुशबू कहाँ उनमें ...

    जवाब देंहटाएं
  3. बाप रे , कितनी सरलता से आपने कितनी गहरी बात कह डाली है | सच में ही ये तो ध्यान ही नहीं दिया की शहरों में पगडंडियाँ नहीं मिलती | बहुत अलहदा है आपका अंदाज़

    जवाब देंहटाएं
  4. कृपया अनुसरक विजेट लगाएं इससे आपको ब्लॉग को अनुसरण करने में आसानी होगी और आपकी अगली पोस्ट हमारे डैशबोर्ड पर खुद ब खुद आ जाएगी | शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत बहुत धन्यवाद सर

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

क्षणिकाएं

1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है

जिस दिन

जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।