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औरत

औरत 



हर औरत के भीतर 

होता है एक वृक्ष 

बडी मजबूती से

अनुभवों की जडे

पसारती है वो

भीतर से भीतर 

निरतंर


बचती है वो दीमकों से 

जो बैठा है जा उसके

स्वाभिमानी जडो पर 


औरत के अतंस में 

बहती है एक नदी

खारेपन की

ओढकर उस पर

परत फौलादी

दौडती है वो निरतंर

सघर्ष की धूप  मे

नन्ही कपोलो के लिये

लेकर नमी


अचानक होता है उसे आभास 

जड़ों से दूर होती

मिट्टी का एहसास

 यातनाओ का चक्र

हाथ से समेटते रिश्ते

होते है रक्तरंजित


पत्तों का मौन होना

शुरू होता है वृक्ष का

ठूंठ हो जाना

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जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

मेरा गाँव

मेरा गाँव अब गाँव कम, खंडहर अधिक नज़र आने लगा है; हर दूसरे घर ने नींव को नंगा कर दिया है। ​खिड़कियाँ अंदर से बंद हैं, पर समय ने उन्हें बाहर से खोल दिया है; दरवाज़े पर ताला किसी बूढ़े के हाथ में लाठी की तरह पड़ा है। ​बचपन में जो घर मुझे विशालकाय लगते थे, अब मानो मरणासन्न हालत में किसी अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज की तरह सिमट गए हैं। ​जिस कुएँ में एक साथ कई गगरियाँ नृत्य करती थीं, वह कुआँ आज मकड़ियों के जाल और कँटीली झाड़ियों के बीच, किसी की टोह के लिए प्यासा है। ​छोटी-छोटी पगडंडियों को न जाने कौन निगल गया, बिना कोई निशान छोड़े । ​नाग देवता का कच्चा पत्थर अब पक्का बन गया है, पर पक्का बनने पर भी वह वीरान और उजड़ा क्यों नज़र आ रहा है ? ​जो घर गिरकर मिट्टी हो चुके हैं, उन घरों की बुनियाद पर पड़े सिलबट्टे और टूटी तुलसी ने उनके 'घर' होने के संकेत आज भी बरकरार रखे हैं। ​एक गाँव को खंडहर बनाकर हम, फिर से एक और खंडहर बनाने की यात्रा पर निरंतर चल रहे हैं।