हर रात बस्ती में शुरू होती थी
लड़ाई और गालियों की बौछारें
तब तुम रख देती थी मेरे कान पर हाथ
और बंद करती थी यहां तक
दरवाजे के भी कान
बड़ी अम्मा आज नहीं है
जो गालियों को समझती थी
निकृष्ट दर्जे की भाषा
जिसने कभी नहीं सीखे
भाषा के स्वर और व्यंजन
किसी पाठशाला के दीवार पर
आज जिन्हें आते हैं स्वर और व्यंजन
उन्हें शायद भाषा नहीं आती है