दो गज जमीन
कोंकणी कहानी
महाबलेश्वर सैल
भूंयसुवात
हरिराम का दादा जी बकरियाँ चराने का काम करता था। कभी मैदानों में तो कभी जंगलों में, अपनी बकरियों के झुंड के साथ भटकता रहता। उसके पास लगभग सौ बकरियाँ थीं। रात होने पर वह किसी न किसी किसान के खेत में बकरियों को बाँध देता। अक्सर शहर से दलाल उसे बकरियाँ खरीदने के लिए ढूँढ़ते हुए आते और एक साथ तीस-चालीस बकरियाँ खरीदकर ले जाते। लेकिन अगले साल तक बकरियों की संख्या फिर उतनी ही हो जाती।
न हरिराम के दादा जी की पिछली किसी पीढ़ी के पास अपनी मालिकी की जमीन का एक टुकड़ा था, न हरिराम के दादा जी को कभी इस बात की लालसा हुई कि उसकी अपनी जमीन हो। उसे लगता ही नहीं था कि किसी एक जगह झोपड़ी खड़ी करके जीवन बिताया जाए। सुबह आँख खुलते ही वह अंतहीन आकाश को देखता और प्रसन्न हो उठता। उसे लगता, जैसे अनंत आकाश के नीचे फैली इस धरती का वही इकलौता राजा है। बकरियों को हाँकते हुए वह एक मैदान से दूसरे मैदान और एक जंगल से दूसरे जंगल निकल जाता। धरती के किसी एक टुकड़े पर अपना हक जताकर वहीं झोपड़ी बनाकर रहना उसे कभी नहीं भाया।
पता नहीं अचानक क्या हुआ कि हरिराम के दादा जी की बकरियाँ एक-एक करके बीमार पड़ने लगीं। पहले उनका मुँह लाल पड़ता, फिर लार टपकने लगती और दो-तीन दिनों के भीतर बकरी मर जाती। देखते-देखते उसकी सारी बकरियाँ मर गईं। इस घटना से हरिराम के दादा जी पूरी तरह टूट गए। अब उसमें इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि कहीं से फिर बकरियाँ लाकर पालने का काम शुरू कर सके। कुछ ही दिनों में उसने सारा काम-धंधा छोड़ दिया और चुपचाप बाबूल के पेड़ के नीचे बैठा रहने लगा। उसकी उम्र पचास के पार हो चुकी थी। जीवन भर बकरियों के पीछे चलते-चलते उसका शरीर सूखकर काँटा हो गया था और पैरों के तलवे जगह-जगह से फट चुके थे। दादा जी ने काम-धंधा छोड़ दिया तो बेचारी दादी जी खेतों में मजदूरी करने जाने लगी। उस समय हरिराम पंद्रह-सोलह साल का था। वह भी माँ के साथ खेतों में मजदूरी करने जाने लगा। आसपास के किसानों के पास तीस-चालीस एकड़ तक जमीन हुआ करती थी और उन्हीं खेतों में गाँव के मजदूर मजदूरी करते थे। एक किसान ने हरिराम के पिता को झोपड़ी बनाने के लिए थोड़ी-सी जमीन दे दी, मगर साथ में हिदायत भी दी
“झोपड़ी कच्ची ही बनाना। ज्यादा मजबूत मत बनाना। आगे चलकर जरूरत पड़ी तो उसे तोड़ना आसान होना चाहिए।”
चारों ओर खेतों में फसलें लहलहाती थीं ज्वार, बाजरा, प्याज, मिर्च और कपास। उन्हें देखकर हरिराम के मन में भी हूक उठती काश, उनके पास भी अपनी मालिकी की थोड़ी-बहुत जमीन होती! वह भी अपने श्रम से धरती की कोख में बीज डालता, अन्न उगाता और पूरे गाँव में किसान कहलाकर थोड़े रोब से घूमता। लेकिन मन मारकर उसे दूसरों के खेतों में हल और फावड़ा चलाना पड़ता।
हरिराम के पिता की भी बड़ी इच्छा थी कि कभी अपनी मालिकी की जमीन पर उसके पसीने की बूँदें गिरें। धीरे-धीरे दूसरों के खेतों में मजदूरी करने की उसकी इच्छा भी समाप्त होती गई। इस विशाल धरती पर उसका अपना कहने के लिए एक टुकड़ा भी नहीं था। यही बात उसे भीतर-ही-भीतर खाए जाती और इस बात को लेकर वह उदास रहने लगा। समय के साथ शहर का आकार बढ़ता गया और गाँव सिकुड़ता गया। चारों ओर ऊँची-ऊँची इमारतें उठने लगीं और जमीन के भाव आसमान छूने लगे। जिस किसान की जमीन पर हरिराम के पिता ने अपनी झोपड़ी खड़ी की थी, उसने एक दिन वह जमीन भी बेच दी। मिट्टी हटाने वाली मशीन आई और देखते-ही-देखते हरिराम के पिता की झोपड़ी एक ही झटके में जमीनदोज कर दी गई।
धीरे-धीरे गाँव के लगभग सभी किसान अपनी जमीन बेचने लगे। देखते ही देखते खेती की जमीन कम होती गई और अंततः गाँव में खेती के लिए जमीन बची ही नहीं। जिन किसानों के पास थोड़ी-बहुत जमीन बची थी, उन्होंने भी उसे बंजर छोड़ दिया और शहर जाकर नौकरी या छोटे-मोटे कारोबार करने लगे। वहाँ उन्हें खेती की अपेक्षा अधिक पैसा मिलने लगा था। हरिराम के पिता के सामने अब न खेती करने के लिए जमीन थी, न सिर छिपाने के लिए कोई जगह। यह बात उसके मन में ऐसी बैठी कि वह भीतर से टूट गया। कुछ ही समय बाद उसी दुःख में उसकी मृत्यु हो गई। उस समय हरिराम केवल पंद्रह वर्ष का था। उसे खेती के काम के अलावा और कोई काम नहीं आता था। पेट पालने के लिए उसे भी शहर की ओर जाना पड़ा। इमारत बनाने का काम उसे नहीं आता था, इसलिए वह मजदूर बन गया पत्थर, रेत और सीमेंट ढोने लगा।
दिन-भर सीमेंट ढोते-ढोते कभी-कभी उसे लगता, जैसे वह सीमेंट को नहीं ढो रहा, बल्कि धीरे-धीरे खुद सीमेंट का आदमी बनता जा रहा है। उसका पूरा शरीर सीमेंट की धूल से सफेद पड़ा रहता। रहने का कोई ठिकाना नहीं था। जहाँ किसी इमारत की नींव पड़ती, वहीं उसका घर बन जाता और जैसे ही इमारत तैयार होकर रंग-रोगन का काम शुरू होता, वह वहाँ से बेघर हो जाता। गाँव तो उसका कभी था ही नहीं; शहर भी उसे हमेशा पराया ही लगता।
कुछ दिनों बाद उसने अपनी ही जाति की एक लड़की से विवाह कर लिया। उसका नाम पारू था। हरिराम उसे भी अपने साथ निर्माणाधीन इमारतों के बीच ले आया। सीमेंट, बालू और धूल की गंध के बीच दोनों का जीवन बीतने लगा। रात होते ही मच्छरों की भिनभिनाहट चारों ओर फैल जाती। पूरी रात मच्छर उन्हें काटते रहते, लेकिन दिनभर की थकान इतनी होती कि दोनों किसी तरह आँखें मूँद लेते।
पारू कभी-कभी नाराज होकर कहती
“इस शहर में हमारा भी तो एक घर होना चाहिए। भले ही किराए का हो। कल को बच्चे होंगे, तो क्या उन्हें भी हम इसी सीमेंट और धूल के बीच पालेंगे ?”
हरिराम चुप हो जाता। फिर धीरे से कहता
“तुम्हें पता है, इस शहर में एक छोटे-से कमरे का भी कितना किराया है ? हर महीने हजार-पंद्रह सौ रुपये अलग से निकालने पड़ेंगे।”
हरिराम को भी अपने पिता की तरह लगता था कि काश उसके पास अपनी मालिकी की जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा होता। मगर हाथ तंग था। जमीन खरीदना उसकी औकात से बाहर की बात थी। वह अक्सर सोचता क्या उसके बच्चे भी उसकी तरह एक जगह से दूसरी जगह भटकते हुए ही बड़े होंगे? क्या उन्हें भी कभी अपना कहने के लिए कोई घर नहीं मिलेगा?
कुछ दिनों बाद पारू ने हरिराम को अपने गर्भवती होने की खबर दी। वह बहुत खुश हुआ, मगर उसी खुशी के साथ उसके मन में एक अनजाना डर भी घर कर गया। क्या बच्चे को लेकर मच्छरों, सीमेंट और बालू की गंध के बीच ही रहना पड़ेगा ? एक दिन पास के सरकारी अस्पताल में पारू ने एक बेटे को जन्म दिया। पारू की माँ करीब महीने भर उसकी देखभाल के लिए उनके साथ रही। मगर वह खुद भी कहाँ ठीक थी! उसकी तबीयत बार-बार बिगड़ती रहती थी। उनका परिवार भी निर्माण-स्थलों पर मजदूरी करता था।
हरिराम का बेटा भी उसकी ही तरह साँवले रंग का और गोल-मटोल था। छह महीने का होते-होते जिस इमारत पर हरिराम काम कर रहा था, उसका निर्माण पूरा हो गया और रंग-रोगन का काम शुरू हो गया।
अब हरिराम के सामने फिर वही सवाल था—अगला ठिकाना कहाँ होगा ? बारिश के दिन भी शुरू हो चुके थे।
पारू ने चिंता से पूछा—
“अब कहाँ जाएँगे हम ?”
दोनों चिंता में डूबे हुए थे। तभी जिस बिल्डर के पास हरिराम काम करता था, उसने दूसरी जगह निर्माण का काम शुरू किया। वहाँ एक बड़े गड्ढे को भरकर उसके उपर नींव डालने की तैयारी हो रही थी। रहने के लिए अभी वहां पर कोई जगह बनी नहीं थी। बिल्डर ने हरिराम को सात-आठ मीटर का एक बड़ा-सा तिरपाल खरीदकर दिया और कहा
“आसपास कहीं झोपड़ी खड़ी कर लो। कुछ दिन वहीं रह लेना।”
हरिराम और उसके पिता जीवन भर इस अनंत धरती पर हाथ-पैर पसारकर बैठने भर की जगह अपनी मालिकी की हो, इसी के लिए तरसते रहे थे। मगर अब समय ने ऐसी करवट ली थी कि भारी बारिश के बीच छह महीने के बच्चे को लेकर उसे तिरपाल की झोपड़ी में जाने की नौबत आ गई थी।
विडंबना यह थी कि तिरपाल की झोपड़ी खड़ी करने के लिए भी कोई उसे जमीन देने को तैयार नहीं था।
वह जहाँ भी जाता, लोग उसे भगा देते।
लोग कहते
“पहले झोपड़ी बनाकर रहोगे, फिर चोरी करके भाग जाओगे। नहीं तो देखते-देखते यहाँ पूरी झोपड़पट्टी खड़ी हो जाएगी।” एक दिन हरिराम ने एक बड़े बंगले के पास चारदीवारी से लगी थोड़ी-सी खाली जगह देखी। वह वहाँ झोपड़ी बनाने की अनुमति माँगने गया तो लोगों ने यह कहकर उसे भगा दिया।
“तुम लोग यहाँ मलेरिया लेकर आओगे और वही मच्छर हमें भी काटेंगे।”
बहुत भटकने के बाद आखिर एक पेड़ के नीचे हरिराम ने जैसे-तैसे तिरपाल की झोपड़ी खड़ी कर ली। मिट्टी डालकर उसने जमीन को थोड़ा ऊँचा किया, फिर भी नीचे से नमी बराबर रिसती रहती। चारों ओर खुली जगह थी, इसलिए हवा का एक झोंका आते ही तिरपाल फड़फड़ाने लगता और हवा भीतर तक घुस आती।
एक दिन हरिराम के बेटे को बुखार आया। बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। पारू ने अपनी ओर से हर संभव दवा दी, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। तीसरे दिन बुखार इतना तेज हो गया कि बच्चे का शरीर निस्तेज पड़ने लगा और फिर वह चल बसा। पारू देर तक अपने मृत बच्चे को सीने से लगाए बैठी रही। उसकी चीखें बारिश की आवाज में घुलती रहीं।
हरिराम अपने साथ काम करने वाले एक मजदूर को बुलाकर लाया। दोनों ने बच्चे को उठाया और कंधे पर फावड़ा रखकर उसे दफनाने के लिए जगह तलाशने निकल पड़े। एक-दो जगह उन्होंने फावड़े से मिट्टी हटाने की कोशिश की, लेकिन वहाँ से भी लोगों ने उन्हें भगा दिया। आखिरकार उन्हें बाँध के किनारे थोड़ी सुनसान जगह मिली। दोनों ने वहाँ गड्ढा खोदा। जैसे ही वे बच्चे को उसमें डालने लगे, दूर खड़ा एक आदमी उन्हें शक की नजर से देखने लगा। वह पास आया और पूछा
“किसका बच्चा है? कैसे मर गया? कुछ तो गड़बड़ है। शायद पुलिस को बुलाना पड़ेगा।”
हरिराम ने रोते हुए कहा
“मेरा बच्चा है साहब। बुखार से मर गया।”
वह आदमी बोला
“किसी का भी हो, यहाँ दफनाने की इजाजत नहीं है। गड्ढे से निकालो और यहाँ से लेकर जाओ। नहीं तो पुलिस बुलानी पड़ेगी।”
हरिराम ने भारी मन से बच्चे को गड्ढे से बाहर निकाला। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। कुछ देर तक वह बच्चे को सीने से लगाए खड़ा रहा, फिर दोनों आगे चल पड़े।
करीब आधे घंटे चलने के बाद वे एक सुनसान जगह पर पहुँचे। एक पेड़ के नीचे दोनों रुके। उन्हें डर था कि यहाँ भी कोई सरकारी आदमी या जमीन का मालिक आकर उन्हें रोक देगा। इसलिए उन्होंने जल्दी-जल्दी गड्ढा खोदा और अपने बेटे को उसमें दफना दिया। ऊपर से मिट्टी डालकर दोनों चुपचाप वहाँ से लौट आए।
वापसी में हरिराम बार-बार पीछे मुड़कर देखता रहा।
उसके मन में एक विचित्र-सी तसल्ली थी
आखिर इस विशाल धरती पर उसके बेटे को दफनाने भर की जगह तो मिल गई।
उनके समाज में एक रिवाज था। किसी के मरने के बाद लगातार सात दिनों तक थोड़ी सा गाय का दूध उसकी दफनाई गई जगह पर डालकर आते थे।
पारू के दोनों स्तन दूध से भारी हो चुके थे और उनमें असहनीय पीड़ा हो रही थी। उसने रोते हुए हरिराम से कहा
“गाय का दूध लाने के लिए अब कहाँ जाओगे? एक काम करो, मैं अपना ही दूध लोटे में उतार देती हूँ। तुम वही वहाँ डाल आना। वैसे भी बच्चे को गाय के दूध से ज्यादा माँ के दूध की आस होती है।” उसने अपने स्तनों से दूध निकालकर एक लोटा भर दिया और हरिराम को पकड़ा दिया।
दूध का लोटा लेकर हरिराम जब अपने बेटे की कब्र के पास पहुँचा, तो वहाँ का दृश्य देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। कुत्तों ने गड्ढा खोदकर बच्चे की लाश बाहर निकाल ली थी। उसका शरीर नोच-खसोटकर खा चुके थे। मिट्टी पर केवल बच्चे का सिर पड़ा था। हरिराम माथा पकड़कर वहीं बैठ गया। उसका मन भीतर तक आहत हो गया। वह देर तक उस मिट्टी को देखता रहा, फिर छिन्नतार हृदय से उसके मुँह से शब्द निकले
“मेरी पूरी पीढ़ी एक टुकड़ा जमीन पाने के लिए तड़पती रही... और आज मेरे बेटे को भी इस धरती के गर्भ में दो गज जगह नसीब नहीं हुई।”
उसकी आँखों के सामने उसके दादा की बकरियाँ, पिता की उजड़ी झोपड़ी, अपनी बेघर जिंदगी और अब बेटे का उजड़ा हुआ शव सब एक साथ घूमने लगा। जिस धरती को उसका दादा अपना साम्राज्य समझकर खुले आसमान के नीचे नापता फिरता था, उसी धरती पर उसकी चौथी पीढ़ी अपने मृत बच्चे के लिए भी दो गज जमीन की मोहताज हो गई थी।
🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥
वो वापस नहीं जायेगा
तो परतों कसो आयलो
बरामदे में बैठकर गौरी पत्तलों के दोने बना रही थी। साथ ही उसकी नजर बार-बार रास्ते पर जाकर टिक जाती। सुबह खेती पर गया जसवंत अभी तक नहीं लौटा था। यह सोचकर उसका मन द्रवित हो उठता कि जिस उम्र में लड़के मौज-मस्ती करते हैं, उस उम्र में उसके बेटे ने पिता के गुजर जाने के बाद खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है। अगले महीने महादेव का मेला पड़ते ही वह अठारह वर्ष का हो जाएगा।
उत्तम दादा कारवार से साप्ताहिक बाजार करके लौटे। सामान से भरी पोटली सिर से उतारकर दरवाजे पर रखी और एक लंबी साँस लेते हुए गमछे से चेहरा पोंछ लिया। घर के सामने मौलश्री के पेड़ के नीचे निकम्मे मधु और रामू बैठे आपस में बतिया रहे थे।
उत्तम दादा ने उन दोनों को सुनाई दे, इतनी ऊँची आवाज में कहा, “आने वाली इक्कीस तारीख को मिलिट्री में भर्ती है। मामलेदार ऑफिस के सामने नोटिस लगी है।”
यह बात मधु और रामू के कानों में पड़ते ही दोनों ने हाथ में सुलगती बीड़ी वहीं फेंक दी और उत्तम दादा के पास आकर पूछताछ करने लगे।
बरामदे में पत्तलों के दोने जोड़ती बैठी गौरी भी कान लगाकर सुनने लगी। मन ही मन सोचने लगी—उत्तम दादा भी न, क्यों ऐसी मनहूस खबरें लेकर आते हैं! वैसे भी जसवंत पर तो मिलिट्री में जाने का भूत पहले से ही सवार है।
मिलिट्री का नाम सुनते ही गौरी के भीतर डर की एक लहर दौड़ जाती थी। उसका घरवाला ब्याह होते ही मिलिट्री में चला गया था और दूसरे महायुद्ध के दौरान छह बरस तक लापता रहा। उन छह वर्षों में चार अक्षर की चिट्ठी तक नहीं आई। गाँव वाले पीछे से तरह-तरह की बातें करने लगे थे—लड़ाई में वह मारा गया होगा। पर गौरी ने किसी की बात नहीं मानी। उसे पूरा विश्वास था कि उसका पति एक न एक दिन जरूर लौट आएगा।
एक दिन उसके ससुर ने दबे स्वर में गौरी से कहा था, “अब और कितने दिन बेटे की राह देखेंगे? गोकर्ण क्षेत्र में जाकर तुम्हारा सुहाग उतारकर आते हैं।”
गौरी ने साफ-साफ मना कर दिया था।
सरकार की ओर से हर महीने बिना नागा पैसे आते थे। डाकिया आता, वह अंगूठा लगाती और आँचल आगे कर देती। डाकिया पैसे उसके आँचल में डालकर चला जाता।
एक दिन गौरी के विश्वास की जीत हुई। सचमुच उसका पति लौट आया।
जैसे-जैसे इक्कीस तारीख नजदीक आ रही थी, गौरी के मन का डर बढ़ता ही जा रहा था। उसकी बात को अनसुना करके यदि बेटा मिलिट्री में चला गया तो...!
वैसे उसका बेटा कद-काठी से कमजोर नहीं था। अगर भर्ती होने के लिए कतार में खड़ा भी हो जाता तो निश्चय ही भर्ती हो जाता। बस्ती के लगभग सभी लड़के सुबह-सुबह नहा-धोकर इस तरह तैयारी में लगे थे, मानो शाम को उनकी अपनी ही शादी हो। लेकिन जसवंत अन्य दिनों की तरह अपने काम में लगा हुआ था।
वह अच्छी तरह जानता था—माई लाख कोशिश करे, उसे मिलिट्री में जाने नहीं देगी। और मेरे जैसे आठवीं पास के लिए यहाँ कौन-सी नौकरी रखी है? ऊपर से मिलिट्री में आसानी से नौकरी मिल सकती है। ऐसा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।
उसे मिलिट्री में नौकरी करने वाला मारुति पवार याद आया, जो साल में एक बार गाँव आता था। पैंट और बूट पहनकर बड़े रौब से पूरे गाँव में घूमता और जंगल में बंदूक लेकर शिकार पर निकल जाता। उसका बाप जब युद्ध की खबरें सुनाता तो बड़े चाव से सुनाता और उसे सुनने के लिए पूरा गाँव उसके बरामदे में इकट्ठा हो जाता।
इक्कीस तारीख की सुबह जसवंत थोड़ा जल्दी उठा। कहीं माँ को उस पर शक न हो जाए, इसलिए बिना जल्दबाजी दिखाए उसने अपने सारे काम निपटाए। चाय-पानी करके पहले से तैयार रखी कंबल अपने कंधे पर डाली और माँ से बोला, “माँ, मैं बैलों को चराने पांडव पठार की तरफ जा रहा हूँ।”
गौरी ने क्षण भर उसकी ओर ममता भरी दृष्टि से देखा। मन में आया—अच्छा हुआ, मिलिट्री में भर्ती होने की जिद लेकर नहीं बैठा।
“दोपहर होने से पहले लौट आना। बेकार इधर-उधर मत भटकना।”
इतना कहकर वह चल पड़ा। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जैसे ही वह माँ की नजरों से ओझल हुआ, उसके कदमों ने गति पकड़ ली और वह एक ही झटके में गौशाला की ओर पहुँच गया।
दोपहर ढल गई। शाम उतर आई, फिर भी जसवंत नहीं लौटा था। गौरी नजरें गड़ाए जंगल की ओर देख रही थी। गोधूलि का समय भी बीत गया, फिर भी लड़के का कहीं अता-पता नहीं था। अजीब-अजीब खयालों से उसका मन भरता जा रहा था।
उसने पड़ोस के उत्तम दादा और बनवारी को आवाज देकर जंगल की ओर जाकर थोड़ा देख आने के लिए कहा, “सुबह का गया लड़का न जाने कहाँ भटक रहा है।”
इतने में सड़क पर बस के रुकने की आवाज सुनाई दी। सुबह मिलिट्री में भर्ती के लिए गए गाँव के लड़के वापस लौट आए थे। उनमें भोदु कृष्णानंद भी था। वह बस से उतरा और सीधे गौरी मौसी के आँगन में आकर खड़ा हो गया।
“गौरी मौसी! गौरी मौसी! जसवंत की भर्ती हो गई। मिलिट्री में उसे अकेले ही भर्ती करके ले लिया!”
गौरी के पैरों तले जमीन खिसक गई। सारा वातावरण उसके इर्द-गिर्द स्याह होकर घूमने लगा। अगले ही पल वह निढाल होकर जमीन पर गिर पड़ी।
कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो वह गिरते-संभलते घर के भीतर गई। अलगनी की ओर देखा तो जसवंत के कपड़े गायब थे।
अब उसका सारा धैर्य जाता रहा। वह रोते-रोते कहने लगी, “मुझ पापिन को जरा-सा भी शक नहीं हुआ! कंबल में कपड़े छिपाकर पगडंडी के रास्ते बस पकड़कर भर्ती होने चला गया। उत्तम दादा, आप किसी को साथ लेकर जाइए और उसे समझा-बुझाकर वापस ले आइए। नहीं तो मैं आपके साथ चलती हूँ उसे लाने के लिए।”
उत्तम दादा ने समझाते हुए कहा, “भौजी, उसका मन था मिलिट्री में जाने का, इसलिए वह चला गया। और इस गाँव में रखा भी क्या है? इन बंजर पड़े खेतों में मेहनत करके उसका पेट थोड़े ही भरता।”
“पर इसी आग में कूदना था उसे? जाकर तुम्हें पता है न, हमने क्या-क्या नहीं भुगता है। दादा, वे लोग जाने से पहले उसे एक बार घर आकर मिलने देंगे क्या?”
“भौजी, भर्ती होने के बाद ज्यादातर घर जाने की इजाजत नहीं होती।”
वहीं कुछ दूरी पर रामू खड़ा था। वह पास आकर बोला, “आते समय मैंने जसवंत से पूछा था—अब तुम आगे क्या करोगे? तो कह रहा था, कल शायद हमें बस से यहाँ से ले जाएँगे और आगे का सफर रेल से होगा। पूरे जिले में से केवल दस लड़कों को भर्ती करके लिया है। और जसवंत ने कहा है कि माँ से कहना, चिंता न करे।”
गौरी बेटे की चिंता में दिन-ब-दिन घुलती जा रही थी। उसे देखने के लिए अधीर रहती। जसवंत बीच-बीच में चिट्ठियाँ जरूर लिखता, पर माँ की ममता को चिट्ठियाँ कहाँ धीरज दे सकती थीं!
मिलिट्री में जसवंत को भर्ती हुए चार महीने हो चुके थे। वह पूरी लगन और निष्ठा के साथ प्रशिक्षण ले रहा था। कसरत और खेलकूद में वह बहुत तेज था। हर काम मन लगाकर करता। निरंतर नौ महीने के कठोर प्रशिक्षण के बाद ही जवान का पद मिलता और उसके बाद हरे रंग की वर्दी पहनने को मिलती।
छावनी की पहरेदारी का काम रोज किसी न किसी के हिस्से आता था। उस दिन पहरेदारी की जिम्मेदारी जसवंत की थी और बाकी पलटन प्रशिक्षण के लिए मैदान में गई थी।
छावनी में ज्यादातर ट्रंक बिना ताले के रहते थे। वहाँ के पुराने मास्टर अक्सर बताते थे कि इस छावनी का अपना इतिहास है—आज तक यहाँ कभी चोरी नहीं हुई।
दोपहर के भोजन के समय जब पलटन वापस आई तो धनंजय नाम के रिक्रूट ने थाली और लोटा निकालने के लिए अपना ट्रंक खोला। उसने देखा कि उसका बटुआ गायब था। उसने सारा सामान निकालकर देख लिया, फिर भी बटुआ नहीं मिला।
वह सीधे हवलदार रामसिंह के पास गया।
“सर, मेरा बटुआ...”
हवलदार बीच में ही गरज उठा, “साला रिक्रूट! ठीक तरह से खड़े होकर बात कर!”
धनंजय को तुरंत अपनी गलती समझ में आ गई। वह सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया।
“सर, ट्रंक में रखा मेरा बटुआ किसी ने चुरा लिया है। उसमें पच्चीस रुपये थे।”
“ठीक तरह से ढूँढ़कर देखा क्या?”
“हाँ, सर।”
जो घटना आज तक छावनी में नहीं घटी थी, वह आज घट गई थी। छावनी में चोरी होने का मतलब अनुशासन भंग होना था, ऊपर से बदनामी अलग। नौकरी पर भी धब्बा लग सकता था। कल जब यह खबर बड़े साहब तक पहुँचती तो वे यही कहते कि रामसिंह ने छावनी के रिक्रूटों को अनुशासन नहीं सिखाया।
उसने धनंजय से फिर पूछा, “सुबह प्रशिक्षण पर जाते समय बटुआ था?”
“हाँ, सर। सुबह ही मैंने बटुआ हाफ पैंट की जेब से निकालकर ट्रंक में रखा था।”
हवलदार रामसिंह कड़े अनुशासन वाला व्यक्ति था। जब वह रिक्रूटों का प्रशिक्षण लेता तो बिना रुके दौड़ाता, व्यायाम करवाता। पूरी पलटन पसीने से तर-बतर हो जाती। कुछ तो इतने थक जाते कि लगता, अभी जमीन पर गिर पड़ेंगे।
रामसिंह ने तुरंत जसवंत को बुलाया।
“आज तुम पहरा दे रहे थे न?”
“हाँ, सर।”
“तो चोरी कैसे हुई?”
जसवंत के समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दे। वह चुपचाप खड़ा रहा। रामसिंह ने सवालों की झड़ी लगाकर उसे परेशान कर दिया। जब जसवंत की ओर से कोई जवाब नहीं मिला तो वह आगबबूला हो उठा।
पूरी पलटन जब मैदान में थी तो चोरी कौन कर सकता था? अंततः उसने निष्कर्ष निकाल लिया कि चोरी जसवंत ने ही की है।
यह बात उसने जसवंत को सीधे-सीधे बता दी।
इस झूठे आरोप को जसवंत सह नहीं सका। अगले ही क्षण वह अपने कुलदेवता के गर्भगृह के सामने खड़ा था। उसने ईश्वर के सामने अपने निर्दोष होने की दुहाई दी और मंदिर के बाहर तुलसी मैया की प्रदक्षिणा करके लौट आया।
बहुत देर तक वह निःशब्द खड़ा रहा। बहुत यत्न करने के बाद टूटे-फूटे, तुतलाते शब्दों में केवल इतना ही कह सका—
“माँ की कसम, सर... मैंने चोरी नहीं की।”
सरफिरे दिमाग वाला वह फौजी हवलदार उसकी बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं था। जसवंत चोरी का आरोप कबूल करे, इसलिए उसने उसे परेशान करना शुरू कर दिया। मैदान में उससे कठिन से कठिन काम करवाता, बेवजह दौड़ाता, ठीक से खाना नहीं खाने देता और न सोने देता।
अब दूसरे रिक्रूट भी उसे शक की नजरों से देखने लगे थे।
तीसरे दिन पूरी पलटन प्रशिक्षण के लिए मैदान में जाने को इकट्ठी हुई। रामसिंह ने गिनती की तो एक रिक्रूट कम था। तभी उसे समझ में आया—जसवंत गायब है।
चारों तरफ उसे ढूँढ़ा गया। पूरी छावनी में जसवंत के गायब होने की खबर फैल गई। कमांडिंग ऑफिसर भी जीप लेकर आ गए, पर जसवंत का कहीं पता नहीं चला।
छावनी से एक भी रिक्रूट का गायब हो जाना या किसी सैनिक का भाग जाना बहुत गंभीर मामला माना जाता था। ऊपर से छावनी की प्रतिष्ठा का भी सवाल था।
उधर गौरी बुखार में तड़पती बिस्तर पर पड़ी थी। बीच-बीच में बेटे का नाम लेकर कराह उठती। उत्तम दादा हाथ में कंदील लिए गौरी भौजी का हाल-चाल पूछने आ गए।
“कुछ खाया भी है या बिना खाए ही बिस्तर पर पड़ी है? कुछ रोटियाँ लेकर आऊँ?”
“नहीं दादा। सुबह पकाया हुआ वहीं पड़ा है। खा-पीकर अब मुझे कौन-सा सींग आने वाला है? एक बार बेटे को देख लूँ तो मरने के लिए मुक्त हो जाऊँगी।”
“अब कैसे आ सकता है वह? ट्रेनिंग खत्म होने में अभी तीन महीने बाकी हैं। उसके बाद उसे छुट्टी मिलेगी।”
“अब मेरे दिन बचे ही कितने हैं? उसके भविष्य के बारे में सोचकर सब सहन कर रही हूँ। दादा, तुम जाकर सो जाओ। मैं ठीक हूँ। रात भी काफी हो गई है।”
उत्तम दादा चुपचाप अपने घर लौट गए।
उसी रात जसवंत छावनी से भाग खड़ा हुआ। रेल में बैठकर सीधे बेलगाम पहुँच गया। वहाँ से बस पकड़कर शाम सात बजे कारवार पहुँचा, लेकिन तब तक उसके गाँव जाने वाली आखिरी बस निकल चुकी थी।
अब वह क्या करे? कहाँ रहे? रिश्तेदारों के यहाँ कौन-सा मुँह लेकर जाए?
दूसरी ओर भय उसका पीछा कर रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे सबकी निगाहें उसी पर टिकी हों। बस-स्टॉप पर इतनी भीड़ थी कि उसकी साँसें फूलने लगीं। आखिर उसने अपने गाँव की राह पकड़ ली। बारह मील का रास्ता अब पैदल ही तय करना था।
सुनसान रास्ते पर दूर-दूर तक कोई राहगीर नजर नहीं आ रहा था। सड़क की एक ओर पर्वतों की कतार थी तो दूसरी ओर बहती काली नदी की काली धार।
ऐसा लगता था मानो नदी किनारे खड़े वृक्ष अपना विशालकाय रूप पानी में निहार रहे हों। नदी किनारे गिरे पत्ते मिट्टी में गलने से कहीं-कहीं बासी गंध उठती तो कहीं फूलों की महक हवा में घुल जाती। बीच-बीच में कोई मछुआरा पतवार से पानी चीरता हुआ निकल जाता।
करीब ग्यारह बजे वह गाँव की सरहद पर पहुँचा। अंधकार की ओट में पूरा गाँव सो रहा था।
इस समय उसकी आँखों के सामने गाँव का एक अलग ही चित्र उभर आया। जिस गाँव में उसने अपने जीवन के अठारह वर्ष बिताए थे, उसी गाँव का ऐसा भयावह, सुनसान और बंजर रूप उसने आज तक नहीं देखा था। न किसी की आहट थी, न कहीं दीपक की रोशनी।
पसीने से लथपथ वह अपने घर के सामने खड़ा रहा। तब उसका सारा धैर्य जाता रहा। गिरते-संभलते उसने आँगन पार किया और दरवाजे के पास जाकर बैठ गया।
घर के भीतर दीया जल रहा था। उसकी मंद-मंद रोशनी खिड़की से बाहर आ रही थी।
कुछ देर बाद उसे माँ के कराहने की आवाज सुनाई दी। वह घबरा गया। मन में आया—कहीं माँ बीमार तो नहीं?
उसने धीरे से दरवाजा खटखटाया।
अंदर से गौरी की आवाज आई, “कौन? उत्तम दादा, फिर क्यों आए? इतनी जल्दी नहीं मरूँगी मैं। जाकर सो जाओ तुम।”
“माँ... माँ, मैं आया हूँ।”
उसने धीमे स्वर में कहा।
गौरी के कान खड़े हो गए। उसने आँखें खोलकर झिलमिलाती रोशनी में इधर-उधर देखा। ऐसे सपने उसे अक्सर आते थे। क्या यह भी कोई सपना था? लेकिन वह तो जाग रही थी।
“कौन? जसवंत, तू आया है क्या?”
“हाँ, माँ।”
गौरी उठ गई। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। उसने दरवाजा खोला तो सामने जसवंत अस्त-व्यस्त अवस्था में खड़ा था। बदन पसीने से लथपथ था, बाल बिखरे हुए थे और कपड़े मैले हो चुके थे। भूख और प्यास से उसकी आँखें भीतर धँसी हुई थीं।
“बीच में ही क्यों आया तू? तुम्हारा सामान कहाँ है? इतनी रात तक कहाँ था?”
जसवंत मौन रहा। उसे लगा था कि माँ को देखते ही वह फूट-फूटकर रो पड़ेगा, लेकिन लज्जा और भय से वह भीतर ही भीतर धँसता जा रहा था।
“क्या हुआ जसवंत? अरे, तू बोलता क्यों नहीं? कहीं फौज से भागकर तो नहीं आया न रे?”
जसवंत सिर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा।
“अरे, बोलता क्यों नहीं? कहीं फौज से भागकर तो नहीं आया? भागकर आया है न? कायर है तू!”
गौरी क्रोध से तिलमिला उठी।
“तेरा बाप छह बरस तक लापता रहा। उस समय उसने बनवास भोगा था और तू थोड़ा-सा कष्ट भी सहन नहीं कर सका? घराने को कलंक लगाने के लिए भाग आया है!
कल को लोग मुँह पर थूकेंगे। किसी की नजर में पड़ने से पहले जैसा आया है, वैसा ही वापस जा।”
जसवंत कुछ देर तटस्थ होकर माँ को खामोशी से देखता रहा। कुछ क्षण बाद वह पीछे मुड़ा और धीरे-धीरे चलने लगा।
गौरी ने कठोर स्वर में कहा, “रुक, जसवंत! ओसारे पर जाकर बैठ जा।”
जसवंत बाहर ओसारे पर बैठ गया।
गौरी ने भगोने के सारे चावल उसकी थाली में डाल दिए। ऊपर से दाल परोसी, एक लोटा भर पानी लिया और उसके सामने रख दिया।
“खाना खाकर जिस रास्ते से आया है, उसी रास्ते से वापस जा।”
दरवाजा बंद करके गौरी बाहर कान लगाकर सुनती रही। जब सहन नहीं हुआ तो बिस्तर पर आकर पड़ गई।
जसवंत जब छावनी वापस पहुँचा तब सब लोग मैदान में जाने के लिए तैयार हो रहे थे।
पूरे पाँच दिन बाद जसवंत लौटा था। उसे देखते ही रविंद्र नाम का एक रिक्रूट उसके पास आया और चिल्लाकर पूछा—
“कहाँ था रे तू, जसवंत? धनंजय का बटुआ मिल गया!”
“क्या?”
“हाँ! वह रामचंद्र बावर्ची चोरी करते हुए पकड़ा गया। उसके पास धनंजय का बटुआ भी मिल गया। खूब डराने-धमकाने के बाद उसने पैसे समेत बटुआ लाकर दे दिया।”
यह खबर सुनते ही जसवंत खुशी के मारे जोर-जोर से हँसने लगा। इतने में सारी पलटन वहाँ जमा हो गई। हवलदार रामसिंह भी कहीं से दौड़ता हुआ वहाँ पहुँच गया।
“आ गया तू? बहुत अच्छा किया। लेकिन मैंने तुम्हें परेशान किया था, इसलिए तू भाग गया था—यह बात किसी को मत बताना। कोर्ट-मार्शल हो जाएगा। गलती किसी और ने की और मैंने तुम पर शक किया।”
यह कहते हुए वह माफी माँगने लगा।
जसवंत के वापस लौट आने की खबर कमांडिंग ऑफिसर तक पहुँची। उसने आदेश दिया कि “जसवंत को जल्द से जल्द मेरे सामने लाकर पेश किया जाए।”
भागकर जाना गंभीर अपराध था। उसके लिए सजा भी निर्धारित थी। अट्ठाईस दिन क्वार्टर गार्ड में बंद किया जाता था। ऊपर से कमांडिंग ऑफिसर सख्त अनुशासन का पालन करवाते थे। जब उन्हें अपना कर्तव्य पूरा करना होता, तब किसी पर दया नहीं दिखाई जाती थी।
जहाँ गलती होती है, वहाँ सजा भी होनी चाहिए—यही उनका नियम था। आज तक उनके चंगुल से कोई नहीं बचा था।
जल्द ही एक नया कैदी आने वाला है—यह खबर क्वार्टर गार्ड तक पहुँच गई और नए कैदी के लिए जगह तैयार कर दी गई।
प्लाटून कमांडर सूबेदार मोरे जसवंत को लेकर कमांडिंग ऑफिसर के कार्यालय में पहुँचा। जसवंत ने फौजी की वर्दी पहन रखी थी।
फौजी अनुशासन और नियम के अनुसार सूबेदार मोरे ने जसवंत को कमांडिंग ऑफिसर के सामने खड़ा किया और स्वयं दरवाजे के बाहर जाकर खड़ा हो गया।
चार्जशीट पहले ही कमांडिंग ऑफिसर की मेज पर पहुँच चुकी थी।
कमांडिंग ऑफिसर ने जसवंत की आँखों में आँखें डालकर गरजते हुए पूछा—
“भागकर क्यों गया था? जाने का कारण क्या था?”
एक पल के लिए जसवंत को लगा कि हवलदार रामसिंह का नाम बता कर इस मामले से पल्ला झाड़ ले, लेकिन वह खामोश रहा।
कमांडिंग ऑफिसर ने आरोप लगाते हुए कहा, “लगता है, ट्रेनिंग के दौरान जो कष्ट होते हैं, वे तू झेल नहीं सका। फौज की नौकरी में इस तरह डरपोक होकर नहीं चलेगा।”
जसवंत कुछ नहीं बोला।
“इतनी जल्दी वापस कैसे आया?”
फिर भी वह चुप रहा।
कमांडिंग ऑफिसर ने गुस्से से मेज पर हाथ पटकते हुए कहा—
“मुँह में जबान नहीं है क्या तेरे? बोल, वापस क्यों आया?”
जसवंत ने धीरे से कहा, “माँ ने घर के अंदर नहीं लिया, साहब।”
“क्या बोला तू?”
“भागकर आया हूँ, यह पता चलते ही माँ ने दरवाजा बंद कर दिया।”
कमांडिंग ऑफिसर कुछ देर तक सिर हिलाता रहा। मेज पर रखा पेपरवेट घुमाते हुए वह खड़ा रहा। फिर अचानक गरजकर बोला—
“जा, यहाँ से बाहर निकल!”
जसवंत उसे सलाम करके बाहर आ गया। साहब की गर्जना सुनकर बाहर खड़ा सूबेदार भी सहम गया था।
बाहर आने के बाद जसवंत की कमर का पट्टा और टोपी उतारकर उसे कैदी के भेस में क्वार्टर गार्ड ले जाने की तैयारी होने लगी।
तभी कमांडिंग ऑफिसर बाहर आए और बोले—
“सूबेदार साहब, पट्टा निकालो मत। मैंने इसे निर्दोष करार दिया है।”
सूबेदार ने बड़े आश्चर्य से कमांडिंग ऑफिसर की ओर देखा।
“पर साहब, ऐसा किया तो यह फिर भाग जाएगा।”
कमांडिंग ऑफिसर ने शांत स्वर में कहा—
“नहीं, नहीं, सूबेदार साहब। वह वापस नहीं भागेगा। मैं कह रहा हूँ—वह वापस कभी नहीं जाएगा।”
🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥
अँधकूप
अन्धकूप
स्नेहा धर्मसंकट में थी। मायके वाले उसका गर्भ गिरवाना चाहते थे। वे इसकी पूरी तैयारी भी कर चुके थे और स्नेहा को भी इसके लिए राजी कर लिया था। मायके वालों की तरह स्नेहा को भी लगता था कि उसे यह बच्चा जन्म नहीं देना चाहिए। उसे इन सभी बंधनों से अब मुक्त हो जाना चाहिए। लेकिन ससुराल वालों को यह मंजूर नहीं था। वे इसका कड़ा विरोध कर रहे थे। उन्हें लगता था कि स्नेहा के गर्भ में पल रहे बच्चे के जन्म के साथ उनके घर का बुझा चिराग रोहित लौट आएगा।
स्नेहा की शादी को अभी साल भर भी नहीं हुआ था कि रोहित एक दुर्घटना में चल बसा। उस दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। चारों ओर पानी ही पानी था। जैसे ही आसमान में घिरे काले बादल बरसते, उनके पीछे नए बादलों का जमावड़ा लग जाता।
अगले दिन वट पूर्णिमा थी। पूजा की तैयारी करनी थी। स्नेहा बारिश की परवाह किए बिना अपनी पड़ोसन के साथ बाजार गई। सिंदूर, कंगन और सुहागिनों की गोद भरने के सामान के साथ वह औदुंबर के पेड़ की पूजा के लिए धागे का एक बंडल भी लेकर आई।
घर पहुँचते-पहुँचते शाम तो नहीं हुई थी, फिर भी आसमान में पसरे घने बादलों के कारण ऐसा लग रहा था जैसे रात होने वाली हो। उसने सामान की थैली रखी और भीगे कपड़े बदलने लगी। तभी बाहर मोटरसाइकिल रुकने की आवाज आई। उसने बाहर झाँककर देखा। मोटरसाइकिल का इंजन बंद किए बिना ही एक व्यक्ति दौड़ता हुआ दरवाजे की ओर आया और स्नेहा के ससुर के पास पहुँचकर हाँफते हुए बोला,
“रोहित का एक्सीडेंट हो गया है। उसे सरकारी अस्पताल ले गए हैं।”
ससुर दौड़े-दौड़े अस्पताल पहुँचे। लेकिन डॉक्टरों ने रोहित को अस्पताल पहुँचते ही मृत घोषित कर दिया। उसे भर्ती करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। दरअसल, जब वह स्कूटर से गिरा था, तब उसका सिर तेजी से जमीन से टकराया था और उसी समय उसकी मृत्यु हो गई थी। पुलिस ने पंचनामा कर शव परिवार के हवाले कर दिया। सारी औपचारिकताएँ पूरी होते-होते रात के बारह बज गए और उनके इकलौते बेटे की लाश दरवाजे पर आ गई।
तीन दिन तक स्नेहा लगातार अपने पेट में पल रहे बच्चे को सहलाती रही। वह गहरे सदमे में थी, पर उसकी आँखों में एक भी आँसू नहीं था। हर कोई उसके पास आकर उसे रुलाने का यत्न करता। यह सब स्नेहा के लिए असहनीय था। वह रोहित से बहुत प्यार करती थी। तीन महीने के गर्भ को अपने भीतर छोड़कर रोहित चला गया था। सब कुछ अधूरा-सा बच गया था।
स्नेहा के गर्भवती होने की खबर जब उसके ससुराल और मायके वालों को मिली थी, तब दोनों ओर से उस पर लाड़-प्यार बरसने लगा था। उसे कहाँ रखा जाए और कहाँ नहीं, इस पर सब अपनी-अपनी राय देने लगे थे। सब खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। लेकिन रोहित की मौत के बाद पेट में पलता बच्चा और मातृत्व के कारण उसके शरीर में आ रहे बदलाव, सब कुछ उसे किसी सजा की तरह लगने लगा।
रोहित के जाने का दुख सबको था, लेकिन स्नेहा के ससुराल और मायके वालों के बीच एक मौन युद्ध शुरू हो गया। ससुराल वालों को संदेह था कि कहीं मायके वाले स्नेहा का गर्भ न गिरवा दें। उधर मायके वाले चाहते थे कि स्नेहा को जल्द-से-जल्द इस रिश्ते से मुक्ति मिले, ताकि वह अपना जीवन फिर से नए सिरे से शुरू कर सके।
रोहित की तेरहवीं के बाद मायके वालों ने स्नेहा को चार दिनों के लिए अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई। इस पर उसके ससुर ने कहा,
“इतनी जल्दी क्यों है उसे ले जाने की? अभी उसकी मनःस्थिति नाजुक है और तबीयत भी ठीक नहीं है। बाद में जाएगी। थोड़ा संभलने दीजिए उसे।”
स्नेहा के पिता ने थोड़ा तेवर चढ़ाते हुए कहा,
“तेरहवीं के बाद मायके भेजने का रिवाज है। उसका मन बदल जाएगा और दुखों का पहाड़ भी थोड़ा हल्का होगा। मन ही मन उसका रोना और उसकी घुटन आप लोगों को दिखाई नहीं देती क्या?”
कुछ देर खामोश रहने के बाद ससुर ने कहा,
“अब उसे बहुत संभालकर रखना होगा। कुछ ऊँच-नीच न हो जाए। हमें पता है, उसके पेट में रोहित ही पल रहा है। हमारे घर का चिराग है वह। उसी बच्चे के रूप में हमारा रोहित लौट आएगा। मेरा इकलौता बेटा चला गया...।”
कहते-कहते वे रोने लगे।
स्नेहा वहीं खड़ी थी। यह सब सुनकर उसका दिमाग सुन्न पड़ गया। कितने सपने टूट गए थे। कितनी उम्मीदें मर गई थीं। उसे लगा, शायद वह इस हालत में ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाएगी। तभी उसे लगा, जैसे उसके भीतर से कोई आवाज आ रही हो—
‘हम दोनों ही अगर एक साथ मर जाएँ तो क्या बुरा है? दोनों को एक साथ छुटकारा मिल जाएगा।’
उस दिन रह-रहकर उसके दिमाग में मरने का खयाल घूमता रहा। उसे लगने लगा कि उसकी गर्भावस्था यातनाओं से भरी है और वह एक बंजर गर्भ ढो रही है।
धीरे-धीरे उसे इस बात का एहसास होने लगा कि वह अब एक ‘राँड’ औरत है। समाज में उसका सम्मान कम होता जा रहा है। लोग उसे अब ऐसी नजरों से देखने लगे थे, मानो वह कोई बिन ब्याही लड़की हो और अपने पेट में नाजायज गर्भ पाल रही हो।
कभी-कभी उसे लगता कि सास-ससुर शायद सही कह रहे हैं। उसके पेट में पलता बच्चा उनके घर का चिराग है। वह इस बच्चे को कैसे गिरा सकती है? उनके कुल का चिराग उन्हें सौंपकर वह मुक्त हो जाएगी।
पर ये सब बातें उतनी आसान नहीं थीं, जितनी वह समझती थी। यह कोई गणित नहीं था कि जोड़-घटाव किया और मुक्त हो गई। यह जिंदगी थी, जो इस समय पूरी तरह तहस-नहस हो चुकी थी।
उधर स्नेहा के माँ-बाप के मन में बस यही चल रहा था कि उसके पेट में पल रहे बच्चे को गिराकर बेटी को इस रिश्ते से मुक्त कर दें।
मायके आने के अगले ही दिन रोहित की विधवा मौसी उसकी खबर लेने के बहाने आई। उसने स्नेहा की माँ से धीरे से कहा,
“जीजाजी और मेरी दीदी को इस बात की फिक्र हो रही है कि कहीं आप लोग स्नेहा के पेट में पल रहे बच्चे को गिरवा न दें। वे दोनों बहुत चिंतित हैं।”
माँ आगबबूला होकर बोली,
“तो क्या जिंदगी भर स्नेहा यही लेकर बैठी रहेगी? तीन महीने के गर्भ के कारण अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद करेगी? अभी उम्र ही क्या है उसकी—सिर्फ तेईस वर्ष। पूरा जीवन उसके सामने पड़ा है। उसे सुख भोगने का कोई अधिकार नहीं है क्या?”
रोहित की मौसी ने भी आवाज ऊँची करते हुए कहा,
“बच्चा उनके बेटे-बहू का और उनके कुल का वारिस है। आप लोग कौन होते हैं बच्चा गिराने वाले? और अगर आप लोगों ने ऐसा किया तो जीजाजी सबको कोर्ट में घसीटकर सजा दिलवाएँगे।”
“आप लोग क्या सोचते हैं, इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं। अब स्नेहा ही निर्णय लेगी कि उसे क्या करना है।”
स्नेहा वहीं खड़ी थी। उसने आर्द्र कंठ से दोनों से कहा,
“कृपया आप लोग आपस में मत लड़िए। वे जैसा चाहते हैं, मैं वैसा ही करूँगी। उनका यही कहना है न कि मेरे पेट से उनके बेटे का पुनर्जन्म होगा... तो मैं इसे जन्म दूँगी।”
उसके अंतिम वाक्य में उदासी के साथ गहरी झुँझलाहट भी थी।
कुछ देर बाद रोहित की मौसी ने स्नेहा से फुसफुसाकर कहा,
“दीदी ने तुम्हें साथ लेकर आने के लिए कहा है।”
अगले दिन वह मौसी स्नेहा को लेकर ससुराल चली गई। उसका छोटा भाई उसे छोड़ने के लिए साथ आया, लेकिन कुछ ही देर में लौट गया। स्नेहा को लगा, जैसे मायका भी अब उससे दूर होता जा रहा है।
गर्भ का छठा महीना शुरू होने तक ससुराल वालों ने स्नेहा को घर से बाहर नहीं जाने दिया। एक दिन स्नेहा ने पहसुल को अंगूठे से दबाकर करेले काटते हुए सास से पूछा,
“आप लोग इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हैं कि मेरे पेट में लड़का ही है और उसके रूप में रोहित लौट आएगा?”
सास ने कठोर स्वर में कहा,
“तुम्हारे पेट में लड़का ही पल रहा है। मेरा रोहित लौट आएगा।”
स्नेहा ने मन ही मन सोचा—कैसा पागलपन लेकर बैठे हैं ये लोग! उसके मन में यह जानने की इच्छा हुई कि कल को अगर लड़की हुई तो ये लोग क्या करेंगे? लेकिन उनका व्यवहार देखकर आगे बोलने या कुछ जानने की उसकी इच्छा ही मर गई।
छठे महीने में वह एक दिन मायके गई। पर न उसकी आवभगत हुई और न उसके आने से किसी के चेहरे पर खुशी दिखाई दी। पूरे घर में एक तरह की मरणासन्न नीरवता पसरी थी। मायके में किसी ने उसकी गोद भराई की बात तक नहीं की।
स्नेहा को लगा—यह कैसा गर्भ पल रहा है मेरे पेट में, जो मेरे जीवन को क्षण-क्षण जला रहा है?
वह पूरा दिन रोते हुए या सोते हुए निकालती रही। उसे रोहित की बहुत याद आती। आज वह होता तो जीवन की तस्वीर कितनी खूबसूरत और उत्साह से भरी होती।
माँ ने एक साड़ी लाकर बिना कुछ कहे उसकी गोद में रख दी। स्नेहा की आँखों से आँसुओं का ज्वार उमड़ आया और वह माँ की बाँहों में फफक-फफककर रोने लगी। बहन, भाई और पिता सब वहीं खड़े थे। निशब्द होकर इस दृश्य को देख रहे थे।
असल में, स्नेहा के होने वाले बच्चे को लेकर मायके वालों में कोई उत्साह नहीं था।
स्नेहा को महसूस हुआ—यह घर अब उसका नहीं रहा। अब जो कुछ है, वह पति का घर है।
अगले दिन वह पति के घर लौट आई। सास ने भी उसकी गोद भराई नहीं की। गर्भवती स्त्रियों को दिए जाने वाले मिष्ठान और पकवानों की बात तक कभी नहीं की गई।
नौवाँ महीना लग गया। अब चलते-फिरते समय वह हाँफने और पसीने से तर-बतर होने लगी थी। पेट काफी निकल आया था। जब उसे चौथा महीना लगा था, तब एक बार सास और ससुर उसे डॉक्टर के पास लेकर गए थे। उसके बाद किसी ने उसकी खबर नहीं ली।
सास घर आने-जाने वाले हर व्यक्ति से रोनी सूरत बनाए व्याकुल स्वर में कहती,
“मेरा बेटा आएगा। इसके पेट में रोहित पल रहा है। उसके आने के बाद ही मेरा दुख कम होगा। नहीं तो मैं जिंदा नहीं बचूँगी।”
यह सब सुनकर स्नेहा को लगता—यह कैसा पागलपन है! मैं ही कहीं जाकर मर जाऊँ। कम-से-कम इस सबसे छुटकारा तो मिल जाएगा।
प्रसव पीड़ा शुरू होने पर स्नेहा के सास-ससुर और मौसी सास उसे लेकर अस्पताल पहुँचे। मायके वाले भी आ गए। हर कोई खामोश था। ऐसा लग रहा था, जैसे सबको एक ही चिंता सता रही हो—लड़का होगा या लड़की?
रात के ग्यारह बजे के आसपास उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। पूरी रात वह प्रसव पीड़ा में तड़पती रही। डॉक्टर ने सिजेरियन की बात कही तो ससुर ने कहा,
“इतनी जल्दी नहीं करना है।”
स्नेहा का पिता सिर झुकाए चुपचाप बैठा था और माँ प्रार्थना में लगी थी। दोनों शायद मन-ही-मन कह रहे थे—‘हे भगवान! मेरी बेटी को सुरक्षित रखना।’
इधर सास-ससुर के मन में बस यही था—कुछ भी हो, बच्चा जीवित रहना चाहिए।
अगले दिन सुबह स्नेहा ने एक बच्ची को जन्म दिया। उसके नैन-नक्श स्नेहा की तरह थे और रंग रोहित की तरह साँवला।
लड़की हुई है, यह सुनते ही सास-ससुर को लगा, जैसे किसी ने उन पर भरभराकर अँधियारा उड़ेल दिया हो। सास हतप्रभ होकर वहीं बैठ गई। मौसी हाय-हाय करते हुए अफसोस जताने लगी। जब वे बच्ची को देखने के लिए भीतर गए तो उन सबके चेहरों पर मायूसी की काली छाया तैर रही थी।
वे सब बच्ची को देखकर बाहर आए और बिना किसी से कुछ कहे खामोशी से वहाँ से चले गए।
अगले तीन दिन तक स्नेहा अस्पताल में रही, लेकिन उसके ससुराल से कोई नहीं आया। अंत में हारकर उसके पिता ने फोन किया,
“स्नेहा की खैर-खबर लेने और उसे अस्पताल से लेकर जाने के लिए आप लोग क्यों नहीं आ रहे?”
प्रतिउत्तर में उसके ससुर ने बहुत धीमे और शांत स्वर में कहा,
“अब हम बेटे को खोने के गम में ही मरेंगे। और बचा ही क्या है हमारे लिए? अब उसे हम यहाँ लाकर क्या करेंगे?”
इतना कहकर उन्होंने फोन काट दिया।
चौथे दिन उसके माँ-बाप स्नेहा और उसकी बेटी को घर ले आए। माँ लगातार बड़बड़ा रही थी,
“मेरी बच्ची के साथ विश्वासघात किया। सास-ससुर को यह लालच था कि उनका मरा हुआ बेटा स्नेहा के पेट में पल रहा है और उनके घर का चिराग लौट आएगा। इसलिए बच्चे को गिराने नहीं दिया। अब लड़की हुई तो बेटी को ससुराल वालों ने हमारी दहलीज पर छोड़ दिया।”
अब न पति था और न ससुराल का घर।
स्नेहा की स्थिति उस इंसान की तरह हो गई थी, जो किसी अँधकूप में गिर गया हो—जिसे न ऊपर लौटने का रास्ता दिखाई दे रहा था, न बाहर निकलने की कोई उम्मीद।
🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥🟥
शीर्षक : खाली आँगन
कोंकणी गोबर गणेश
उनका घर बड़ा भव्य और मजबूत था। उसकी बनावट में लकड़ी, बाँस और ठोस पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। घर के दालान में पूर्वजों की तस्वीरें लगी हुई थीं। उनमें जयंत के पिता की तस्वीर भी थी। परिवार को विश्वास था कि एक दिन उसी कतार में जयंत की तस्वीर लगेगी और उसके बाद उसके बेटे की। मगर शादी को पाँच वर्ष बीत चुके थे, अब तक आँगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी। मठ-मंदिरों के दर्शन, ओझा-बाबाओं की सलाह—सब कुछ आजमाकर देख लिया गया था।
जयंत की पत्नी निर्मला को हमेशा लगता था कि किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाकर उन दोनों की जाँच करवानी चाहिए। मगर जब भी वह इस बारे में बात करती, उसके सास-ससुर उसे अकेले ही डॉक्टर के पास जाने के लिए कहते। उसकी सास उसे दो बार डॉक्टर के पास लेकर भी गई थी। डॉक्टर ने भी ऐसा कुछ नहीं कहा था कि उसके पति की भी जाँच होनी चाहिए। उसने निर्मला को कुछ दवाइयाँ देकर वापस भेज दिया था।
इधर जयंत भी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था और उधर उसके माता-पिता अपने बेटे में भी कोई कमी हो सकती है, यह मानने के लिए तैयार ही नहीं थे। निर्मला जब जयंत को समझाने की कोशिश करती तो उसे लगता कि वह उसकी मर्दानगी पर शक कर रही है। वह क्रोधित हो उठता और फिर हाथ में जो कुछ आता, उसी से निर्मला को पीटने लगता। उसे बाँझ कहकर गालियाँ देता।
निर्मला को अपने भीतर पूरा विश्वास था कि वह बच्चे को जन्म दे सकती है। उसे लगता था कि उसके भीतर कोई कमी नहीं है।
हर महीने माहवारी के दिन निकट आते ही उसकी देह व्याकुल हो उठती। उसका मन जैसे किसी अनदेखे शिशु की प्रतीक्षा में रोता रहता। उसका गर्भ कब से गर्भधारण की आस लगाए बैठा था। वह मन ही मन सोचती—जिस पुरुष में पुरुषार्थ नाममात्र का नहीं, वह मुझे बाँझ कहता है! उसके माँ-बाप को क्या पता? उन्हें तो बस अपने बेटे की हृष्ट-पुष्ट देह दिखाई देती है।
ओझा-तांत्रिकों और बाबाओं के उपायों का भी कोई असर नहीं हो रहा था। अब निर्मला ने जिद पकड़ ली थी कि पति को भी उसके साथ डॉक्टर के पास जाना ही पड़ेगा। यही बात कहने के कारण अब उसे रोज गालियाँ सुननी पड़ती थीं और मार भी सहनी पड़ती थी।
इसी तरह तीन-चार वर्ष और बीत गए। आखिरकार उन सबने निर्मला को ही बाँझ घोषित कर दिया। अब घर में जयंत की दूसरी शादी की बातें होने लगीं। निर्मला को तरह-तरह की यातनाएँ दी जाने लगीं और तलाक लेने के लिए उस पर दबाव बनाया जाने लगा।
अंततः इन तमाम पीड़ाओं से वह तंग आ गई और एक दिन घर छोड़कर निकल पड़ी। जाते-जाते उसने सबके सामने कहा—
“तलाक देने के लिए मैं अभी तैयार हूँ। फिर भी आप लोग उसकी पचास शादियाँ करोगे न, तब भी उसमें बाप बनने का दम नहीं आएगा।”
निर्मला के जाने के छह महीने के भीतर ही जयंत एक गरीब घर की लड़की को ब्याह लाया। लड़की गोरी और जवान थी।
अब निर्मला को जयंत के परिवार से बदला लेना था। उसे यह भी साबित करना था कि वह बाँझ नहीं है। उसकी उम्र करीब तीस वर्ष हो चुकी थी और यदि उसे यह सिद्ध करना था कि उसमें कोई कमी नहीं है, तो उसे फिर से विवाह करना ही होगा।
निर्मला को उसके पति ने छोड़ दिया है—यह खबर पूरे गाँव में फैल गई। गाँववालों ने भी उसे ताने देने शुरू कर दिए—
“कैसी औरत है यह! शादी को सात साल हो गए, फिर भी बच्चा पैदा नहीं कर सकी।”
अब निर्मला को किसी भी हालत में यह साबित करना था कि वह बाँझ नहीं है। उसने अपने माता-पिता से कह दिया कि वह दूसरी शादी करना चाहती है।
उनका एक दूर का रिश्तेदार था। उसकी पहली पत्नी बच्चा जनने के बाद गर्भाशय में सूजन आने के कारण मर गई थी, मगर बच्ची बच गई थी। वह पुरुष भी दोबारा विवाह करना चाहता था। निर्मला के लिए अब नए सिरे से कोई वर मिलना आसान नहीं था। कोई विधुर या तलाकशुदा पुरुष ही उससे विवाह करने को तैयार होता।
ज्यादा सोच-विचार किए बिना निर्मला ने उसी से विवाह कर लिया।
उसकी बड़ी बेटी पाँच वर्ष की थी। वह अपनी माँ को बहुत याद करती थी। एक दिन निर्मला ने उसकी माँ की साड़ी पहन रखी थी और घर के कामकाज में व्यस्त थी। तभी वह बच्ची उसके पास आकर बोली—
“आप तो बिल्कुल मेरी माँ जैसी लग रही हैं।”
बच्ची के मुँह से यह बात सुनकर निर्मला का मन खुशी से भर गया। उसने प्यार से उसे अपनी गोद में उठा लिया और कहा—
“बेटी, मैं तुम्हारी माँ जैसी नहीं, बल्कि तुम्हारी माँ ही हूँ।”
निर्मला ने पति और दोनों बच्चों के साथ धीरे-धीरे अपनी गृहस्थी जमा ली। इस तरह कुछ महीने गुजर गए।
बारिश के दिन थे। बगीचे में लौकी की एक बेल उग आई थी। देखते-देखते वह पूरे बगीचे में फैल गई और उस पर टोकरियाँ भर-भरकर लौकियाँ लग गईं। निर्मला आते-जाते लोगों और आस-पड़ोस के घरों में लौकियाँ बाँटने लगी।
फिर एक दिन उसे पता चला कि वह माँ बनने वाली है।
यह खबर सुनकर वह आनंद-विभोर हो उठी। धान की बालियों की तरह हवा के संग झूमने लगी। उसका रोम-रोम खुशी से भीग गया। वह अपने आप से बुदबुदाई—
“वह निकम्मा, बेमर्द मुझे बाँझ कहता था!”
उस दिन उसने मिष्ठान बनाया। जब पति खाने के लिए बैठा तो उसने बड़े प्यार से उसे खाना परोसा और धीरे से उसके कानों में मीठे भात की तरह यह खुशखबरी घोल दी।
सातवाँ महीना लगते-लगते उसका पेट उभर आया। अब वह साड़ी थोड़ी नीचे की ओर बाँधने लगी थी। बार-बार अपने पेट को निहारती, मुस्कुराती और कुछ बुदबुदाती रहती। आस-पड़ोस की औरतों से कहती फिरती—
“जब पेट में बच्चा खेलने लगता है न, तब ऐसा लगता है मानो पेट के भीतर कोई तंबूरा बजा रहा हो। जान ऊपर-नीचे होने लगती है।”
अब आठवाँ महीना लग चुका था।
एक दिन हरी साड़ी पहनकर, बालों में फूल लगाकर, सज-धजकर वह रिक्शे पर बैठी और सीधे अपने पहले पति के घर जा पहुँची। दरवाजे पर खड़े होकर उसने उसकी दूसरी पत्नी किशोरी को आवाज दी और फिर बरामदे में अपना बड़ा-सा पेट सँभालते हुए नीचे जमीन पर बैठ गई।
कौन बुला रहा है, यह देखने के लिए किशोरी बाहर आई। उसने देखा कि एक अजनबी औरत बड़े-से पेट के साथ बरामदे में बैठी है। उसे देखकर वह थोड़ी सहम गई। उसने निर्मला को पहचाना नहीं।
“कौन हो तुम? और इस तरह नीचे जमीन पर क्यों बैठी हो?”
निर्मला ने सहज भाव से कहा—
“अब क्या करूँ? दो जान लेकर घूम रही हूँ। खड़े-खड़े पैर दुखने लगे थे। और वैसे भी यह घर मेरे लिए अजनबी नहीं है।”
“पहले यह बताओ, तुम कौन हो?”
बाहर इस तरह जोर-जोर से कौन बात कर रहा है, यह देखने के लिए जयंत, उसकी सास और ससुर भी बाहर आ गए।
निर्मला ने सबकी ओर देखते हुए कहा—
“मैं तुम्हारे पति की पहली पत्नी हूँ।”
इतना कहकर वह उठी और किशोरी के पास जाकर उसके पिचके पेट पर हाथ फेरते हुए बोली—
“तीन साल हो गए न शादी को? अभी भी पिचका पेट लेकर घूम रही हो? कुछ नहीं होगा तुम्हारे पति से। गोबर गणेश है वह!”
यह कहकर निर्मला तेजी से दरवाजे से बाहर निकल गई।