सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अलगाव

अलगाव ये शब्द 

एक अरसे से चल रहा है 

मेरे साथ 

यदाकदा आंखों से 

बहता ही रहता है 


आज सोचती हूंँ 

इतनी बार ये शब्द 

मेरी आंसुओं में बहा है 

फिर भी इसका अस्तित्व 

क्यों नहीं मिट रहा है ?


हर रिश्ते में ये शब्द 

इतनी शिद्दत के साथ 

क्यों अपनी जगह बन जाता है


शायद जिस दिन मैं 

पूर्ण रूप से 

टूट वृक्ष बन

मिट्टी से उखड़ कर 

मिटने की प्रार्थना करूंगी 

उस ईश से

उस  दिन ये  मेरे साथ ही दफ़न होगा 

जब सांसें छोड़ देगी देह का साथ


उस दिन मैं बिदा हो जाऊगी

अंतिम इच्छा के साथ

उम्रभर जीया जिन जिन 

अपनों से अलगाव का दुख

उनके आंखों से

एक भी आंसू न बहे

मेरे अलगाव में... 

मृत्यु संवाद नहीं करती है

टिप्पणियाँ

  1. उम्रभर जीया जिन जिन

    अपनों से अलगाव का दुख

    उनके आंखों से

    एक भी आंसू न बहे

    मेरे अलगाव में...
    बेहद मार्मिक...
    अलगाव किसी के लिए दर्द है तो कोई मधुर स्मृति में समेट लेता है दर्द को तो कोई पुनः मिलन की आशा में ।

    जवाब देंहटाएं
  2. दिल को छूती बहुत सुंदर मार्मिक रचना।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।