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औरत

वो औरत थी उसकी

वो जब चाहता

अपनी मर्ज़ी से

उसे अलगनी पर से उतारता

इस्तेमाल करता और

फिर वही ऱख देता 

फिर आता फिर जाता


जितनी बार उसे उतारा जाता

उसके शरिर मे एक नस टूट जाती

चमड़ी से कुछ लहू नजर आता

जितनी बार उसे उतारा जाता

उसके नाखुनों से भूमि कुरेदी जाती


हर कुरदन जन्म देती एक सवाल 

उसके आँखो का खा़रापानी

जम जाता उसके घाव पे

उसके लड़ख़डा़ते पैर रक्तरंजित मन

उसकी लाचारी उसकी बेबसी

उन्ह तमाम पुरूषो के लिये

एक प्रश्न छोड़ जाती है

औरत केवल देह मात्र है  ? 

टिप्पणियाँ

  1. ओह्ह... बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ०४ अक्टूबर २०२४ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. झिंझोड़ कर रख दिया। दिल ने तड़प के कहा काश ये सच ना हो ! अभिनंदन।

    जवाब देंहटाएं

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दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

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