घर के भीतर जभी
पुकारा मैने उसे
प्रत्येक बार खाली आती रही
मेरी ध्वनियाँ
रोटी के हर निवाले
के साथ जभी की मैनें प्रतीक्षा
तब तब सामने वाली
कुर्सी खाली रही हमेशा
देर रात बदली मैंने
अंसख्य करवटें
पर हर करवट के
प्रत्युत्तर में
खाली रहा बाई और का तकिया
एक असीम रिक्तता
के साथ अंनत तक
का सफर तय किया है
जहाँ से लौटना
असभव बना है अब