सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

महानगर

ये कैसा समंदर हैं जो दिन- रात
घुसपैठिया बने मेरे शहर में दखल दे रहा है
किसी के कंधे भीगे हैं
तो किसी की हथेलियां
कही  मुझे विस्थापित करने का
ये  कोई षड्यंत्र तो नहीं

रोज मेरे शहर की दीवारें छोटी हो रही है
और यह समंदर बना रहा है
अपनी दीवारें, अपनी सीमाएं

हर जगह अपने निशान छोड़ कर
हमारी आंखों में नमक की पुड़ियां
बाँध रहा है ये समंदर

हमारी आवाजें कागज में बांधकर
दूर देश छोड़ कर आ रहा है ये समंदर
और विरोध करने पर हमारे आँगन में
नमक की परतें छोड़ देता है ये समंदर

मेरे शहर की देह इन दिनों
रूंदी जा रही हैं घातक बेल से
और मेरे सपने में दे रहा है दख़ल
मेरा शहर ऊख़डती सांसो से

ऐसे ही भयावह रात में
मैं जग गया इसी सपने से
दरवाजा खोलकर पसीना पोछने की
कर  रहा था कवायत अपनी हथेलियों से
तो मेरा शहर मुझे ले गया
एक नई गलियों में जहाँ लिखा था
महानगर ! 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल