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महानगर

ये कैसा समंदर हैं जो दिन- रात
घुसपैठिया बने मेरे शहर में दखल दे रहा है
किसी के कंधे भीगे हैं
तो किसी की हथेलियां
कही  मुझे विस्थापित करने का
ये  कोई षड्यंत्र तो नहीं

रोज मेरे शहर की दीवारें छोटी हो रही है
और यह समंदर बना रहा है
अपनी दीवारें, अपनी सीमाएं

हर जगह अपने निशान छोड़ कर
हमारी आंखों में नमक की पुड़ियां
बाँध रहा है ये समंदर

हमारी आवाजें कागज में बांधकर
दूर देश छोड़ कर आ रहा है ये समंदर
और विरोध करने पर हमारे आँगन में
नमक की परतें छोड़ देता है ये समंदर

मेरे शहर की देह इन दिनों
रूंदी जा रही हैं घातक बेल से
और मेरे सपने में दे रहा है दख़ल
मेरा शहर ऊख़डती सांसो से

ऐसे ही भयावह रात में
मैं जग गया इसी सपने से
दरवाजा खोलकर पसीना पोछने की
कर  रहा था कवायत अपनी हथेलियों से
तो मेरा शहर मुझे ले गया
एक नई गलियों में जहाँ लिखा था
महानगर ! 

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