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एक अंश

उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त 
जो तुम्हारे ह्रदय के गर्भ गृह में
हो जाता है प्रेम से दाखिल 
और तुम बसा लेती हो
एकनिष्ठ एक ईश्वर की प्रतिमा 
जिस दिन 
तुम हठ करती हो
एक कतरा उजाले की
वो छीन लेता है 
तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ।

(एक अंश)


टिप्पणियाँ

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार 21 जनवरी 2023 को 'प्रतिकार फिर भी कर रही हूँ झूठ के प्रहार का' (चर्चा अंक 4636) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    जवाब देंहटाएं
  2. सच! ऐसा ही होता है। स्त्री विमर्श पर सराहनीय कृति।

    जवाब देंहटाएं

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