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सिनेमाघर

मेरे  शहर का सिनेमाघर
मुझे नहीं पहचानता है
मैंने कभी नहीं बिताया है समय वहाँ

पर रास्ते से गुजरते समय
मैंने रोज पढ़ी हैं कहानियां
उन चेहरों पर
जो लटकते हैं हर शुक्रवार को
सिनेमा के पोस्टर बदलने
और उनके गमछे में
रोटी की उष्मा को इकट्ठा होते देखा है मैंने

गेट पर तैनात पहरेदार
जिसे नहीं रहा कभी मतलब
बदलते सिनेमाओं के पोस्टरों से
उसके लिए तीन घंटे का समय
तीस दिन का राशनभर रहा

विशेष ब्रांड के खाद्य पदार्थों के डिब्बे
बिनकर बाहर लाते सफाई कर्मचारियों को
अक्सर बाहर ऊघते देखती हूं मैं
उनके लिए सिनेमा हॉल में बैठी भीड़
ब्रांडेड डिब्बे के अलावा कुछ नहीं है
जो उनके बहुत करीब से गुजरने पर भी
उनकी थकी हथेलियों का
कभी आभार प्रकट करती नहीं दिखी

मेरे लिए सिनेमाघर कभी
मनोरंजन का पता नहीं बना
मेरे शहर में आए राहगीरों को
रास्ता बताने भर के लिए मैंने इस्तेमाल किया
मेरे शहर का सिनेमाघर

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दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।