सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कविताएँ

1.
धीरे-धीरे घर के भीतर के रिश्ते
स्टेशन की भीड़ में तबदील हो रहे हैं
एक दूसरे से कटे कटे
अपना अपना समय संभालते हैं
बटवें के घरों में
एकांत में खलल पड़ने पर
चीखते चिल्लाते दीवारें खड़ी कर देते हैं
और कुछ इस तरह से
धीरे-धीरे घर के भीतर अनेक घर बसते जा रहे हैं

2.
उठते हुये नारों की आवाजें को
उतने ही सलीके से तबाया जाता है
जितने सलीके से
पांच सौ का नोट किसी
गरीब के खीसें में
चुनावी मौसमों के दौरान

3.
उसने कहा
तुम बोलती बहुत खूबसूरत हो
तुम्हारी आवाज
बहुत सुंदर है
मैंने कहा तुम सुनते बहुत ईमानदारी से हो

4.
मुखौटे के इस बाजार में
न जाने कितनी ही संवेदनाएं
आहत होती है हर रोज
दफ्न होता जा रहा है
चेहरों का संसार
बड़ता जा रहा है
मुखौटे का कारोबार

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

जरूरी नही है

घर की नींव बचाने के लिए  स्त्री और पुरुष दोनों जरूरी है  दोनों जितने जरूरी नहीं है  उतने जरूरी भी है  पर दोनों में से एक के भी ना होने से बची रहती हैं  घर की नीव दीवारों के साथ  पर जितना जरूरी नहीं है  उतना जरुरी भी हैं  दो लोगों का एक साथ होना

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।