मेरे घर की खिड़की भी
उन्हीं खिड़कियों में शामिल हैं
जो अन्य घरों में लगी हैं
पर मेरे घर की खिड़की के बाहर
एक जंगल उगा है
क्यों कि मेरे घर में मर्दों के
पदचाप कि ध्वनि नहीं सुनाई देती हैं
और यह दुनिया की नज़रों में गुनाह है
पर मेरे लिए मैंने किया हुआ बेहतरीन फैसला है
१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब चिंता की रेखाएं सड़कों पर चलते माथे की लकीरों ने क्या कभी की होगी कोशिश होगी सिलवटों के न उभरने के गणित को बिगाड़ने की। २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल
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