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जायज़ प्रश्न

तुम विकसित न करना 
खामोश रहने की कला 
गूंगे ध्वनियों के गमले 
हर चौराहे पर हर हुकुमशाहों के 
दरबार  के बाहर 
दिन-ब-दिन इन गमलों की 
तादाद बढ़ रही है धरती पर

यह समय है गुलगुली जमीन पर 
न्याय के प्रश्नों के बीज बोने का 
जब भविष्य के कान तैयार हो रहे हैं 
तब हम जायज़ प्रश्नों की 
हत्या में क्यों लगे हैं 

वर्तमान के कंधों पर 
हम  भविष्य की झोली 
टंगा रहे हैं तदउपरात
हम बहुत पीछे रहेंगे 
आगे जाएगे केवल 
आज के दहलीज से
उठाये कल के सवाल
अगर उसमें जायज प्रश्न नहीं रहेंगे 
तो तर्क नहीं होगा 
और बिना तर्क के जिजीविषा
 
तो जरूरत है हमें आज 
गमलों से गूंगी ध्वनियों को 
बाहर फेंक देने की
और उसमें रोपने होंगे सही प्रश्न 
लगानी होगी हुकुमशाहो के 
दरबार के बाहर एक वाजिब हाजिरी 
जिससे उछलें सवाल और 
पहुंच जाए भविष्य के कानों में 
पक्के सफर के लिए

टिप्पणियाँ

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(१४-०५-२०२२ ) को
    'रिश्ते कपड़े नहीं '(चर्चा अंक-४४३०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. कडवा सत्य ... किन्तु चुभता है ...
    बेहद लाजवाब ...

    जवाब देंहटाएं

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1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है

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जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

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जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।