सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्षणिकाएँ


१.

तुम्हारे पास मेरा ना लौटना 
मेरा कहीं और जाने का संकेत नहीं है 
बस रिश्तो में भरोसे का 
कम होने का आघात हैं


२.

गति और ठहराव के 
बीच बहती हूँ मैं
नदी नहीं हुं मैं
पर नदी की तरह ही
रिश्तों में खुद को 
समर्पित करती हूँ मैं


३.

जब मैं तुम्हें खोने के डर से
मंदिरों की
सिढीया चढ़ रही थी
ठीक उसी समय 
तुम मुझे दूर करने के लिए
जख्म पर जख्म देकर
तमाम हदों को पार  कर रहे थे

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जिस दिन

जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

क्षणिकाएं

१) अनगिनत वृक्ष दुनिया भर की अलमारियों में बैठे हैं मौन और दीमकें जता रही हैं उन पर अपना हक। २) संमदर में रोती हुई मछलीयां  सीप में रख देती हैं  अपने आंसूओं को  जो मोती बन चमकते हैं  धरती के गालों पर ३) हर पार्वती के हिस्से  नहीं होते शिव  फिर भी वो अर्द्धनारीश्वर के रूप में विचरती रहती है इस धरा पर ! ४) मैं तुम्हारे आंगन कि कृष्ण तुलसी बनकर  तुम्हारे ललाट पर स्थित  समस्त कठिन रेखाएं खींच कर  भस्म कर अपने देह के अंदर धर लूंगी ५) हम दोनों के प्रेम में स्थित अधूरापन तुम्हारे लौटने की परिभाषा है