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एक थी रुनू



       गर्मी बड़ रही थी  , रूनु को देर तक इन्तजार करने के बाद रिक्क्षा मिल गया उसी दौरान खुद को उसने मन ही मन कोस लिया क्यू उसने स्कुटी चलाना छोड़ दी । रिक्क्षा के चल पड़ने से एक हवा का झौंका उसके बदन को हल्की सी राहत दे गया और अपनी आदत के अनुसार उसने रिक्क्षेवाले से उसके घर-बार सुख दुःख की दो चार बातें पुछ ली तबतक  बैंक आ चूका था ।

                     वैसे तो आज भी वो बैंक में जाने से थोड़ा कतराती थी अंदर जाकर वो बैठ गई और बेटे भरत के फोन का इंतजार करने लगी  । जो सपना या जिसका ना होने का दर्द उसने तमाम उम्र ढोया था बचपन से लेकर आज तक खुद  के घर में रहने का सुख उसे नहीं मिला था । कभी दया के कारण कहीं जगह मिली  तो कभी किरायेदार बनकर रही पर जहां -जहां रही वहां-वहां लोगों के आंखों में उसने अपने प्रती दया और उपकार का भाव ही देखा ! इसलिए उसे हमेशा से ही दया से उपजे प्रेम और उपकार से मिली मदद से उसे नफ़रत सी थी । भरत जैसे बेटे का होना मानो उसे किचड़ के बीच कमल के पुष्प का होने का सुख देता था । उसे आज पहली बार अपने घर का सपना पूरा होता  दिख रहा था ‌। घर खरीदने के नाम पर उसके पति ने उसे कहीं बार लुटा था और एक दिन छोड़कर चला गया । तभी एक बैंक के चपरासी ने उसे अतित में जाते-जाते ये कहकर रोक लिया " मैडम अब आप जा सकती है मेनेजर साहब से मिलने " । रूनू ने अनायास ही घड़ी देखी एक बज चुका था ।

दरवाजे को हल्के हाथों से उसने जैसे ही सरकाकर वो केबिन के अंदर दाखिल हो ! गई उसकी नज़र कुर्सीं पर बैठे शक्स पर पड़ गई  । कुर्सी और टेबल के मध्य उसके जीवन की दस साल के पहले का अतीत उसके सामने था उसके हाथ में से घर के कागजात की फायल गिरते-गिरते रह गई। सामने शैलेन्द्र  था ये वहीं शक्स था जिसने दस साल पहले  अपने उलझे जिवन को रुनू के साथ मिलकर फिर एक बार सुलझाना चाहा था अनुमन दोनों जीवन के एक ही धूरी पर खड़े थे । शैलेन्द्र की पत्नी का असमय देहान्त हो चूका था! और रूनू का तलाक शैलेन्द्र की बेटी भरत से तीन साल बड़ी थी और उनकी मुलाकात रुनू के भाई ने करवाई थी! वो भी चाहता था रूनू की रूकी हुई ज़िन्दगी और अधूरा परिवार फिर से खुशहाल हो जाये ।

                      शैलेन्द्र ने वातावरण में सहजता लाने के लहजे में कहा " अरे आप ? मुझे तो लगा आप अब शादी के बाद मुंबई में रहने चली गई होगी मैं भी पिछले छः महीने से ही यहां आया हूं तबादला होकर"।

                   धैर्य जुटाकर रुनू ने पुंछ लिया " कैसे हैं आप" ? पर उस प्रश्न के नीचे स्पष्ट छुपा था अपराध बोध शैलेन्द्र की परख़ किये बिना किसी और को उससे भी अच्छा पुरुष मानकर  शैलेन्द्र के मन को दुखाने का अपराधबोध उसी बीच भरत ने फोन किया वो मेनेजर से बात करना चाहता था !पर उसे थोड़ी देर रुकने के लिए केह रुनू ने फोन काट दिया ।वो शैलेन्द्र की तरफ से उठने वाले व्यक्तिगत सवालों से खुद को बचा रही थी । घर के कागजात की फाइल देकर  उसने बस इतना ही कहा " मेरा बेटा इसी सिलसिले में आप से बात करना चाहता है" ! फिलहाल वो पुने में है" ।


                 शैलेन्द्र ने फिर प्रश्न किया " और आप के पति" ॽ इस प्रश्न से रुनु के आंखों के किनारे पर जमीं नमी देख वो चुप रहा । खुद को संतुलित कर उसने भरत को फोन लगाया लोन के बारे में वो शैलेन्द्र को कुछ कहती  पुछती  तो उसे कुछ भी पता नहीं था । बस भरत ने इतना ही कहा था उसे मम्मा तुम कुछ भी टैन्शन ना लेना बस मैं सब बात करूंगा मैनेजर से ......

            भरत ने जैसे ही शैलेन्द्र को सर करके संबोधित किया शैलेन्द्र ने फिर से अतीत में से दस साल पूराना पन्नां उठाते उसे याद दिलाने की कोशिश की शुरुआत में कुछ व्यक्तिगत बात हो गई दोनों के बीच बाद में घर के लोन को लेकर काफी देर तक बातें हो गई और अंत में शैलेन्द्र ने भरत को ये केहकर निच्छीत किया अब आगे जो भी कागजात होंगे बेटा मैं तैयार करूंगा तूम सब मुझपर अब छोड़ दो और फोन रूनू की ओर बढ़ाया

रुनु ने बस इतना केह फोन कांट दिया बच्चू घर आकर बात करती हूं ।

उस बात पर फिर शैलेन्द्र ने कहा ! पर बच्चु जिस मां को हिरो कहता था वो मां आज मुझे बहुत कमजोर लग रही है क्यू ?

इस बात को उसने ये कहकर उड़ा दिया अब  उम्र हो गई ना

धन्यवाद केह वो केबिन से निकलने लगी ।

शैलेन्द्र ने उसे ये केह रोक लिया मैं तुम्हें घर तक छोड़ देता हूं

ना कहने का मन होते भी वो चूप रहीं ।

रास्ते में फिर वही प्रश्न शैलेन्द्र ने उसके सामने रख दिया

" आप तो शादी के बाद मुंबई में सेंटल होने वाली थी ना अब यहां घर लेने का कारण ?"

 शैलेन्द्र की तरफ से आने वाला ये सवाल  मानों बरसों से दफ्ऩ पिडा़ के ज्वालामूखी के उपर जो फौलादी दिवार उसने बनाकर रखीं थीं ! उसपर बार- बार आघात हो रहा था 

उसे कुरेदने से जो रक्त आज पीप बना था उसे निकलने सै उसे रोकना था ।

बस उसने जवाब दे दिया

" हमने शादी नहीं की "

" मुझे पता है तुम्हारे घर के कागजात से इतना तो अनुमान मैंने लगा दिया था मतलब हमारे साथ शादी करने से आप बचना चाहती थी । ठीक भी तो है कहां मैं आंकड़ों में उलझने वाला इंसान और कहां तुम नाजूकसी कविताएं लिखने वाली बेमेल जोड़ी होती हमारी ना ! पर जिवन में जभी कही ये कहानीयां किताबों पर चर्चा होती तूम मेरे ज़हन में हल्की सी दस्तक दे जाती आज भी लिखती होगी ना ?"

" नहीं कलम छोड़े कहीं बरस हो गए "

 " मुनमुन कैसी है ?"

शैलेन्द्र ने कहा  नोकरी कर रही है अच्छा सा लड़का मिला तो सोच रहा हूं शादी कर डालू ।

" और आप की पत्नी ?"

" आप ने तो शादी के लिए इनकार किया था तो मां के कहने पर मैंने प्रभा से शादी कर ली मुनमुन को संभालना भी मुश्किल हो रहा था मेरे अकेले के बस में नहीं था "।

दोपहर होकर शाम भी धिरे धिरे रात में विलीन हो रही थी पर रुनू जस की तस  बिस्तर पर पड़ी अतित के पन्नों को आंखों से बहा रही थी आज सुबह तक वो अपने घर की कल्पना कर सुकुन महसूस कर रही थी और कहां दस साल पहले टूटे आशियाने का दर्द उस सुकुन पर हावी हो रहा था तलाक के बाद वो पूरी तरह से टुट गई थी पति से मिली यातनाएं पैसे की बार बार मांग करता न देने पर हर रात अत्याचार शरीर के अंगों को पैरों से तक मसल देता यैसे कितने ही बलात्कार सहन कर चूकी थी उसकी देह कितनी ही बार मध्यरात्रि में उसके मासुम बच्चू ने निंद से उठकर सवाल किया था क्या हुआ मम्मा ? और एक दिन वो इतनी जोर से और आवाज ऊंची करके रोई की दिवारों ने भी चुप्पी तोड़ दी और तलाक लेकर उन यातनाओं को विराम भले ही उसने दिया पर समाज के उठते सवाल उसे बंवडर की तरह कभी कभी घेंरते थे ! पर धिरे धिरे उसने उन बातों को भी नजरंदाज करना सिख़ लिया 

उसी बीच दो बरस बीत गए पहले भी वो अपनी जिम्मेदारीया खुद ही निभाती थी पर कभी कभी थक जाती तो उसे लगता एक मजबूत कंधा हो जिसपर कभी वो प्रेम से सर रख़ सके तो कभी थककर पूरे हक़ से अपनी जिम्मेदारीयों को कुछ क्षण के लिए ही सही उस कांधे पर लादकर चंचल हिरनी की तरह तो कभी तितली की तरह वो हंसते मुस्कुराते जिवन का थोड़ा सा तो रास्ता तय करती ।


अब धिरे धिरे करके उसने भरत का स्कुल अपनी नौकरी घर की जिम्मेदारी इन सब के बीच  तालमेल बिठा लिया था । उसके  तकदीर में जो आया वो उसके हिस्से में नहीं था बल्कि कुछ नाकामयाब पुरुषों के द्वारा दी हुई यातनाओं का चक्र था ।

अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए खुद को पढ़ने लिखने  में व्यस्त कर दिया निंद न आने पर देर रात तक कुछ न कुछ पढ़ती और चीतां से मुक्तं हो कब सो जाती पता ही नहीं चलता । अपने मन की व्यथा को वो कागजों पर उतारती इस तरह आंखों से बहने वाले आंसू  कलम से बहकर एक सशक्त रचना का रुप लेता । मन किया तो अपनी किसी न किसी सहेली को सुनाती  पत्रिकाओं में भी भेजती एकतरफ कोशिश ये भी करती की बेटे को अच्छे संस्कार देने में वो कहीं पर भी कम ना पड़ जाए ।

बस जीवन चल रहा था बीच बीच में अपने पिता को लेकर  भरत के बालमन पर उगते प्रश्न उसके समाधान में रूनू के माधें का बढ़ता बल ।

एक दिन दोपहर  कोलेज से आते ही उसने देखा की डाकिया चिठ्ठी दरवाजे पर रखकर गया है । वैसे उसे डाक  ना के बराबर आती थी इसलिए उत्सुकता भी बड़ गई खोलकर देखा तो जिस पत्रिका में वो अक्सर कविताएं भेजा करती उन्होंने रूनू को कविता पाठ के लिए अपने एक कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता दिया था और जिस जगह ये कार्यक्रम था उसके शहर से आधे घंटे के दूरी पर था 

कैसे जाये उस अपरिचित मोहोल में वो व्यक्तिगत रूप से किसी को पहचानती तो नहीं थी और कविता पाठ कैसे करेंगे उसका तो अ भी उसे पता नहीं था ।


उसने सोचा चलो एक दिन की छुट्टी लेकर एक नन्हा सा कदम इस साहित्य की दुनिया में डालने का सहास करती हुं ! तभी उसे ध्यान आया उसने तारिख तो देखी ही नहीं कब है ये कार्यक्रम खाना वही छोड़ वो झट से उठ गई और उस चिट्ठी को फिर खोलकर देखा दस सितंबर की तारीख थी मतलब दो‌ दिन बाद उसकी बैचैनी और बढ़ी केवल दो दिन में वो कैसे करेगी तैयारी तबतक भरत के स्कुल से आने का समय हो चुका था उसके शाम के नाश्ते की तैयारी कर उसे बाजार भी जाना था ।

चपल हिरनी की भांति उसके मन में कहीं कहीं विचार तेज गति से आ रहे थे ।

रात में उसने अपनी पक्की सहेली को फोन किया जिससे वो हर छोटी-बड़ी बात सांझा करती थी । उसे ये यकिन था कल्पना से बात करने के बाद उसकी मन की दुविधा कम होकर हर समस्या का समाधान भी हो जायेगा उसने जैसे सोचा वैसे ही हुआं कल्पना ने उसे सुझाव दिया कि आजकल युट्युब पर सबकुछ होता है बस कविता पाठ के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए टाईप करो बस वहां से सिखों वैसे सोशल मीडिया से थोड़ा दूर ही थी बस कल्पना के केहने पर उसने वैसा ही किया ।

            कार्यक्रम का समय चार बजे का था कल्पना के घर भरत को  पहुंचाकर लगभग तीन बजे के आसपास रुनु ने अपनी मंजिल की तरफ स्कुटी दौडायी । एक कदम आगे तो एक कदम वापसी के रास्ते पर था । मन  ही मन वो सोच रही थी की वापसी में देर हो गई तो और अनजान लोगों के बीच उपर से पहली बार कविता पाठ और मंच पर खड़े रहना उफ़ तभी एक ट्रक भारी भरकर आवाज करता उसके पास से गुजर गया और उसपर लदा सामानों का बोझ उतना ही रुनु का दिमाग भी अनगिनत विचारों तले दब गया ।

                इतना बड़ा हॉल जिसमें अनगिनत चेहरे आत्मविश्वास से भरे पुरुष हो या महिलाएं सबके चेहरे पर तेज और ओज इतना कि सूरज को भी मात दे । कार्यक्रम शुरू होकर करीब-करीब चालिस मिनट बीत चुके थे कितनी सुंदर और विदुषी महिलाएं एक-एक कर अपना कविता पाठ तो कभी साहित्य पर संवाद करती अपनी बातें रख रही थी सब कुछ कितने करीने से निभा रही थी ! यह सब खासकर औरतों का पहनावा उनका बोलना एक पल उसने खुद को कोस दिया विद्यालय में जो साड़ी पहनकर वो गई थी !उसी साड़ी में यहां पहुंच गई पर इस तरह की विदुषी औरतें ही हम जैसे को हमेशा से प्रेरणा देती हैं । अचानक उसके कानों में कुछ मन पंसद कविताओं की पंक्तियां पड़ने लगी बड़ी उत्सुकता से उसने मंच पर नजर घुमाई  इस कवि को उसने कहीं बार पत्रिकाओं में पढ़ा था पर नाम न यहां सुना न याद आ रहा था ।

         जब उसकी बारी आयी तो अपने धैर्य को दुगना तिगुना करके वो मंच पर चढ़ गयी उसके बाद एक ही सांस में कविता पाठ कर अगले ही पल उसने वापसी की और कदम बढ़ा दिये

       तभी पिछे से किसीने आवाज दी

" सुनिए "

" जी "

" आप रुनु शानबाग हो ना "

उसने जवाब में केवल सीर हिला दिया ।

मैं आप की रचनाएं अक्सर पत्रिकाओं में पढ़ता हूं । आप बेहतरीन लिखती है ! पर एक गुजारिश है , दर्द से इतर भी लिखा किजिए ।

ये वही कवि आलोक पाल थे जिसकी कविताएं रुनु को पसंद थी ! पर वो इस समय चुप रही तारिफ में लगती तो उसे और देर होती 

और एक दो बातें कह वो निकल गई ।

      बच्चें कितने मासूम होते हैं ना ! रुनु बार -बार भरत को समझा रही थी नॉटबुक में लिखा स्पेलिंग ग़लत है पर भरत मानने के लिए तैयार नहीं था । उसका कारण था जहां उसने गलती की थी वहीं पर टिचर ने  गुड़ कहकर लिखा था । तभी फोन बजा रुनु ने उसे वैसे ही छोड़ दिया और वो भरत की तरफ मुड़ गई ।

            सोमवार को रुनु को तीन-तीन क्लासिस लेने पड़ते थे और दो  बजते-बजते उसकी पीठ रिढ़ विहीन से हो जाती सबकुछ खत्म करके कॉलेज की सिढिया उतर ही रही थी फोन बजने लगा बेवक्त पर आने वाले फोन से उसे चिढ़ आती थी ।

उस तरफ से आवाज आई

" मैं आलोक पाल बोल रहा हूं क्या रुनू शानबाग से बात हो सकती है ?"

 " जी बोल रही हूं क्या काम है ?"

" रुनू जी शायद आप ने मुझे नहीं पहचाना मैं कवि आलोक पाल हूं और कुछ दिनों पहले ही हम मिले भी थे "।

तबतक रुनु अपनी स्कुटी के पास पोहची थी । उसने क्षमा के स्वर में कहा माफ किजिए सर मैं थोड़ी गड़बड़ी में थी "

आलोक ने उसकी बात बीच में ही काट दी ।

" लगता है आप हमेशा घोड़े पर ही सवार रहती है पहली बार मिले थे तभी यही हाल था "।

आलोक की बात सुनकर रूनु हंस पड़ी ।

आधें घंटे के बाद फोन करती हूं कहकर उसने फोन काट दिया ।

          फिर उस दिन के बाद आलोक और रुनू के बीच लंबी बातें होने लगी कविताओं को कहानियों को साहित्य को लेकर और धीरे-धीर रुनू आलोक के साथ एक अनोखे बंधन में बधती गई उसे कहा खबर थी यहीं बंधन उसके जीवन को तहस नहस करके छोड़ेगा भविष्य में उसका चेहरा तब तक नहीं खिलता जब तक आलोक का गुड मॉर्निंग करके मैसेज नहीं आता अब उसने खुद का श्रृंगार करना शुरू किया जो कभी आयना भी नहीं देखती और कुछ इस तरह से आलोक उसके जीवन में पूरी तरह से घूल मिल गया जैसे चंदन को घिसने के उपरांत पानी अलग नहीं कर सकते उसने रुनू के जीवन में हर एक जगह पर अपनी छाप छोड़ दी ।

   एक ओर भरत बड़ा हो रहा था और अब तो आलोक ने उसके घर पर आकर रहना शुरू कर दिया रुनू ने समाज की किसी की परवाह किए बिना उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाया उसके नींव में केवल आलोक ने किऐ अनगिनत वादे थे ।

       पर समय जैसा जैसा आगे जा रहा था आलोक अपने किए वादों को आगे ढकेल रहा था अब उन दोनों के बीच कोई सीमाएं नहीं बची थी तन-मन उसने विश्वास के बलबुते पर उसे सौंप दिया था ।

           पहले तो आलोक हर महीने में कम-से-कम दो बार आता जभी वो आता भरत खूश होता था अब रूनू ने आलोक को शादी करने के फैसले पर अमल करने कहा हर बार आलोक कोई न कोई बहाना बनाता उसी बीच उन दोनों की कुछ किताबें भी प्रकाशित हुई आलोक के उसके जीवन में आने के पूर्व रूनू को भैया भाभी ने दुबारा शादी के लिए भी कहा उसी समय शैलेन्द्र भी उससे शादी करना चाहता था पर रूनू ने आलोक के लिए सबको दूर कर दिया और वहीं आज धिरे धिरे मानो उससे पिछा छुड़ा रहा था ।

         पहले महिने में दो बार आता और अब कहीं फोन मैसेज करके आ भी जाता पर मनसे नहीं और धीरे-धीरे वो भी बंद हुआ और अंत में उसने रुनु को हर जगह ब्लोक करके रखा अब परिस्थितियां ऐसी थी की वो कहीं ना बोल सकती न कह सकती थी बस घुटन और दर्द बचा था ।

            समय पर दुबारा शादी करके वो अपने जीवन को एक अलग दिशा दे सकती थी पर आलोक पर किए भरोसे की किमत आज वो चूका रही थी उसपर समाज की नजरों में वो हीन बन गए थी ।

     उसके बाद आलोक ने कभी भी उसके बिखरे जीवन को एक नजर से भी नहीं देखा जो इन्सान संवेदना का समंदर लगता था वो आज असंवेदनवों का पाषाण बन गया था चेहरे से मुखौटे हटने के बाद सबसे अधिक तकलीफ उसे होती है जिसने उस मुखौटे पर अपने विश्वास की खेती उगाई थी 

विश्वास किसी पेड़ पर नहीं उगता है वो तो मन की जमीं पर अंकुरित होता है और वही पर मुर्झा भी जाता है उस दिन के बाद रूनू ने उन जख्मों को नहीं कुरेदा जो आलोक से मिले थे अब उसमें प्रेम की खुशबू नहीं वासना की दूरगंत आने लगी थी ।अंतिम बार कब उसने स्नेहील क्षणों को जिया था ये उसका मन और तन भूल गया था और जीवन की मरूभूमि में रक्तरंजित होकर जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए अकेली दौड़ रही थी ।

कुछ आत्महत्याएं देह की नहीं बल्कि मन की होती है और इसका मातम जीवन भर चलता है ।


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